Tuesday, August 23, 2022

हमारी पहचान: रामायण और महाभारत

हमारी पहचान: रामायण और महाभारत 

सीमा सन्देश 24.08.2022 

पिछले लेख में मैंने ज़िक्र किया था कि हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए हमें  कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।  माता, पिता, परिवार और  समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका है हिन्दू समाज में रामायण और महाभारत का पठन पाठन और भगवान् राम और भगवान् कृष्ण की भक्ति।   दुनिया में ऐसी बहुत कम किताबें हैं जिन्होंने आम जनता के दिलो दिमाग पर सदिओं तक  इतना गहरा प्रभाव  डाला हो। रामायण और महाभारत कुछ ऐसी  प्राचीन गाथाएं हैं जिन का ज्ञान सब को सहजता से ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि परिवार और समाज में इन  की चर्चा ही इतनी होती रहती है  और यह  जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। सब को इन  की कहानी मालूम है।  परन्तु फिर भी बार बार इस का अभ्यास होता रहता है।  देश के कई भागों में नवरात्री के दिनों में राम लीला खेली जाती  है। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस तो शायद सब के घर में उपलब्ध है जिस का समय समय पर अखण्ड  पाठ या साधारण पाठ चलता रहता है। इस के अतिरिक्त रामायण और महाभारत के विषय को लेकर दूरदर्शन के सीरियल अत्यधिक लोकप्रिय हैं। फिल्में भी बनी हुई हैं।  बच्चों के कॉमिक भी इन विषयों को लेकर बने हुए है। रामायण और महाभारत  में हर तरह के लोगों के लिए कुछ न कुछ मिलता है: चाहे वह विद्वान् हो या गाँव में रहने वाला साधारण अनपढ़ गंवार। रामायण और महाभारत की कथा से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि परिवार और समाज को  क्या जोड़ता है और क्या तोड़ता है।   किस तरह समाज में  मर्यादा   कायम की जा सकती है। 


रामायण और महाभारत को  लिखने वाले हैं महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास। महर्षि वाल्मीकि ने सब से पहले राम कथा संस्कृत भाषा में लिखी।  फिर इस कथा को समय समय पर कई कविओं और लेखकों ने लिखा।  उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस भक्ति की पराकाष्टठा है और बहुत लोकप्रिय ग्रंथ है।  महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की गाथा लिख कर मानव समाज को अदभुद भेट दी है।  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी का कथन है कि हज़ारों ऋषि और मुनियों की शृंखला में महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास  जी अग्रणी हैं। इन्होंने ब्रह्म ज्ञान को बड़ी सरलता से रामायण, महाभारत इत्यादि के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। समस्त विश्व इनके इस अमूल्य योगदान का सदैव ऋणी रहेगा। 


क्या रामायण और महाभारत सिर्फ कथा है या वास्तविक इतिहास है?   यह चर्चा इतिहास के तथाकथित विद्वान् समय समय  पर किया करते हैं।  इस को इतिहास मानो या कथा  इन की महानता पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता। सदिओं पहले रिश्ते नातों और समाज की मर्यादा  का इतना अच्छा विश्लेषण अगर काल्पनिक कथा द्वारा भी किया गया है तो उन ऋषिओं को नमस्कार है जिन्हों ने इतना बढ़िया ग्रन्थ रचा और जनसाधारण को ज्ञान दिया।  परन्तु हिन्दू समाज के लिए राम और कृष्ण साक्षात् भगवान् के अवतार हैं और भक्ति और श्रद्धा का आधार हैं।  राम भक्ति से ओत प्रोत तो सब इतने हैं कि अभिवादन के लिए राम राम शब्द का प्रयोग किया जाता है।  राम भक्त हनुमान सब के दिल में बस्ते  हैं और भारत में सीता नारी जाति का आदर्श है।  कृष्ण तो भक्ति का सार हैं।  वृन्दावन में कृष्ण भक्ति की सरिता बहती है।  सुरदास और मीरा ने कृष्ण भक्ति की वह धारा  बहाई जिस से   सारा हिन्दू समाज  आत्मविभोर होता रहता है। कृष्ण द्वारा जो अर्जुन को ज्ञान दिया गया वह महाभारत का ही भाग है जिस को हम भगवद गीता के नाम से  जानते हैं।  इस की चर्चा अगले अंक में। इस अंक में बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि तथाकथित आधुनिक बनने के चक्र में इन महान ग्रंथो को नज़रअंदाज़ करना समझदारी नहीं।  इन का ज्ञान सनातन है और इन के साथ जुड़े रहना रूढ़िवाद नहीं बल्कि विवेक है।  आशा करता हूँ कि सब  रामायण और महाभारत से प्रेरणा लेते रहेंगे।  


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

10.08.2022  


Thursday, August 4, 2022

हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान

 हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान

  Seema Sandesh, Sriganganagar 05.08.2022


मैं लगभग 70 वर्ष का हो गया हूँ। भारत में पंजाब प्रदेश के फ़िरोज़पुर शहर में जन्म हुआ और शिक्षा ग्रहण की। फिरोजपुर  पंजाब का एक छोटा सा शहर है जो सतलुज नदी के किनारे बसा है और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित है। नौकरी और व्यवसाय के कारण पंजाब के शहर लुधियाना, बठिंडा इत्यादि के अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, राजस्थान, गुवाहाटी, बैंगलोर इत्यादि कई  जगह समय समय पर रहने और बसने का सुअवसर प्राप्त हुआ।  यूरोप में जर्मनी, हॉलैंड, फ्रांस, लन्दन और दक्षिण पूर्व एशिया में सिंगापुर, बाली, थाईलैंड, फिलीपीन्स और ताइवान इत्यादि का दौरा भी किया।  कहीं भी जाता हूँ तो लोग पहली झलक से ही पहचान जाते हैं  कि मैं हिन्दू हूँ, हिन्दी मेरी भाषा है और मैं हिन्दुस्तान यानि भारत से हूँ और रहन सहन से पंजाबी हूँ। मैं इस का गर्व भी महसूस करता हूँ।  यह पहचान मुझे मेरे जन्मस्थान से ही प्राप्त हुई  और जैसे जैसे मैंने 70 वर्ष  इस पहचान के साथ  जीवन व्यतीत किया मुझे इसका  गर्व  बढ़ता ही गया। अब मेरे बच्चे भी हिन्दू हैं, हिन्दी बोलते हैं और गर्व महसूस करते हैं कि वह हिन्दू हैं  और उनका रहन सहन पंजाबी है। 


हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए मुझे कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा।  माता, पिता, परिवार और  समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा गए। मेरी तरह से देश के 100 करोड़ लोग भी हिन्दू हैं और इतनी सहजता से ही हिन्दू संस्कृति से ओतप्रोत हैं।  कुछ अपवाद हो सकते हैं। लेकिन प्रथा और नियम  अपवाद  से आहत नहीं होते बल्कि सुदृढ़ होते  हैं। ऐसा मैं मानता हूँ और मेरा अनुभव भी है।  यह सनातन संस्कृति और विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों सालों के आचरण  से हम तक पहुंची और अब हमारे बच्चों तक। 


देखा जाए तो सनातन संस्कृति का आधार गृहस्थाश्रम है। परिवार  में कर्त्वय परायण हो कर रहना पूजा ही  है। माता पिता और दादा दादी पूजनीय हैं।  बहन भाई का प्यार अनूठा है। पति पत्नी एक दुसरे के अटूट साथी हैं। यह सब रिश्ते नाते तो सब जगह और सब सभ्यताओं में होते हैं परन्तु हमारी संस्कृति  में इन रिश्तों की मर्यादा कुछ अनूठी है। रामायण और महाभारत हिन्दू संस्कृति  के दो इतिहास ग्रन्थ हैं और दोनों में रिश्ते नातों को लेकर ही चर्चा है।  रामायण में रिश्तों की मर्यादा का चित्र चित्रण है जिस से  प्यार और अनुराग की पराकाष्ठा की सीख मिलती है  और महाभारत से यह सीख मिलती है कि मोह और अहंकार से बिगड़े रिश्तों से कैसे परिवार तबाह हो जाता है। हम अक्सर सुनते हैं कि भारत की विशेषता यह है कि यहाँ परिवार और रिश्ते नातों को निभाया जाता है।  यूरोप और अमेरिका   में  परिवार नाम की संस्था लुप्तप्राय होती जा रही है।  अफ़सोस यह है कि आजकल  हमारे समाज में भी पति पत्नी में तलाक आम बात हो गई है और माता पिता का तिरस्कार हो रहा है और बेटी और बहन को उचित  आदर सत्कार नहीं मिलता।  असल में यह पूंजीवाद और उपभोक्तावाद की अर्थव्यवस्था का परिणाम है जिस के कारण पति पत्नी दोनों नौकरी पेशा करते हैं।  अलग अलग संस्था में दूर दराज़ नौकरी के कारण इकट्ठे नहीं रह पाते और माता पिता को भी साथ नहीं रख पाते।   आजकल  हमारे समाज में    लड़के लड़किआं शादी विवाह के बंदन में बंदना नहीं चाहते। बिना शादी के इकट्ठे रह लेते हैं और जब चाहे साथी बदल लेते हैं। यह चिंता और चिंतन का विषय है।


सनातन संस्कृति में गृहस्थाश्रम के  16 संस्कारों का महत्त्व है।   इन संस्कारों से जीवन में धार्मिक अनुष्ठान किये जाते है और परिवार में  उत्सव का माहौल होता  है और परिवार के सदस्यों में अनुशासन । परन्तु आजकल  परिवार में धार्मिक अनुष्ठान शादी विवाह संस्कार और  अंत्येष्टि संस्कार तक ही सीमित रह गया है। बाकी संस्कार तो लुप्तप्राय हैं।  आजकल तो पारिवारिक उत्सव के नाम पर जन्मदिवस, शादी की सालगिरह और नौकरी से रिटायरमेंट पार्टी का उत्सव मनाया  जाता है और उनमें भी धार्मिक अनुष्ठान की जगह खाना पीना और मौज मस्ती की जाती है।  यज्ञोपवीत जैसे संस्कारों की  तो किसी को खबर भी नहीं।   


सनातन संस्कृति में समाज के गठन में जाति प्रथा का मुख्य स्थान रहा है। गत कुछ  दशकों से जाति प्रथा को अभिशाप माना जा रहा है।  परन्तु हकीकत यह है कि जाति प्रथा की  अभी भी समाज में  मान्यता है।  शादी विवाह के मामले में ध्यान रखा जाता है कि एक ही गोत्र से ना हो।  विज्ञान भी इस का पक्षधर है।  


इस के साथ साथ  परिवार में पूजा, पाठ, प्रार्थना,  दिया बाती, संध्या वंदन तो रोज़ होता ही रहता है। माह में दो बार एकादशी व्रत और पूनम अमावस का भी अनुष्ठान होता है। सोमवार को शिव पूजा, मंगल को हनुमान वन्दन, बुद्ध को गणपति वन्दना और गुरूवार को गुरुपूजा का विधान है। घर में कोई ना कोई रामायण या गीता का पाठ करता है और आये दिन उस ज्ञान की चर्चा चलती है।  नवरात्री में देवी पूजा और रामलीला, शिवरात्रि में शिव पूजा, श्रावण मास में रामायण पाठ, किसी प्रदेश में गणपति पूजा और किसी में बीहू और देवी पूजा। होली,  दिवाली, लोहड़ी, जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा जैसे कितने तीज त्यौहार हैं।   यह सब अनुष्ठान जैसे गृहस्थ जीवन और समाज के अभिन्न अंग बन गए हैं।  समय समय पर कुलगुरु के रूप में स्वामी जी का घर में आगमन होता है या हम उनके आश्रम या गुरुकुल में जाते हैं  तो शास्त्रों का और धार्मिक अनुष्ठानो की जानकारी भी हो जाती है और अभ्यास होता है जिस में हवन  यज्ञ शामिल हैं। जीवन काल में एक दो बार तो  हरिद्वार, वृन्दावन, काशी, जगन्नाथ, अमरनाथ इत्यादि तीर्थ स्थान पर भी भ्रमण हो जाता है।  इस तरह से हिन्दू संस्कार सहजता से जीवन के रग रग में समा जाते  हैं।


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

26.07.2022 


Thursday, July 28, 2022

हिन्दू धर्म: पुरातन और सनातन

 

