सनातन धर्म: शास्त्र और धर्म ग्रन्थ
उठो, जागो और जो वरदान मिला है उसे सुनो
Seema Sandesh Srigangaganagr 16.09.2022
पिछले लेख में मैंने रामायण और महाभारत का ज़िक्र किया था। पाठकों का अनुरोध है कि सनातन धर्म के बाकी शास्त्र और धर्म ग्रन्थों का भी ज़िक्र किया जाए। इस सन्दर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि मैंने उन विषयों का ज़िक्र करने का संकल्प लिया था जो जनसाधारण को सहजता से सुलभ हैं। वेद, शास्त्र, उपनिषद इत्यादि को सुनना, समझना और समझाना तो विद्वान् और पंडित लोगों का काम है। इसे गुरु शिष्य परम्परा से ही समझना उचित है। फिर भी पाठकों के अनुरोध को मद्देनज़र रखते हुए सामान्य ज्ञान हित्तार्थ जो सूचना प्राप्त की है उस का विवरण दे रहा हूँ। कोई अतिश्योक्ति हो जाए तो अग्रिम क्षमाप्राथना है क्योंकि मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूँ।
पहली श्रेणी के हिन्दू धर्म ग्रन्थ वेद अर्थात श्रुति कहलाते हैं। ये अपौरुषेय माने जाते हैं यानी इन का कोई एक लेखक नहीं। वेद संख्या में चार हैं जो हिन्दू धर्म के आधार स्तंभ हैं: ऋगवेद, सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद। प्रत्येक वेद के चार भाग हैं: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण भाग, अरण्यक और उपनिषद।
दूसरी श्रेणी के ग्रन्थ स्मृति और आगम कहलाते हैं। ये ऋषि प्रणीत माने जाते हैं। इस श्रेणी में 18 स्मृतियाँ, 18 पुराण तथा रामायण व महाभारत ये दो इतिहास भी माने जाते हैं। भगवद्गीता महाभारत का ही भाग है परन्तु आपने आप में सम्पूर्ण ग्रन्थ है। आगम ग्रन्थ भी स्मृति-श्रेणी में माने जाते हैं। उपास्य देवता की भिन्नता के कारण तीन प्रकार के आगम हैं: वैष्णव आगम (पंचरात्र तथा वैखानस आगम), शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धांत, त्रिक आदि) तथा शाक्त आगम।
भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के साथ मिलकर वेदान्त की 'प्रस्थानत्रयी' कहलाते हैं। ब्रह्मसूत्र, वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है। इसके रचयिता महर्षी बादरायण हैं। इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र, शारीरक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस पर अनेक आचार्यों ने भाष्य भी लिखे हैं। ब्रह्मसूत्र में उपनिषदों के दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विचारों के साररूप को एकीकृत किया गया है।
वेद प्राचीनतम हिंदू ग्रंथ हैं। वेद शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'विद्' धातु से हुई है। विद् का अर्थ है जानना या ज्ञानार्जन, इसलिये वेद को ज्ञान का ग्रंथ कहा जा सकता है। भारतीय मान्यता के अनुसार ज्ञान शाश्वत है अर्थात् सृष्टि की रचना के पूर्व भी ज्ञान था एवं सृष्टि के विनाश के पश्चात् भी ज्ञान ही शेष रह जायेगा। चूँकि वेद ईश्वर के मुख से निकले और ब्रह्मा जी ने उन्हें सुना इसलिये वेद को श्रुति भी कहा जाता हैं। श्रुति यानि जो सुना गया है। श्रुति ऋषियों द्वारा की गई खोज और अनुभूति है। ऋषियों ने इसे सुना और इसे देवों से प्राप्त किया और बार बार गाया। इन पवित्र शिक्षाओं को आधुनिक काल तक कभी नहीं लिखा गया था, बल्कि दिल से इसे याद किया जाता रहा और लगातार दोहराया जाता रहा। ऋषिओं ने इसे अपने शिष्यों के लिए गाया जो मनन करते करते मुनि बन गए, और मनीषियों ने उन्हें उसके आगे शिष्यों के लिए गाया। गुरु शिष्य परम्परा से बार-बार ज्ञान गाया और सुना गया जब तक कि वह पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर लिया गया। शिष्य अभी भी इसी तरह श्रुति सीखते हैं जैसे उनके पूर्वजों ने इसे बहुत प्राचीन काल में सीखा था, और आज भी आप किसी भी वैदिक पाठशाला या गुरुकुल में इसका जप पाठ करते हुए विद्यार्थिओं को सुन सकते हैं। इस को सुनना, समझना और गाना तो विद्वान् और पंडित लोगों का काम है परन्तु