हिन्दू धर्म: पुरातन और सनातन
आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। उत्तर पूर्व भारत के अधिकाँश राज्यों में आदिवासी ईसाई हो चुके। मेघालया, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड में तो 70% से ज़्यादा ईसाई हो गए हैं। ओडिशा, आंध्र, तमिल नाडु, कर्नाटक में भी काफी लोगों को ईसाई बनाये जाने का आरोप है। अब तो पंजाब जैसे प्रदेश में भी काफी दलित या मजहबी सिख ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे हैं। क्या कभी किसी ने सोचा है कि क्यों दलित, आदिवासी और अनुसूचित जनजाति आसानी से ईसाई बन जाते हैं। ईसाई धर्म में परिवर्तन के लिए तीन रास्ते अपनाये जाते हैं: स्कूल, हस्पताल और पैसे का लोभ। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 2.3% जनता ईसाई है और चार राज्यों में ईसाई बहुसंख्या में हैं। हिन्दुओं का अधिकाँश ईसाईकरण 1947 के बाद हुआ।
1947 में एक बार तो देश का बटवारा इस्लाम के नाम पर हो गया और पकिस्तान और बांग्लादेश इस्लाम के नाम पर बन गए। अब देश में 15% जनता मुस्लिम है। आजकल हिन्दू से इस्लाम धर्म में परिवर्तन तो शायद कम है। परन्तुु यह चर्चा में है कि मुस्लिम जनसँख्या की वृद्धि हिन्दुओं से ज़्यादा है। पिछले दशक (2001-2011) में हिंदू जनसंख्या में 16.76% वृद्धि हुई जबकि मुस्लिम विकास दर 24.60% थी। शादी विवाह के कारण भी कई लड़कियां मुस्लिम बन जाती है। कई मर्द दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम बन जाते हैं। जिस गली, कूचे, गाँव, शहर या प्रदेश में मुस्लिम जनसँख्या बढ़ जाती है वहां हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं और धीरे धीरे किनारा करने पर मज़बूर हो जाते हैं। जम्मू कश्मीर में 68% जनता मुस्लिम है और 1991 में वहां से कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर दिया गया और आज तक वापिस घर नहीं जा पाए। केरल और बंगाल में 27% जनता मुस्लिम है। उत्तर प्रदेश, बिहार में इस तरह के बहुत उदाहरण हैं जहाँ पर कई गली, कूचे, गाँव, शहर में मुस्लिम बहुसंख्या में हैं। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस क्यों करते हैं और मुस्लिम एक इलाके में इकट्ठे होकर क्यों रहते हैं यह अलग लेख का विषय है परंतु सच यह है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं।
धर्म को असल खतरा आधुनिक जीवन शैली से है। इस के कारण हिन्दू स्वयं ही धार्मिक रीति रिवाज़ को भूल रहे हैं। विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी अर्थव्यवस्था और सभ्याचार पर गहरा प्रभाव डाला है। इस के कारण पूंजीवाद का बोलबाला है। आज का आधुनिक मनुष्य दिन भर के काम से फुर्सत पाकर मंदिर, मस्जिद, गिरिजा घर या गुरुद्वारा जाने की बजाय जिम में गेम खेलना पसंद करता है या क्लब में जाकर दोस्तों के साथ समय व्यतीत करता है। वह परम्परागत तीज त्योहारों को महत्व नहीं देता बल्कि मनोरंजन के नए नए विकल्प ढूंढता है। रिश्ते नाते प्यार वफ़ा अब मानव के व्यवसाय की व्यस्तताओं और ज़रूरतों की भेंट चढ़ गए हैं। परिवार टूट रहे हैं। संयुक्त परिवार तो रहे नहीं। एकाकी परिवारों में भी पति पत्नी इकट्ठे नहीं रह पाते। परम्परा मालूम ही नहीं तो पालन कैसे होगा।