हिन्दू धर्म: पुरातन और सनातन

Seema Sandesh 30.07.2022 

आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। उत्तर पूर्व भारत के अधिकाँश राज्यों  में आदिवासी ईसाई हो चुके। मेघालया, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड में तो 70% से ज़्यादा ईसाई हो गए हैं। ओडिशा, आंध्र, तमिल नाडु, कर्नाटक  में भी काफी लोगों को ईसाई बनाये जाने का आरोप है। अब तो पंजाब जैसे प्रदेश में भी  काफी दलित या मजहबी सिख  ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे  हैं।  क्या  कभी किसी ने  सोचा है कि क्यों दलित, आदिवासी और अनुसूचित जनजाति आसानी से ईसाई बन जाते हैं।  ईसाई धर्म में परिवर्तन के लिए तीन  रास्ते अपनाये जाते हैं: स्कूल, हस्पताल और पैसे का लोभ। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 2.3% जनता ईसाई है और चार राज्यों में ईसाई बहुसंख्या में हैं। हिन्दुओं का अधिकाँश ईसाईकरण 1947 के बाद हुआ।  


1947 में एक बार तो देश का बटवारा इस्लाम के नाम पर हो गया और पकिस्तान और बांग्लादेश इस्लाम के नाम पर बन गए। अब देश में 15% जनता मुस्लिम है। आजकल हिन्दू से इस्लाम  धर्म  में परिवर्तन तो शायद कम  है।  परन्तुु यह चर्चा में है कि मुस्लिम जनसँख्या की वृद्धि हिन्दुओं से ज़्यादा है। पिछले दशक (2001-2011) में   हिंदू जनसंख्या में  16.76% वृद्धि हुई  जबकि मुस्लिम विकास दर 24.60%  थी। शादी विवाह के कारण भी कई लड़कियां मुस्लिम बन जाती है।  कई मर्द दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम बन जाते हैं।  जिस गली, कूचे, गाँव, शहर या प्रदेश में मुस्लिम जनसँख्या बढ़ जाती है वहां हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं और धीरे धीरे किनारा करने पर मज़बूर हो जाते हैं। जम्मू कश्मीर में 68% जनता मुस्लिम है और 1991 में वहां से कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर दिया गया और आज तक वापिस घर नहीं जा पाए।   केरल और  बंगाल में 27% जनता मुस्लिम है। उत्तर प्रदेश, बिहार में इस तरह के बहुत उदाहरण हैं जहाँ पर कई गली, कूचे, गाँव, शहर में मुस्लिम बहुसंख्या में हैं।  मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस क्यों करते हैं और मुस्लिम एक इलाके में इकट्ठे होकर क्यों रहते हैं यह अलग लेख का विषय है परंतु सच यह है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं। 


धर्म को असल खतरा  आधुनिक जीवन शैली से है।  इस  के कारण हिन्दू स्वयं ही धार्मिक रीति रिवाज़ को भूल रहे हैं। विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी अर्थव्यवस्था और सभ्याचार पर गहरा प्रभाव डाला है। इस के कारण पूंजीवाद का बोलबाला है।  आज का आधुनिक मनुष्य  दिन भर के  काम से फुर्सत पाकर मंदिर, मस्जिद, गिरिजा घर या गुरुद्वारा जाने की बजाय जिम में गेम खेलना पसंद करता है या क्लब में जाकर दोस्तों के साथ समय व्यतीत करता है।  वह परम्परागत  तीज त्योहारों को महत्व नहीं देता बल्कि मनोरंजन के नए नए विकल्प ढूंढता है।   रिश्ते नाते प्यार वफ़ा अब मानव के व्यवसाय की व्यस्तताओं और ज़रूरतों की भेंट चढ़ गए हैं।  परिवार टूट रहे हैं।  संयुक्त परिवार तो रहे नहीं।  एकाकी परिवारों में भी पति पत्नी   इकट्ठे नहीं रह पाते।  परम्परा मालूम ही नहीं तो पालन कैसे होगा। 


कितने हिन्दू हैं जिनको हिन्दू धर्म और संस्कृति की सही पहचान है और वह इस का गर्व महसूस करते हैं कि वह हिन्दू हैं।  हिन्दू धर्म की पहचान मात्र तिलक, चोटी, साड़ी, बिन्दी, सिन्दूर,  मौली, भगवा, केसरिया और मंदिर शिवालों जैसे प्रतीकों  से ही नहीं है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है वेद, शास्त्र, योग, आयुर्वेद,  रामायण, महाभारत, भगवद गीता।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है गृहस्थ जीवन जिस में  माता पिता की सेवा,  नारी का सम्मान, साधु संत और अतिथि का आदर सत्कार है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का चिंतन और प्रयास।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य अस्तेय  और अपरिग्रह का अनुशासन। हिन्दू संस्कृति की पहचान है शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान जैसे नियम। हिन्दू संस्कृति की पहचान है ऐसी जाति प्रथा जिस में एक गोत्र में विवाह नहीं होता। हिन्दू संस्कृति की पहचान है  भजन, कीर्तन, मन्त्र,  श्लोक, साधना, सत्संग सेवा। हिन्दू संस्कृति की पहचान है समय की वह गणना जिस में सृष्टि के काल चक्र की पहचान है: जिस में महीने का हिसाब सूर्य और चन्दृमाँ    की गति पर रखा जाता है। सूर्य की  12 राशिआँ  और बारह सौर मास हैं।  प्रत्येक महीने में चाँद की कलाओं के अनुसार 15-15  दिन के दो पक्ष - शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक वर्ष  में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 28 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीज त्यौहार जो प्रकृति के साथ मेल खाते हैं।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीर्थ स्थान और मंदिर, आश्रम और गुरुकुल।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के साधु संत, ऋषि और मुनि और तपस्वी। हिन्दू संस्कृति की पहचान है कर्म फल का ध्यान जो कहता है जैसा करोगे वैसा भरो गे। हिन्दू संस्कृति की पहचान है जीवन में  पाप और पुण्य का विचार। 


जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम हमेशा पर्यासरत रहते हैं। धर्म और विज्ञान  दो मार्ग हैं। धर्म पुरातन है और विज्ञान आधुनिक। गत 300 वर्षों में  विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी 10,000 साल पुरानी संस्कृति और रहन सहन पर बहुत प्रभाव डाला है। कई मामलों में विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और धर्म की मान्यताओं में स्पष्ट टकराव की स्थिति आ गई है। यह इस पीढ़ी के  निर्णय पर निर्भर करता है कि भविष्य में धार्मिक आस्थाओं को माना जाएगा या विज्ञान की खोज को या कोई बीच का रास्ता निकलेगा। आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा है धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। परन्तु विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और उस से प्रभावित संस्कृति और अर्थव्यस्था ने हमारी धार्मिक आस्थाओं पर ज़्यादा प्रभाव डाला है और समाज आजकल धार्मिक अनुष्ठान में विश्वास नहीं रख  रहा।  


परन्तु ध्यान रहे, विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले और पूंजीवाद कितने भी पैर पसार ले या वामपंथी कितना भी धर्म का विरोध कर लें जब उदासी मन में घर कर लेती है और जब प्राकृतिक आपदा में मनुष्य घिर जाता है तो मन ईश्वर को याद करता है।  कहते हैं ना दुःख में सिमरन सब करे सुख में करे ना कोई।  जो सुख में सुमिरण करे तो दुःख काहे को होये। विज्ञान से प्रभावित मनुष्य सब कुछ परखना चाहता है। वह ईशवर और आस्थाओं को अंधविश्वास और रूढ़िवाद कहता है और उस के बारे में उदासीन है।  परन्तु हज़ारों वर्ष की परम्परा और विवेक को रूढ़िवाद कह देना भी रूढ़िवाद है।  ज़िन्दगी में कुछ जान कर चलो कुछ मान कर चलो।  हज़ारों वर्ष पुरातन संस्कृति से उदास मत हो जाइये।  यह पुरातन भी है और सनातन भी।  विज्ञान ने इस के कई पहलूयों को सही माना है।  इस लिए राम को समझो, कृष्ण को जानो, गीता ज्ञान हासिल करो, कर्मयोग को समझो, राजयोग को समझो, भक्ति और ज्ञान का मार्ग अपनाओ। तीर्थ यात्र करो।  सही साधु संतों का सानिध्य प्राप्त करो। सत्संगत करो।  और परम्परागत संस्कारों का सम्मान करो।  अगले कुछ अंको में इन पर चर्चा करेंगे।  


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

24.02.2022




Sunday, July 3, 2022

चार जुलाई: स्वामी विवेकानंद

 चार जुलाई: स्वामी विवेकानंद 


सतीश कालड़ा, बैंगलोर 


SeemaSandesh 04.07.2022


“To the 4th July”   स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित एक अंग्रेजी कविता है। स्वामीजी  ने संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर 4 जुलाई 1898 को यह कविता लिखी थी। इस कविता में, स्वामी विवेकानंद जी ने स्वतंत्रता की प्रशंसा और महिमामंडन किया है। इस  कविता से पता लगता है कि मानव  स्वतंत्रता का  उनके दिल में कितना महत्व था । संयोग से, 4 जुलाई 1902 को स्वयं विवेकानंद स्वामी जी ने महासमाधि ली और उनकी आत्मा ने इस भौतिक शरीर से स्वतंत्रता प्राप्त की। 4 जुलाई  संयुक्त राज्य अमेरिका की वर्ष गांठ है और संयुक्त राज्य अमेरिका स्वामी जी की कर्मभूमि रही।  “To the 4th July”   कविता लिख कर  स्वामी जी द्वारा स्वतंत्रता की भावना का महिमामंडन करना और 4 जुलाई 1902 को भौतिक शरीर से मुक्ति प्राप्त करना शायद स्वामी जी का अपनी कर्मभूमि को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक अंदाज़ था।  मुक्त तो स्वामी जी सदा से ही थे।  


1893 में विवेकानंद विश्व धर्म संसद में भारत और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गए। संसद में भारी सफलता प्राप्त करने के बाद, 1893 से 1897 तक, उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड की यात्रा की, और धर्म और वेदांत पर व्याख्यान की एक श्रृंखला दी। वह 1897 में भारत लौट आए और 1897 और 1899 के बीच कई राज्यों का दौरा करते हुए वहां की यात्रा की। 1898 में स्वामी जी  कश्मीर गए, जहाँ वे डल झील पर एक हाउसबोट पर रुके। कुछ अमेरिकी और अंग्रेजी शिष्यों के साथ कश्मीर में यात्रा करते हुए, विवेकानंद ने यह कविता 4 जुलाई 1898 को संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की वर्षगांठ के उत्सव के एक भाग के रूप में लिखी और उस दिन के नाश्ते के दौरान इसे जोर से पढ़ने को कहा। कविता अंग्रेजी में है इस लिए इस का कविता में अनुवाद करना शायद  हो पाए।  आइये जानते है इस कविता में लिखे भावों का सार।  



To the 4th Julu

स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर 4 जुलाई

Behold, the dark clouds melt away,

That gathered thick at night and hung

So like a gloomy pall above the earth!

Before thy magic touch, the world

Awakes. 

The birds in chorus sing.

The flowers raise their star-like crowns—

Dew-set, and wave thee welcome fair.

The lakes are opening wide in love

Their hundred thousand lotus-eyes

To welcome thee, with all their depth.

All hail to thee, thou Lord of Light!

A welcome new to thee, today,

O Sun! Today thou sheddest Liberty!

Bethink thee how the world did wait,

And search for thee, through time and clime.

Some gave up home and love of friends,

And went in quest of thee, self-banished,

Through dreary oceans, through primeval forests,

Each step a struggle for their life or death;

Then came the day when work bore fruit,

And worship, love, and sacrifice,

Fulfilled, accepted, and complete.

Then thou, propitious, rose to shed

The light of Freedom on mankind.

Move on, O Lord, in thy resistless path!

Till thy high noon o'erspreads the world.

Till every land reflects thy light,

Till men and women, with uplifted head,

Behold their shackles broken, and

Know, in springing joy, their life renewed!

देखो, वह काले और घने बादल 

जो   इकट्ठा होकर रात होने का अंदेशा दे रहे थे 

और अन्धकार जिस ने घेर रहा था 

और पृथ्वी के ऊपर एक उदासी छ रही थी!