साधारण जनमानस के लिए इनको सुनने में ही इतना आनंद है जिस का ब्यान नहीं किया जा सकता। कानून की पुस्तकों का या संविधान का जनसाधारण को कोई ज्ञान नहीं होता है। वह तो विद्वान वकीलों का काम है। जब ज़रूरत पड़ती है हम वकील की सलाह ले लेते हैं। इसी तरह से श्रुति और स्मृति विद्वानों और पंडितों का विषय है। जन साधारण इन का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करने मात्र से ही कल्याण हो जाता है और आवश्यकता पढ़ने पर पंडित जी से धार्मिक अनुष्ठान करवा लिया जाता है। आपमें से भी अगर कोई इस ज्ञान को हासिल करना चाहे तो गुरुकुल सही स्थान है। पुरातन काल में शायद केवल ब्राह्मण परिवार के सदस्य इस शिक्षा को हासिल करते थे। अब तो कोई भी इस की शिक्षा ग्रहण कर सकता है। गुरुकुल में इसके लिए BA, MA, PhD भी की जा सकती है।
प्रत्येक वेद के चार भाग हैं: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण भाग, अरण्यक और उपनिषद। मन्त्र संहिता में मंत्रों का संग्रह है। मन्त्र वह वाक्य होते हैं जिनमें ध्वनियों के क्रम में एक विशेष शक्ति होती है जो कुछ प्रभाव उत्पन्न करती है। ये देवताओं के भजनों के रूप में हैं। जब उचित पर्शिक्षित व्यक्तियों द्वारा इनका उचित उच्चारण किया जाता है, तो कुछ परिणाम सामने आते हैं। इनका उपयोग धार्मिक आनुष्ठानो और समारोहों में किया जाता है, और समारोह का प्रभाव् मुख्य रूप से उनके उचित दोहराव पर निर्भर करता है। श्रुति में जो पाया जाता है वह सर्वोच्च ज्ञान है और इसके सच्चे अनुयायी इसको अटल सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। सनातन धर्म के सभी संप्रदाय, सभी दार्शनिक प्रणालियां, श्रुति को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करती हैं और हर विवाद का निर्धारण इन्हीं से करते हैं।
उपनिषद् ‘वेद’ के अन्त में आते हैं। ‘वेद’ साहित्य के अन्त में होने के कारण उपनिषद् वेदान्त कहे जाते हैं और इन का शाब्दिक अर्थ है गुरु के समक्ष बैठ कर लिया गया ज्ञान। इस भाग में ब्रह्म की प्रकृति, सर्वोच्च और पृथक आत्मा पर, मनुष्य और ब्रह्मांड पर, बंधन और मुक्ति पर गहरी दार्शनिक शिक्षाएं शामिल हैं। इस विभाग के ग्रन्थों की संख्या 123 से लेकर 1194 तक मानी गई है, किन्तु उनमें 10 ही मुख्य माने गये हैं: ईष, केन, कठ, प्रश्, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक। इस के अतिरिक्त श्वेताश्वतर और कौशीतकि को भी महत्त्व दिया गया हैं। केवल उच्च शिक्षित पुरुष ही उपनिषदों का अध्ययन कर सकते हैं; दूसरों के लिए यह बहुत कठिन है। वेद का एक और भाग था, जिसे तंत्र कहा जाता है। तांत्रिक विद्या में विज्ञान और विज्ञान पर आधारित व्यावहारिक निर्देश शामिल थे। लेकिन बहुत कम सच्चा प्राचीन तंत्र बचा है। ऋषिओं ने इसे कलयुग के लिए अनुपयुक्त समझा जब लोग कम आध्यात्मिक हैं।
स्मृति: जिन महर्षियों ने श्रुति के मन्त्रों को प्राप्त किया, उन्हींने अपनी स्मृति की सहायता से जिन धर्मशास्त्रों के ग्रन्थों की रचना की, वे `स्मृति ग्रन्थ´ कहे गये हैं। इनमें समाज की धर्ममर्यादा - वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, राज-धर्म, साधारण धर्म, दैनिक कृत्य, स्त्री-पुरूष का कर्तव्य आदि का निरूपण किया है। स्मृतियाँ स्मृतिकार के नाम से ही प्रसिद्द हैं: मनु २ अत्रि ३ विष्णु ४ हारीत ५ याज्ञवल्क्य ६ उशना ७ अंगिरा ८ यम ९ आपस्तम्ब १० संवर्त ११ कात्यायन १२ बृहस्पति १३ पराशर १४ व्यास १५ शंख १६ लिखित १७ दक्ष १८ गौतम १९ शातातप २० वशिष्ठ। इनके अलावा निम्न ऋषि भी स्मृतिकार माने गये हैं और उनकी स्मृतियाँ उपस्मृतियाँ मानी जाती हैं। १ गोभिल २ जमदग्नि ३ विश्वामित्र ४ प्रजापति ५ वृद्धशातातप ६ पैठीनसि ७ आश्वायन ८ पितामह ९ बौद्धायन १० भारद्वाज ११ छागलेय १२ जाबालि १३ च्यवन १४ मरीचि १५ कश्यप … आदि
