सनातन संस्कृति: तुम हमें यूँ भुला ना पाओगे
तीज, त्यौहार, उत्सव और समारोह
समाज में तथाकथित आधुनिक लोग सनातन संस्कृति को भूलने का प्रयास कर रहे हैं और पाश्चात्य संस्कृति की नक़ल करना ज़्यादा पसंद करते हैं। परन्तु सनातन संस्कृति कहती है कि तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे। पिछले कुछ लेखों में मैंने ज़िक्र किया था कि हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए हमें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। माता, पिता, परिवार और समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका है समाज में तीज, त्यौहार, उत्सव और समारोहों की जो उत्साह को बढ़ावा देते रहते हैं और रिश्ते नातों को मजबूत करते हैं।
जो तथाकथित आधुनिक लोग आपने आप को हाशिये पर खड़ा महसूस किया करते है वह ना ना करते हुए भी वर्ष में दो तीन धार्मिक अनुष्ठान में तो भाग ले ही लेते हैं। होली दिवाली तो सब मनाते हैं। दीवाली के शुभावसर में शायद ही कोई होगा जो आपने घर में दीये नहीं जलाता और काफी लोग तो लक्ष्मी पूजा भी करते हैं। रिश्ते नातों को मजबूत करने के लिए राखी और भाई दूज पर भाई बहन का मिलन घर घर में उत्सव ही तो है और आपने सुहाग के लिए करवा चौथ का व्रत भी अधिकाँश महिलायें रखती हैं कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि और नवरात्री अन्य त्यौहार हैं जिन से शायद ही कोई अछूता रहता हो। पूर्वजों को याद कर श्राद और तर्पण भी लोग अक्सर किया करते हैं। इसी तरह से मौसम की मस्ती छा जाने पर हरियाली तीज, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी इत्यादि से कौन अछूता रहता है। कई लोग कुलदेवता और स्थान देवता का पूजन भी किया करते हैं। आप में से कई घरों में ऐसा होता होगा कि साल में दो बार मौसम बदलने के दिनों में एक एक दिन के लिए घर में आग जला कर कुछ भी नहीं पकाया जाता। उस दिन पहले से बना बासा खाना ही खाया जाता है। इसे बासडिया भी कहते हैं। रसोई को साफ करने का शायद यह अनूठा तरीका है।
भारत की सनातन संस्कृति में तो हर अमावस, पूर्णिमा, सक्रांति और एकादशी त्यौहार ही है। परन्तु आधुनिक समाज के रहन सहन में अधिकाँश लोग इन का ख्याल नहीं रखते। अधिकाँश लोगों को तो पता ही नहीं होता कि चाँद का कौन सा पक्ष चल रहा है: शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष। कई लोग तो शायद इस शब्दावाली से भी अनजान हैं। शुक्ल पक्ष यानि अमावस से लेकर पूर्णिमा के वह 15 दिन जब रोज़ चाँद का दर्शन थोड़ा थोड़ बढ़ता रहता है। और कृष्ण पक्ष इस का उल्टा। प्रकृति में सब से सुन्दर दृश्य जो पृथ्वी पर लगभग हर जगह देखने को सुलभ हैं वह हैं: प्रातःकाल में सूर्योदय, सायंकाल में सूर्य का अस्त होना और महीने में एक बार रात्रि में पूर्णिमा का चाँद। पूर्णिमा के चाँद की उपमा को लेकर तो कवि लोग अपनी महबूबा की प्रशंसा किया करते हैं और अमावस की काली रात में आसमान में तारागण को देखने का आनन्द ही कुछ और है। पाश्चात्य संस्कृति में तो केवल नववर्ष को धूम धाम से मनाया जाता है। परन्तु हिन्दू संस्कृति में हर महीने की शुरुआत को संक्रांति कह कर मनाया जाता है और नव वर्ष की शुरुआत को युगादी के नाम से। अधिकाँश लोग शायद देशी महीनों के नाम से परिचित नहीं। नव वर्ष की शुरुआत चैत्र मास से होती है। हर साल 13 अप्रैल को बैसाख महीने की सक्रांति होती है। इस के पश्चात अधिकाँश महीने चाँद की कलाओं के अनुसार है। चैत्र और बैसाख से वर्ष की शुरुआत होती है, ज्येष्ठ और आषाढ़ ग्रीषम ऋतू, श्रावण और भाद्रपद मानसून, आश्विन और कार्तिक पतझड़, मार्गशीष और पोष शीतकाल और माघ और फागुन बसंत ऋतू। इस के बाद एक पुरुषोत्तम मास अधिक मास के रूप में होता है ताकि 365 दिन पूरे हो सकें।
