मानव शरीर के सात चक्र
विज्ञान और तकनीक के इस युग में धर्म को आदिकालीन, पिछड़ा और रूढिवाद कह कर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। परन्तु हिन्दू वैदिक संस्कृति में कितने ही ऐसे आयाम हैं जिन में प्रकृति के ऐसे ऐसे रहस्यों की व्याख्या है जिस तक आधुनिक विज्ञान को पहुँचने में शायद काफी समय लगेगा। मानव मनोविज्ञान और शरीर क्रिया का जो अध्ययन योग गुरुओं ने किया है उस की बारीकी तक विज्ञान कब पहुंचे गा कह नहीं सकते। निम्नलिखित ज्ञान मैंने योग गुरु श्री श्री रवि शंकर जी के कुछ परवचनो से संकलित किये हैं। इन्हें पढ़ कर आप इस बात का खुद अन्दाज़ लगा सकते हैं कि प्रकृति के यह कितने गहन रहस्य हैं। कोई अतिश्योक्ति हो जाए तो पहले से ही क्षमा प्रार्थना करता हूँ।
गुरुदेव कहते हैं मानव शरीर में मुख्य सात चक्र है। चक्र माने जहाँ नस नाडियां सब एकत्रित होती हैं। तो हमारे शरीर में सात चक्र हैं। प्रथम है मूलाधार चक्र जहाँ से रीढ़ की हड्डी शुरू होती है। यह गुदा प्रदेश के पास है। उससे 2-4 ऊँगली ऊपर जननेद्रीय के पीछे है दूसरा चक्र जिसे स्वादिष्ठान चक्र कहते हैं। तीसरा चक्र नाभि पर है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। चौथा चक्र हृदय में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। पाँचवाँ चक्र गले में है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। छटा चक्र दोनों भौहों के बीच जो स्थान है वहां स्थित है जिसे आज्ञा चक्र कहते है। और सातवां चक्र है सर की छोटी पर। इसे सहस्त्रार कहते हैं।
क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं? जी हाँ। हमारी भावनायों की संवेदना इन चक्रों से जुडी रहती हैं। आपने महसूस किया होगा की जब हमें डर लगता है तो हमारी गुदा सिकुड़ जाती है। जब ईर्ष्या होतो है तो पेट में जलन होती है। प्रेम और द्वेष की भावना का सम्बन्ध हृदय चक्र से रहता है।
गुरूदेव का कथन है कि प्राण ऊर्जा एक ही है। इस का अनुभव अलग अलग चक्रों में अलग अलग तरह से होता है। कुछ अनुभव सकारात्मक होते हैं कुछ नकारात्मक। जैसे मूलाधार चक्र स्थिरता का द्योतक है और जड़ता भी इसी के कारण से होती है। पृथ्वी तत्व का प्रभाव शरीर पर इसी चक्र से महसूस होता है। पृथ्वी स्थिरता प्रदान करती है। ढोल नगाड़े जैसे वाद्य इस चक्र को प्रभावित करते है। स्वादिष्ठान चक्र से जनन इन्द्रिय प्रभावित होती है। जल तत्व का प्रभाव इस चक्र से संचालित होता है। इस चक्र का सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति में सृजन और कला को उजागर करता है और इस का नकारात्मक प्रभाव काम वासना उत्पन करता है।
तीसरा चक्र नाभि क्षेत्र में है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। अग्नि तत्त्व इस चक्र को प्रभावित करता है। इस चक्र के सही ढंग से काम करने से मनुष्य में संतोष, उदारता और ख़ुशी की भावना बनी रहती है। इस चक्र का नकारात्मक प्रभाव ईर्ष्या और द्वेष है। ईर्ष्या और द्वेष से पेट में जलन होना स्वाभाविक है। इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में तार से संगीत निकलता है जैसे सितार, एक तारा, इत्यादि।
चौथा चक्र हृदय क्षेत्र में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। जीवन मैं शुद्ध प्रेम की भावना इस चक्र से संचालित होती है और वायु तत्त्व इस को प्रभावित करता है। प्रेम उन्मुख हुआ व्यक्ति वायु तत्त्व के प्रभाव से वायु की तरह चंचल रहता है। इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में वायु से संगीत निकलता है जैसे कि बांसुरी, माउथ ऑर्गन इत्यादि।
पाँचवाँ चक्र गले में है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। यह आकाश तत्त्व से प्रभावित है। कृतज्ञ होने के भाव हमें इस चक्र से महसूस होते है। आप ने महसूस किया होगा कि कृतज्ञ होने पर गला रौंद जाता है। दुखी इंसान को भी गले में हरकत महसूस होती है। आकाश तत्त्व की प्रधानता के कारण इस चक्र को भी बांसुरी जैसे यंत्र ही प्रभावित करते हैं।
आज्ञा चक्र ज्ञान का चक्र है और दोनों भौहों के बीच जो स्थान है वहां स्थित है। ज्ञान और क्रोध का अनुभव इस चक्र से होता है। और सातवां चक्र है सर की छोटी पर। इसे सहस्त्रार कहते हैं। ज़िन्दगी में आनंद का अनुभव इस चक्र से होता है। अगर कोई सो रहा हो तो उस के सर की छोटी के ऊपर 12 ऊँगली की दूरी तक अगर थोड़ा हाथ हिला दो या हलकी सी चुटकी की आवाज़ करो या उनका नाम फुसफुसाओ तो वह जग जाएगा। उनको छूने की ज़रुरत नहीं।
क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं और इनको खोट रहित करने के लिए साधना कर सकते हैं? जी हाँ। जब हम आपने शरीर के इन चक्रों पर ध्यान दे कर साधना करते हैं या समाधी लगते हैं तो पहले तो कुछ अनुभव नहीं होता। खालीपन सा लगता है। फिर थोड़े दिन के अभ्यास के उपरान्त वहां स्पंदन होने लगता है। तरंग का अनुभव होता है। गुरुदेव कहते हैं कि अभ्यास करने से तरंगों के अनुभव के पश्चात प्रकाश भी अनुभव में आता है। यह सब निरंतर और सत्कार सहित सहज समाधि का अभ्यास करने से अनुभव में आता है और सहज समाधि की दीक्षा किसी अच्छे गुरु से ली जा सकती है। साधना के लिए मधुर संगीत का श्रवण भी किया जा सकता है। हर चक्र को उजागर करने के विभिन्न वाद्य और राग भी हैं।
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सतीश कालड़ा, बैंगलोर
देवताओं का निवास
शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है—
१. आँख — चन्द्र, सूर्य
२. कान —दशो दिशाएँ
३. नाक —अश्विनी कुमार
४. मुँह — अग्निदेव
५. जिभ्या — वरुण
६. हाथ — इन्द्र
७. पैर — उपेन्द्र
८. गुदा — गणेश
९. लिंग —ब्रह्मा
१०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी
११. हृदय — शिव-पार्वती
१२. कंठ — सरस्वती
१३. आज्ञाचक्र-- शिव

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