हिंदू समाज स्मृति में दिए कानूनों पर आधारित और संचालित होता रहा है। मनु स्मृति आर्य कानून का मुख्य संग्रह है। बाकी स्मृतियों का अब अधिक अध्ययन या उल्लेख नहीं किया जाता सिवाय कुछ दक्षिणी के भारत भागों में। आजकल तो मनुस्मृति को लेकर समाज भी कई विवाद हैं। उच्चतम न्यायालय ने मनुस्मृति को लेकर कुछ महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं जिन का अनुपालन अनिवार्य है।
पुराण: वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ होने के कारण आम आदमियों के द्वारा उन्हें समझना बहुत कठिन था, इसलिये रोचक कथाओं के माध्यम से वेद के ज्ञान की जानकारी देने की प्रथा चली। इन्हीं कथाओं के संकलन को पुराण कहा जाता हैं। पौराणिक कथाओं में ज्ञान, सत्य घटनाओं तथा कल्पना का संमिश्रण होता है। पुराण ज्ञानयुक्त कहानियों का एक विशाल संग्रह होता है। पुराणों को वर्तमान युग में रचित विज्ञान कथाओं के जैसा ही समझा जा सकता है। पुराण संख्या में अठारह हैं।18 पुराणों के नाम इस प्रकार है - ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण - वायु पुराण, श्रीमद्भावत महापुराण - देवीभागवत पुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेय पुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण, लिंगपुराण, वाराह पुराण, स्कन्द पुराण, वामन पुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण। इनके अलावा देवी भागवत में 18 उप-पुराणों का उल्लेख भी है - गणेश पुराण, नरसिंह पुराण, कल्कि पुराण, एकाम्र पुराण, कपिल पुराण, दत्त पुराण, श्रीविष्णुधर्मौत्तर पुराण, मुद्गगल पुराण, सनत्कुमार पुराण, शिवधर्म पुराण, आचार्य पुराण, मानव पुराण, उश्ना पुराण, वरुण पुराण, कालिका पुराण, महेश्वर पुराण, साम्ब पुराण, सौर पुराण। अन्य पुराण है: पराशर पुराण, मरीच पुराण, भार्गव पुराण, हरिवंश पुराण, सौरपुराण, प्रज्ञा पुराण, पशुपति पुराण। पुराणों में सृष्टिक्रम, राजवंशावली, मन्वन्तर-क्रम, ऋषिवंशावली, पंच-देवताओं की उपासना, तीर्थों, व्रतों, दानों का माहात्म्य विस्तार से वर्णन है। इस प्रकार पुराणों में हिन्दु धर्म का विस्तार से ललित रूप में वर्णन किया गया है।
रामायण और महाभारत को इतिहास ग्रंथ माना जाता है। जबकि श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का ही अंश है, इसमें प्राप्त अमूल्य ज्ञानबोध के कारण इसको स्वतन्त्र ग्रंथकी मान्यता प्राप्त है।
इस के अतिरिक्त हिन्दू धर्म ने भक्ति, विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में शानदार साहित्य और संस्कृति को जन्म दिया है: संस्कृत भाषा, व्याकरण, ज्योतिष, आयुर्वेद और कविता इत्यादि। भारतीय दर्शनशास्त्र में भी छः विभाग हैं। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है: (१) न्याय -- महर्षि गौतम; (२) वैशेषिक -- महर्षि कणाद; (३) साङ्ख्य -- महर्षि कपिल; (४) योग -- महर्षि पतञ्जलि; (५) पूर्व मीमांसा -- महर्षि जैमिनी; (६) उत्तर मीमांसा या वेदान्त -- महर्षि वादरायण। इन सभी का एक ही उद्देश्य है: मानव स्वयं को सक्षम करके अपनी व्यथा और दर्द का अंत कैसे कर सकता है और परमात्मा के साथ फिर से कैसे जुड़ सकता है। हर मानव के सोचने और काम करने के तरीके अलग-अलग हैं। इसी तरह से वह अलग अलग रास्ते ढूँढ़ता है। जैसे अलग-अलग सड़कें एक शहर की ओर ले जाती हैं इसी तरह से भारतीय दर्शन की छह प्रणालियां हैं।
सनातन धर्म पूरी तरह से बताता है कि भगवान, या आत्मा का सटीक और वास्तविक स्वरूप क्या है, और यह दर्शाता है कि मनुष्य की जीवात्मा मूल रूप से इस ईश्वर का अंश ही है और बताता है कि मनुष्य कैसे और क्या करे ताकि कर्म उसे बांध न सके; और अंत में ईश्वर की माया शक्ति क्या है, जिसके द्वारा यह सारा संसार प्रकट होता है और गायब हो जाता है, वह कैसे योग के अभ्यास के द्वारा खुद को भगवान् के साथ मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
26.08.2022

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