स्वामी विवेकानन्द –अकेला सेनानी
शिकागो: सितंबर 1893
सितम्बर 1893 में अमेरिका ने शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन किया। संसद का मुख्य उद्देश्य था: 1. विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच अंतर-धार्मिक समझ और संवाद को बढ़ावा देना। 2. दुनिया भर से धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं की विविधता को प्रदर्शित करना। 3. धार्मिक सहिष्णुता और सहयोग के माध्यम से वैश्विक एकता और शांति को बढ़ावा देना। अमेरिका में कई आयोजन किये जा रहे थे जो कोलंबियाई प्रदर्शनी का हिस्सा थे। क्रिस्टोफर कोलंबस के अमेरिका में आगमन की 400वीं वर्षगांठ मनाने वाला यह विश्व स्तर का मेला था। प्रदर्शनी मई से अक्टूबर 1893 तक शिकागो में आयोजित की गई थी। विश्व धर्म संसद इसी प्रदर्शनी का भाग थी और एक अभूतपूर्व आयोजन था, क्योंकि इसमें हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, यहूदी धर्म और अन्य सहित विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि अपनी मान्यताओं को साझा करने और चर्चाओं में शामिल होने के लिए एक साथ आए थे। स्वामी विवेकानंद, एक भारतीय हिंदू भिक्षु, संसद में मुख्य वक्ताओं में से एक थे, और उनके संबोधन ने वैश्विक दर्शकों को वेदांत और हिंदू धर्म से परिचित कराने में मदद की।
स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म के अधिकृत प्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि वह स्वयं ही धर्म संसद में भाग लेने पहुँच गए थे। अभी तक भारत में भी उन्हें ख्याति प्राप्त नहीं हुई थी। बस उनमें आत्म विश्वास था। स्वामी विवेकानंद ठाकुर
रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे और वेदांत और उपनिषदों के ज्ञाता थे और विषयों में दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टि रखते थे। इसलिए 1893 में विश्व धर्म संसद में वेदांत दर्शन और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने का उन्हों ने संकल्प ले लिया। उस समय, कोई ऐसा संगठन नहीं था जो किसी को हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत कर सके। आज भी शायद नहीं है। हिंदू धर्म हमेशा से ही विभिन्न संप्रदायों, परंपराओं और स्वतन्त्र और विविध विचारधारा रखने वालों का धर्म रहा है। स्वामी जी ने अपने शिष्यों और जानकार लोगों से बात की। शिष्य मण्डली के कुछ बुद्धिजीवी और सुधारक लोगों ने स्वामी जी में वह प्रतिभा देखी और उन्हे प्रेरित किया। मैसूर और खेतड़ी (राजस्थान) के तात्कालिक महाराजा ने उन के अमेरिका जाने के लिए कुछ धन और साधन उपलब्ध करवा दिए और स्वामी जी अमेरिका पहुँच गए।
1893 में भारत गुलामी की जंजीरों में फसा हुआ था। भारत में ही हिन्दू धर्म का अंग्रेज़ों और इसाईओं द्वारा किसी न किसी तरह विरोध किया जाता और उपहास भी किया जाता था। उस काल में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में पांच भाषण दिए। जैसे सूरज के उदय होते ही अँधेरा गायब हो जाता है उसी तरह से स्वामी विवेकानद ने विश्व धर्म संसद में हिन्दू धर्म के बारे में पूरी तरह से रौशनी डाल दी। हिन्दू धर्म का आधिकारिक फलसफा शंकर का वेदांत दर्शन है जिस में अद्वैत वाद का ज़िक्र है। इसे भारत का आधिकारिक दर्शन कहा जाता है। शंकराचार्य का वेदांत और अद्वैतवाद संस्कृत की जटिल शब्दावली में दर्ज है। स्वामी जी ने उसको को तत्कालीन अंग्रेजी भाषा में ऐसे शब्दों में व्यक्त किया जो सब को समझ आ गया। इस लिए स्वामी जी के दर्शन को नियो वेदांत कहते हैं।
हालाँकि स्वामी विवेकानंद एक गुलाम देश से गए थे, किसी संगठन का प्रतिनिधत्व नहीं कर रहे थे फिर भी उन के व्याख्यानों की गुणवत्ता के कारण वह धर्म संसद के हीरो बन गए। ऐसे लगा जैसे पिंजरे में पड़े शेर की दहाड़ में कोई कमज़ोरी नहीं क्योंकि वह शेर ही है। एक अकेला सेनानी जिस ने पूरी संसद में जीत प्राप्त कर ली। नमन है नमन है नमन है भारत के अनूठे सपूत को।
सतीश कालड़ा
ऋषिकेश
11.09.2024
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