कितने हिन्दू हैं जिनको हिन्दू धर्म और संस्कृति की सही पहचान है और वह इस का गर्व महसूस करते हैं कि वह हिन्दू हैं। हिन्दू धर्म की पहचान मात्र तिलक, चोटी, साड़ी, बिन्दी, सिन्दूर, मौली, भगवा, केसरिया और मंदिर शिवालों जैसे प्रतीकों से ही नहीं है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है वेद, शास्त्र, योग, आयुर्वेद, रामायण, महाभारत, भगवद गीता। हिन्दू संस्कृति की पहचान है गृहस्थ जीवन जिस में माता पिता की सेवा, नारी का सम्मान, साधु संत और अतिथि का आदर सत्कार है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का चिंतन और प्रयास। हिन्दू संस्कृति की पहचान है सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य अस्तेय और अपरिग्रह का अनुशासन। हिन्दू संस्कृति की पहचान है शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान जैसे नियम। हिन्दू संस्कृति की पहचान है ऐसी जाति प्रथा जिस में एक गोत्र में विवाह नहीं होता। हिन्दू संस्कृति की पहचान है भजन, कीर्तन, मन्त्र, श्लोक, साधना, सत्संग सेवा। हिन्दू संस्कृति की पहचान है समय की वह गणना जिस में सृष्टि के काल चक्र की पहचान है: जिस में महीने का हिसाब सूर्य और चन्दृमाँ की गति पर रखा जाता है। सूर्य की 12 राशिआँ और बारह सौर मास हैं। प्रत्येक महीने में चाँद की कलाओं के अनुसार 15-15 दिन के दो पक्ष - शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक वर्ष में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 28 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीज त्यौहार जो प्रकृति के साथ मेल खाते हैं। हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीर्थ स्थान और मंदिर, आश्रम और गुरुकुल। हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के साधु संत, ऋषि और मुनि और तपस्वी। हिन्दू संस्कृति की पहचान है कर्म फल का ध्यान जो कहता है जैसा करोगे वैसा भरो गे। हिन्दू संस्कृति की पहचान है जीवन में पाप और पुण्य का विचार।
जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम हमेशा पर्यासरत रहते हैं। धर्म और विज्ञान दो मार्ग हैं। धर्म पुरातन है और विज्ञान आधुनिक। गत 300 वर्षों में विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी 10,000 साल पुरानी संस्कृति और रहन सहन पर बहुत प्रभाव डाला है। कई मामलों में विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और धर्म की मान्यताओं में स्पष्ट टकराव की स्थिति आ गई है। यह इस पीढ़ी के निर्णय पर निर्भर करता है कि भविष्य में धार्मिक आस्थाओं को माना जाएगा या विज्ञान की खोज को या कोई बीच का रास्ता निकलेगा। आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा है धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। परन्तु विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और उस से प्रभावित संस्कृति और अर्थव्यस्था ने हमारी धार्मिक आस्थाओं पर ज़्यादा प्रभाव डाला है और समाज आजकल धार्मिक अनुष्ठान में विश्वास नहीं रख रहा।
परन्तु ध्यान रहे, विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले और पूंजीवाद कितने भी पैर पसार ले या वामपंथी कितना भी धर्म का विरोध कर लें जब उदासी मन में घर कर लेती है और जब प्राकृतिक आपदा में मनुष्य घिर जाता है तो मन ईश्वर को याद करता है। कहते हैं ना दुःख में सिमरन सब करे सुख में करे ना कोई। जो सुख में सुमिरण करे तो दुःख काहे को होये। विज्ञान से प्रभावित मनुष्य सब कुछ परखना चाहता है। वह ईशवर और आस्थाओं को अंधविश्वास और रूढ़िवाद कहता है और उस के बारे में उदासीन है। परन्तु हज़ारों वर्ष की परम्परा और विवेक को रूढ़िवाद कह देना भी रूढ़िवाद है। ज़िन्दगी में कुछ जान कर चलो कुछ मान कर चलो। हज़ारों वर्ष पुरातन संस्कृति से उदास मत हो जाइये। यह पुरातन भी है और सनातन भी। विज्ञान ने इस के कई पहलूयों को सही माना है। इस लिए राम को समझो, कृष्ण को जानो, गीता ज्ञान हासिल करो, कर्मयोग को समझो, राजयोग को समझो, भक्ति और ज्ञान का मार्ग अपनाओ। तीर्थ यात्र करो। सही साधु संतों का सानिध्य प्राप्त करो। सत्संगत करो। और परम्परागत संस्कारों का सम्मान करो। अगले कुछ अंको में इन पर चर्चा करेंगे।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
24.02.2022

No comments:
Post a Comment