आज 4 जुलाई उगते सूरज  के  जादुई स्पर्श से, 

दुनिया जाग रही है। 

पक्षी कोरस में  गा रहे  हैं।

फूल खिल खिला रहे  हैं-

और ओस की बूंदे मोती बन कर 

आपका स्वागत कर रही हैं।

झीलें प्यार में खुल रही हैं

उनके एक लाख कमल

कमल नेत्रों की तरह आपका स्वागत 

पूरी गहराई के साथ कर रही हैं।


हे प्रकाश के प्रभु, सब तेरी जय हो!

आज आपका स्वागत है,

हे सूर्य! आज तूने दुनिआ को स्वतंत्रता दी!

तुम सोचो कि दुनिया ने कैसे इंतजार किया,

और कितने समय और काल से  तुझे ढूंढ़ा।

कुछ ने घर छोड़ दिया और दोस्तों का प्यार,

और तेरी तलाश में चले  गये, 

कुछ स्व-निर्वासित हुए,

कुछ सुनसान महासागरों में चले गए, 

कुछ ने   जंगलों की राह ली,

प्रत्येक कदम उन्हों ने  जीवन या मृत्यु के लिए संघर्ष किया;

फिर वह दिन आया जब कर्म फलित हुआ,

और पूजा, प्रेम और बलिदान के फलस्वरूप ,

उनकी प्रार्थना पूर्ण हुई, स्वीकृत हुई ।

तब तू हितैषी,बन कर उठे 

मानव जाति पर स्वतंत्रता का प्रकाश किया।


आगे बढ़ो, हे प्रभु, अपने प्रतिरोधहीन मार्ग पर!

और आपने प्रचुर प्रकाश  को दुनिया के हर कोने  में फैला दो।

जब तक   भूमि का हर क्षेत्र तेरी रोशनी को प्रतिबिंबित न करे,

जब तक पुरुष और महिलाएं, 

ऊपर उठे हुए सिर के साथ,

स्वतंत्रता के प्रकाश को महसूस कर लें 

देखो सब की बेड़ियाँ टूट जाएँ  और

बसंत की खुशियाँ 

 उनकी  जिंदगी में   खिल उठें!





Friday, July 1, 2022

मानव शरीर के सात चक्र

  मानव शरीर के सात चक्र  


Seema Sandesh, Sriganganagar 30.06.2022

विज्ञान और तकनीक के इस युग में धर्म को आदिकालीन, पिछड़ा और रूढिवाद कह कर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। परन्तु हिन्दू वैदिक संस्कृति में कितने ही ऐसे आयाम हैं जिन में प्रकृति के ऐसे ऐसे रहस्यों की व्याख्या है  जिस तक आधुनिक विज्ञान को पहुँचने में शायद काफी समय लगेगा।  मानव मनोविज्ञान और शरीर क्रिया का जो अध्ययन योग गुरुओं ने किया है उस की बारीकी तक विज्ञान कब पहुंचे गा कह नहीं सकते।  निम्नलिखित ज्ञान मैंने योग गुरु श्री श्री रवि शंकर जी के कुछ परवचनो से संकलित किये हैं।  इन्हें पढ़ कर आप इस बात का खुद अन्दाज़ लगा सकते हैं कि प्रकृति के यह कितने गहन रहस्य हैं।  कोई अतिश्योक्ति हो जाए तो पहले से ही क्षमा प्रार्थना करता हूँ।  


गुरुदेव कहते हैं मानव शरीर में मुख्य सात चक्र है। चक्र माने जहाँ नस नाडियां सब एकत्रित होती हैं। तो हमारे शरीर में सात चक्र हैं।  प्रथम है मूलाधार चक्र जहाँ से रीढ़ की हड्डी शुरू होती है। यह गुदा  प्रदेश के पास है। उससे 2-4 ऊँगली ऊपर जननेद्रीय के पीछे है दूसरा चक्र जिसे स्वादिष्ठान चक्र कहते हैं। तीसरा चक्र नाभि पर है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। चौथा चक्र हृदय में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। पाँचवाँ चक्र गले में  है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। छटा चक्र दोनों भौहों  के बीच जो स्थान है वहां स्थित है जिसे आज्ञा चक्र कहते है। और सातवां चक्र है सर की छोटी पर।  इसे सहस्त्रार कहते हैं। 


क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं? जी हाँ। हमारी भावनायों की संवेदना  इन चक्रों से जुडी रहती हैं। आपने महसूस किया होगा की जब हमें डर लगता है तो हमारी गुदा सिकुड़ जाती है। जब ईर्ष्या होतो है तो पेट में जलन होती है।  प्रेम और द्वेष की भावना का सम्बन्ध हृदय चक्र से रहता है।  


गुरूदेव का कथन है कि प्राण ऊर्जा एक ही है।  इस का अनुभव अलग अलग चक्रों में अलग अलग तरह से होता है।  कुछ अनुभव सकारात्मक होते हैं कुछ नकारात्मक।  जैसे मूलाधार चक्र  स्थिरता का द्योतक है और जड़ता भी इसी के कारण से होती है।  पृथ्वी तत्व का प्रभाव शरीर पर इसी चक्र  से महसूस होता  है। पृथ्वी स्थिरता प्रदान करती है।  ढोल नगाड़े जैसे वाद्य इस चक्र को प्रभावित करते है। स्वादिष्ठान चक्र से जनन इन्द्रिय प्रभावित होती है। जल तत्व का प्रभाव इस चक्र से संचालित होता है।  इस चक्र का सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति में सृजन और कला को उजागर करता है और इस का नकारात्मक प्रभाव काम वासना उत्पन करता है।  



तीसरा चक्र नाभि क्षेत्र में है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। अग्नि तत्त्व इस चक्र को प्रभावित करता है। इस चक्र के सही ढंग से काम करने से मनुष्य में संतोष, उदारता और ख़ुशी की भावना बनी रहती है।  इस चक्र का नकारात्मक प्रभाव ईर्ष्या और द्वेष है।  ईर्ष्या और द्वेष से पेट में जलन होना स्वाभाविक है।  इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में तार से संगीत निकलता है जैसे सितार, एक तारा, इत्यादि।  