प्रत्येक पूर्णिमा देश में किसी न किसी त्यौहार से जुड़ी रहती है। हर महीने कुछ न कुछ अच्छा होता है। आषाढ़ के महीने गुरु पूर्णिमा, जो अनादि काल से गुरुओं की परंपरा को समर्पित है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि व्यास महर्षि ने महाभारत भागवद पुराण इत्यादि ग्रंथों के माध्यम से ब्रह्म ज्ञान और वेदों के सार को जन-जन तक पहुँचाया है।। इसलिए उन्हें वेद व्यास भी कहा जाता है। तो आषाढ़ में है व्यास पूर्णिमा। इससे पहले बुद्ध पूर्णिमा थी, जिस दिन महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान और निर्वाण प्राप्त हुआ था, सभी एक ही दिन। और उससे पहले बैशाख पूर्णिमा और उससे पहले चैत्र पूर्णिमा। होली फागुन की पूर्णिमा को होती है और श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षा बंधन कहा जाता है जब बहनें अपने भाइयों को अपनी सुरक्षा के लिए राखी बाँधती हैं और वह अपने भाई के कल्याण के लिए प्रार्थना करती हैं। कार्तिक मास की पूर्णिमा गुरु नानक जयंती और देव दिवाली। इसलिए हर पूर्णिमा का कुछ न कुछ महत्व होता है।
इसी तरह से व्रत रखने की परम्परा है। अमावस से लेकर पूर्णिमा और पूर्णिमा से अमावस के सफर में एकादशी को लोग व्रत किया किया करते हैं सेहत को अच्छा रखने के लिए। महीने में दो व्रत का नियम रखने से सेहत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। कई लोग तो हर सप्ताह सोमवार या मंगलवार को व्रत का संकल्प ले लेते हैं। इस से सेहत पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और साथ साथ सोमवार को शिव पूजन या मंगल को हनुमान पूजन भी हो जाता है। इसी तरह से सप्ताह के शेष दिनों में भी पूजन करने का प्रचलन है। बुद्ध को गणेश वन्दना, वीर को गुरुपूजा, शुक्र को देवी पूजा और शनि को शनि देव की पूजा अर्चना से लाभ होता है। ऐसा काफी लोग मानते है। अक्सर लोग यह संकल्प ले लेते हैं कि मंगलवार और नवरात्रों में मीट मॉस नहीं खाना और मदिरपन भी नहीं करना। इसी बहाने इन से कुछ निजाद मिलती है।
त्यौहार मनाने के दो महत्वपूर्ण मौसम हैं: बसंत और मॉनसून। जनवरी में मकर संक्रांति से मौसम करवट लेता है तो त्यौहार शुरू हो जाते हैं। दूसरी तरफ मॉनसून के शुरू होते ही चातुर्मास लग जाता है और धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। मार्गशीष के महीने की प्रथम तिथि। पूरे भारत में उत्सव का माहौल हो जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, माघी का त्यौहार, उत्तर पूर्व में भोगाली बिहू, गंगा, यमुना के किनारे मकर संक्रांति और दक्षिण भारत में इसे पोंगल कह कर मनाते हैं। इसके उपरान्त माघ महीने की पांचवी तिथि को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है और माँ सरस्वती जो कि ज्ञान और संगीत की देवी है उनकी पूजा की जाती है। कई प्रदेशों में पतंग उड़ाए जाते हैं। बसंत का महत्त्व तो भारत में बताने की ज़रुरत नहीं। मौसम ही इतना रमणीक है। डाली डाली फूल खिल जाते हैं और पशु पक्षी इसी काल में प्रजनन करते हैं। इस के बाद महाशिवरात्रि मनाई जाती है जो कि सनातन धर्म का बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है।
श्रावण उत्सव का महीना है। इतने सारे उत्सव शुरू हो जाते हैं। रक्षा बंधन के बाद जन्माष्टमी आएगी, जो भगवान् कृष्ण का जन्मदिन है। फिर गणपति के बाद नवरात्रि और उस के के बाद दशहरा और दिवाली। तो हर सप्ताह और हर दिन कोई न कोई त्योहार। जीवन का जश्न मनाने का कोई भी बहाना अच्छा है। आज, जब दुनिया इस तरह के उदास मूड में हो रही है, ये उत्सव निश्चित रूप से मानव भावना को ऊपर उठाते हैं। तो, इन त्योहारों का सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अपना उद्देश्य और उपयोगिता है। हमें उन बातों का पालन करना चाहिए। हमें इन परंपराओं का पालन करना चाहिए क्योंकि ये सभी जाति, पंथ, धर्म आदि के लोगों को एकजुट करती हैं। जब आज कई विभाजनकारी ताकतें हैं तो हमें जागना और देश के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करना जरूरी है।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
01.09.2022

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