चौथा चक्र हृदय क्षेत्र में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। जीवन मैं शुद्ध प्रेम की भावना इस चक्र से संचालित होती है और वायु तत्त्व इस को प्रभावित करता है। प्रेम उन्मुख हुआ व्यक्ति वायु तत्त्व के प्रभाव से वायु की तरह चंचल रहता है। इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में वायु से संगीत  निकलता है जैसे कि बांसुरी, माउथ ऑर्गन इत्यादि। 


पाँचवाँ चक्र गले में  है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। यह आकाश तत्त्व से प्रभावित है।  कृतज्ञ होने के भाव हमें इस चक्र से महसूस होते है। आप ने महसूस किया होगा कि कृतज्ञ होने पर गला रौंद जाता है।  दुखी इंसान को भी गले में हरकत महसूस होती है। आकाश तत्त्व की प्रधानता के कारण इस चक्र को भी बांसुरी जैसे यंत्र ही प्रभावित करते हैं।  


आज्ञा चक्र ज्ञान का चक्र है और दोनों भौहों  के बीच जो स्थान है वहां स्थित है। ज्ञान और क्रोध का अनुभव इस चक्र से होता है।  और सातवां चक्र है सर की छोटी पर।  इसे सहस्त्रार कहते हैं। ज़िन्दगी में आनंद का अनुभव इस चक्र से होता है।   अगर कोई सो रहा हो तो उस के सर की छोटी के ऊपर 12 ऊँगली की दूरी तक अगर थोड़ा हाथ हिला दो या हलकी सी चुटकी की आवाज़ करो या उनका नाम फुसफुसाओ तो वह जग जाएगा। उनको छूने की ज़रुरत नहीं।


क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं और इनको खोट रहित करने के लिए साधना कर सकते हैं? जी हाँ। जब हम आपने शरीर के इन चक्रों पर ध्यान दे कर साधना करते हैं या समाधी लगते  हैं तो पहले तो कुछ अनुभव नहीं होता।  खालीपन सा लगता है।  फिर थोड़े दिन के अभ्यास के उपरान्त  वहां स्पंदन होने लगता है। तरंग का अनुभव होता है। गुरुदेव कहते हैं कि अभ्यास करने से तरंगों के अनुभव के पश्चात प्रकाश भी अनुभव में आता है।  यह सब निरंतर और सत्कार सहित सहज समाधि का अभ्यास करने से अनुभव में आता है और सहज समाधि की दीक्षा किसी अच्छे गुरु से ली जा सकती है।  साधना के लिए मधुर संगीत का श्रवण भी किया जा सकता है। हर चक्र को उजागर करने के विभिन्न वाद्य और राग भी हैं।  


-0-0-0-



सतीश कालड़ा, बैंगलोर 



देवताओं का निवास


शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है—


१. आँख — चन्द्र, सूर्य


२. कान —दशो दिशाएँ


३. नाक —अश्विनी कुमार


४. मुँह — अग्निदेव


५. जिभ्या — वरुण


६. हाथ — इन्द्र


७. पैर — उपेन्द्र


८. गुदा — गणेश


९. लिंग —ब्रह्मा


१०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी


११. हृदय — शिव-पार्वती


१२. कंठ — सरस्वती


१३. आज्ञाचक्र-- शिव


Monday, June 20, 2022

पतंजलि योग सूत्र

 पतंजलि योग सूत्र 

Seema Sandesh, Sriganganagar 21.06.2022


अन्तराष्ट्रीय  योग दिवस की आप सब को शुभ कामनायें। योग विश्व को भारत की एक अनूठी भेंट है। 200 वर्ष भारत में राज करने के दौरान अंग्रेज़ भारत से सम्पति लूटते रहे। कहीं भारत के आध्यात्म को सीख लिया होता तो विश्व शांति की और अग्रसर हो गया होता।  परन्तु देर आये दरुस्त आये। अब योग का प्रचलन विश्व भर में हो रहा है। विडम्भना यह है कि  भारत में भी जनसाधारण में योग अब ज़यादा प्रचलित हुआ है जब पश्चिम के देशों और अमरीका में इस को मान्यता मिली। इस से पहले तो यह कुछ योग केंद्रों तक सीमित था।  वर्तमान काल में स्वामी रामदेव और श्री श्री रवि शंकर जैसे गुरुओं के प्रयासों से योग का प्रचार और प्रसार जन जन तक पहुंचा है। 


योग के वैश्वीकरण का प्रमुख कारण है कि इसे शारीरक स्वास्थ्य के लिए सही व्यायाम समझा जाता है।  योगासन करना ही योग समझ लिया जाता है।  असल में योग केवल योगासन नहीं।  योग का  भारत के बहुत से ग्रंथों में ज़िक्र है।  भगवद गीता के 18 के 18 अध्यायों  के नाम में योग शब्द है: अर्जुन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान योग, ध्यान्योग, भक्ति योग इत्यादि। गीता के अनुसार कर्म की कुशलता का नाम ही योग है।  परन्तु योग के बारे में विशेष ग्रन्थ है पतंजलि योग सूत्र जिसमें ऋषिजी  ने सुन्योजित ढंग से इस की व्याख्या की है और इस को विज्ञान का रूप दे दिया है।  


पतंजलि ऋषि के अनुसार योग एक अनुशासन हैं जिस के द्वारा  मन की वृतियों का निरोध करना ही योग है। मन बहुत चंचल है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन  को काबू करने का अनुशासन ही योग है।  और यह अनुशासन कोई पुस्तक पढ़ कर हासिल नहीं होता या कोई ज्ञान प्रवचन  सुन कर नहीं होता।  इस के लिए तप और स्वाधयाय आवश्यक है और वह भी दीर्घ काल तक, निरंतर अभ्यास करते रहना है और इस अभ्यास को सत्कार सहित और वैराग्य से  करना है। योग के पथ पर सफलता, किये गए अभ्यास  और ईश्वर कृपा पर निर्भर करती है। सफलता का अर्थ है चित्त का संयमित  हो जाना। 


महर्षि  पतंजलि ने योग के लिए आठ अंगों का मार्ग सुझाया है जिसे अष्टांग योग   कहते हैं।  यह हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। वैसे तो योग के आठ अंगों का वर्णन नियमित क्रम से दिया गया है परन्तु श्री श्री रवि शंकर के मतानुसार इनका अनुसरण  अनुक्रमिक ढंग से अनिवार्य  नहीं हैं। आपका कथन है कि जैसे कुर्सी के एक पैर को खींचने से पूरी कुर्सी आपके पास आ जाती है, वैसे ही इन आठ  अंगों में से किसी एक को मजबूती से पकड़कर अभ्यास शुरू हो जाता है और आप योग के मार्ग में मजबूती से स्थापित हो जाते हैं। 


मन को समाधि  तक लेकर जाने की साधना और उसी अवस्था में स्थितप्रज्ञ होने का नाम ही योग है।  साधना उसकी की जाती है जिस के बारे में ध्यान किया जाए।  ध्यान उस का किया जाता है जिस को धारण कर लिया जाए। और मन में कुछ  धारण करने के लिए अन्तरमुखी  होना आवश्यक है।  इस लिए प्रत्याहार (अन्तरमुखी होना), धारणा, ध्यान और सामधि  मिल कर मन को संयम करने की एक साधना है।  संयमी मनुष्य योगी है और सब  कुछ   हासिल कर सकता है।  


संयम के इस पथ पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम सहायक सिद्ध होते हैं। सर्वप्रथम निरोगी काया का होना अनिवार्य है।  निरोगी काय वाला प्राणी ही सही आसान में बैठ कर साधना कर सकता है।  इस लिए योग में आसन का महत्त्व है।  प्राण जीवन का आधार हैं।  श्वास चल रही है तो जीवन है। सांस विभिन्न भावनाओं से जुड़ी हुई है। क्रोध में श्वास धौंकनी की तरह चलता है।  चिंताग्रस्त मनुष्य का सांस डूबने लगता है।  वह ठंडी आहें भरता है। बाईं   नासिका से चलने वाला श्वास ठंडक प्रदान करता है दाईं नासिका का श्वास गर्मी प्रदान करता है। मन को श्वास से नियंत्रित किया जा सकता है।  श्वास प्रश्वास की सही क्रिया का नाम ही  प्राणायाम है और इस को किसी समर्थ गुरु से सीखना चाहिए और सिखाये गए प्राणायाम का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।  


कितने भी आसन प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि कर लो, जब तक नियत ठीक नहीं  मन की चंचलता बनी रहेगी और योग नहीं होगा।  मन अगर विषय विकारों से भरा हुआ है, काम क्रोध, लोभ मोह में फसा रहता है, चोरी चकारी, धोखा धड़ी, झूठ खसूठ और व्यभिचार घर कर गया है तो कहाँ राहत मिलेगी।  मात्र सुबह शाम का योग आसन व्यायाम कर लेने से योग नहीं हो जाता। प्रार्थना भी अच्छी से अच्छी हैं।   शब्द तो बहुत अच्छे हैं: “विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, दुःख दूर करो देवा; श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा प्रेम बढ़ाओ सन्तन  की सेवा।”  परन्तु इस को  तोते की तरह सुबह शाम रटने से क्या फायदा अगर इस के ऊपर अमल ही नहीं किया तो। कोई आचार संहिता तो होनी चाहिए।   पतंजलि महाऋषि  ने बहुत वैज्ञानिक तरीके से आचार संहिता दी है। 


पतंजलि ने व्यक्तिगत नैतिकता के लिए  पांच नियम दिए और  सामाजिक नैतिकता के लिए पांच यम।  पांच यम हैं: सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचार्य, अस्तेय और अपरिग्रह।  पांच नियम हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।  कहने को तो यह 10 शब्दों की आचार संहिता है परन्तु इनका पालन कर लिया जाए तो मानव समाज पृथ्वी पर ही स्वर्ग का अनुभव कर सकता है।  महात्मा गाँधी ने मात्र सत्य और अहिंसा का निष्ठा पूर्वक पालन किया था और वह राष्ट्रपिता बन गए।  इन का विस्तार से ज़िक्र करने के लिए अलग से लेख लिखना उचित रहेगा।  परन्तु क्या रखा है शब्दों में इन्हे परोने से।  फायदा तो इनको निष्ठापूर्वक पालन करने में ही है।  इस लिए किसी अच्छे गुरु की शरण लेकर इन को  समझना चाहिए और निष्ठा  पूर्वक इन का अभ्यास करना चाहिए।  


धीरज रखिये। योग के मार्ग पर तुरंत कुछ हासिल नहीं होता।  योग के मार्ग पर धीरज रख कर सत्कार सहित अभ्यास करते चलिए। सत्य का व्रत लें, अस्तेय (चोरी ना करने)  का व्रत लें, अपरिग्रह (ज़रुरत से ज़्यादा संग्रह ना करने) का व्रत लें। शुरू शुरू में व्रत लें कि अगले 10 दिन तक झूठ नहीं बोलूंगा, चोरी और भ्रष्टाचार नहीं करूँगा, ग्राहक को ठीक सौदा  दूँगा।  फिर धीरे धीरे इस अवधि को बढ़ाते चलें।  धीरे धीरे सफलता हासिल होगी।  पतंजलि महर्षि ने सुझाया है कि शुरुआत क्रिया योग से करो।  इस का अर्थ है तीन नियम: तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।  तप का अर्थ है धीरज रख कर कठिनता का सामना करना।  स्वाध्याय मतलब जागरूक होना।  सत्संग से और आत्म चिंतन से जागरूकता आती है।  और ईश्वर प्रणिधान मतलब ईश्वर के प्रति आस्था और  भक्ति को बनाये रखो सफलता अवश्य आप के कदम चूमेगी।  आप सब का कल्याण हो। यही शुभेच्छा है।  जय गुरुदेव।


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 












Thursday, June 2, 2022

धर्म, समाज, संस्कृति और राजनीति

 धर्म, समाज, संस्कृति  और राजनीति


Seema Sandesh, Sriganganagar 02.06.2022


समाज में आजकल धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है। आइये समझने की कोशिश करते हैं कि धर्म क्या है, धर्म आधारित संस्कृति और समाज क्या है,   धर्म कैसे हठधर्म बन कर संस्कृति को विकृत करता है और धर्म  के नाम पर कैसे और क्यों राजनीति होती है। 

व्यक्ति को  धर्म की प्रारम्भिक राह और पहचान  विरासत में ही मिल जाती  है।  हिन्दू की  सन्तान  हिन्दू, मुस्लिम की मुस्लिम, ईसाई की ईसाई और सिख की सिख। परन्तु  धर्म की गहराई   गुरु शिष्य परम्परा से सुलभ होती है।  गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर ही मनुष्य सही परम्परा से धर्म मार्ग पर  अग्रसर होता है।  एक ही   परम्परा का पालन करने वाले सम्प्रदाय   बन जाते हैं।  भारत में धर्म आधारित मुख्य परम्पराऐं  हैं हिन्दू (78%), मुस्लिम (18%) और  ईसाई (2%)। अन्य समुदाय हैं बौद्ध, जैन, सिख और पारसी।  

गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर भी मनुष्य एक परम्परा को तो पकड़ लेता है परन्तु गहराई को वह अपनी साधना के आधार पर ही पाता है। ईश्वर सत्य  की उच्चतम अवधारणा  है।   ईश्वर सृष्टि के कण कण में विराजमान है। प्रकृति में है, प्रकृति के बाहर नहीं।   दिव्यता  प्रकृति का सार है।   ईश्वरीय स्वभाव हर इंसान, हर बच्चे में मौजूद हो। इसे कैसे प्रकट करें? इसे कैसे प्रकट करें? यही धर्म का विज्ञान है। हजारों मनुष्यों में कोई एक ही परमात्मा की  प्राप्ति अर्थात सत्य की खोज के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में से भी कोई एक परमात्मा के  परायण होकर परमात्मा को   तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है (भगवद गीता अध्याय- 7     श्लोक- 3)। अधिकाँश लोग तो सिर्फ नाम से ही धर्म के अनुयायी होते हैं: अधिकाँश के ऊपर यह  मोहर है कि  वह अमुक धर्म के माता पिता के घर जन्मे और कुछ के ऊपर धर्म की यह मोहर है कि वह अमुक धर्म गुरु अर्थात परम्परा का अनुसरण कर रहे हैं और उस सम्रदाय के अनुसार रहन सहन,  पहरावे और पूजा पाठ  करते हैं। असल में अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला तो कोई विरला ही होता है।  कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई सत्य यानी परमात्मा वास्तव में जान पाता है। 

धर्म के दो आयाम हैं: नैतिक आयाम और वैज्ञानिक आयाम। नैतिक आयाम वह धर्म है जिसमें आप पैदा हुए हैं। इसमें आपकी कोई पसंद नहीं। आप सिर्फ एक विशेष परिवार में पैदा हुए हैं ईसाई, हिंदू, मुस्लिम, या कुछ भी। लेकिन वैज्ञानिक आयाम वह है जब आप स्वयं  उसे खोजते हो। बिना खोजे कोई विज्ञान नहीं है। तो जब आप धार्मिक होना चाहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप आध्यात्मिक हो जाते हैं। विज्ञान सार्वभौम है। इसी तरह आध्यात्मिक सत्य सार्वभौमिक हैं। कोई एक विशेष धार्मिक संप्रदाय या क्षेत्र में पैदा हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक होने के कारण  सार्वभौमिक होने के लिए विकसित होता है। यही धर्म का वैज्ञानिक आयाम है जो साधना  से आता है। केवल एक विशेष परंपरा में पैदा होने से आपको यह नहीं मिलता है।

 

आध्यात्मिक स्तर पर धर्म हर व्यक्ति की परमात्मा और प्रकृति के प्रति उस की व्यक्तिगत धारणा, आस्था और विश्वास है।   उस आस्था और विश्वास के आधार पर परमात्मा की प्राप्ति के लिए उस के प्रयास, उस की साधना, उस के भाव और भावनाएं, उस का व्यवहार, उस के रीति रिवाज़:   इन सब के  समूह को उस का व्यक्तिगत धर्म या धर्म आधारित व्यवहार कह सकते हैं।  इस लिहाज से देखा जाए तो हर व्यक्ति का आपना आपना धर्म हो सकता है और इस में कोई ऐतराज भी नहीं होना चाहिए।   प्रकृति ने हर मनुष्य को अलग रूप और रंग और स्वाभाव दिया है। कोई किसी से मिलता नहीं।   कोई आस्तिक हो सकता है तो कोई नास्तिक।  किसी के लिए परमात्मा निर्गुण निराकार है और किसी के लिए सगुण  साकार।  कोई मूर्ती पूजा करता है तो कोई पुस्तक  पड़ता है।  कोई सत्संग कीर्तन करता है तो कोई गुफा में बैठ कर साधना करता है।  कोई पूजा अर्चना करता है तो कोई इबादत करता है। 

परम्परा प्राय रूढ़िवादी होती है। परन्तु बदलते समय के साथ इस में सुधार अपेक्षित रहता है।   अनुसंधान सभी परंपरा का हिस्सा बना रहे तो यह सामयिक हो जाती हैं। जब परंपरा इन चीजों को खो देती है तो वह कट्टरता या हठधर्म  होने लगती है। कोई धर्म वैर भाव नहीं सिखाता।  परन्तु हठधर्म के कारण अलग अलग सम्प्रदाय कुएँ के मेंढक बन जाते हैं और एक दुसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लग जाते हैं।  सम्प्रदायिक  झगड़ों की नींव यहीं से रखी जाती है।  अध्यात्म और धर्म स्वयं इन सभी संघर्षों से परे है। यह शांति, प्रेम और सद्भाव के लिए है। परन्तु जब यह सामाजिक राजनीतिक ताकतों से प्रभावित होता है और इसके आगे झुक जाता है तो यह संकीर्ण और रूढ़िवादी  बन जाता है जिससे संघर्ष, असहिष्णुता हिंसा और यहां तक कि विज्ञान की भावना का भी दमन होता है। इसे ही धर्म का अनैतिक आयाम कहा जाता है। समाज में आजकल जो धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है वह इसी अनैतिक आयाम का प्रभाव है। आवश्यकता है आध्यात्मिक बनने की।  आइये विज्ञान के इस युग में धर्म के वैज्ञानिक आयाम का अनुसरण कर अध्यात्म को प्राप्त हों और हठधर्म का त्याग करें और धर्म को राजनीति से तो हमेशा दूर  रखें। ऐसी शुभकामना है। 

 

सतीश कालड़ा, बैंगलोर 

iamsatishkalra@gmail.com