Saturday, August 27, 2022

हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान: भाग- 2



हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान 

भाग- 2

सीमा सन्देश 27.08.2022 

 पिछले अंक में मैंने लिखा था कि मैं हिन्दू हूं और हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए मुझे कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा। माता, पिता, परिवार और समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा गए। अब अगर कोई मुझ से पूछे कि हिन्दू संस्कृति क्या है तो मुझे उस को परिभाषित करना असंभव सा लगता है। परिभाषित करने का अर्थ है कोई सीमा निर्धारित करना। हिन्दू धर्म और संस्कृति में अथाह गहराई और विशालता है और कोई सीमा नहीं। इसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सब का मार्ग प्रशस्त किया गया है। यह सब को सुलभ है चाहे कोई कर्म प्रधान हो, ज्ञान प्रधान हो या भावना प्रधान। इसमें अनुशासन भी है और कला और गीत संगीत भी। इस में प्रकृति की समझ भी है और प्रकृति के आधार परमात्मा की आस्था भी है और नास्तिक प्रथा भी है (यथा चार्वाक) । इस में कोई हठधर्म नहीं। यह एक जीवन जीने की परम्परा है जो सदियों से ऋषिओं मुनिओं के अनुभव और अनुसन्धान से लेकर सामान्य जनमानस के आचरण और व्यवहार में आ गई और परिपक्व होती चली गई और निरंतर चल रही है। इसीलिए इसे सनातन धर्म की संज्ञा भी दी गई है। सनातन यानि पुरातन भी और नूतन भी और निरंतर भी। ऋषिओं मुनिओं के अनुभव और अनुसन्धान आधुनिक विज्ञान के अनुसन्धान से कहीं कम नहीं हैं बल्कि बेहतर हैं। विज्ञान के अनुसन्धान तो मात्र 300 - 500 वर्ष से सुलभ हैं और विज्ञान से प्रेरित टेक्नोलॉजी ने प्रकृति का शोषण ही किया है और शोषण करना सिखाया है। परन्तु हज़ारों वर्ष पुरातन सनातन परम्परा ने प्रकृति से सामजस्य कर के इतनी उत्तम जीवन शैली दी है जिस को जनसाधारण सहजता से जीवन में उतार लेता है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश को देव स्वरुप मान कर उनका शोषण नहीं बल्कि उसके अनुकूल रहा जाता है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी जीवन जीने के लिए कोई आचार संहिता नहीं बना पाई। सनातन संस्कृति ने जीवन जीने की कला जो दी है उस से कल्याण ही कल्याण निहित्त है। इस के कुछ उदहारण प्रस्तुत हैं। ज़िन्दगी में प्रकृति के हर तत्त्व को देव स्वरुप मानने की प्रथा माता पिता और दादा दादी के आचरण से ही प्राप्त हो जाती है। तारों की छाव में ही उठ कर घर के बज़ुर्ग और माता पिता नित्यकर्म से निवृत हो जाते और देवी देवताओं को नमन करते। हमारे यहाँ तारों की छाव की बेला को अमृतकाल कहा जाता है और इस में उठने और जागने का आपना ही आनंद है। अमृतकाल में खेत खलिआनो में सैर करने निकल जाना और सूर्योदय का अनूठा नज़ारा है। इस तरह के सुबह सबेरे से आत्मविभोर होकर इस काल को अरुणोदय, प्रातःकाल इत्यादि सज्ञा भी दी गई है। अरुणोदय का अर्थ है सूर्योदय से पहले क्षितिज का लाल होना और तरह तरह के रंग बिखेरना। सूर्योदय का पहर ही ऐसा है जिस से मन खिल जाता है: हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला गगन विशाल, हर दिशा से पक्षी कलरव करते हैं, भवरें और तितलिआं सुन्दर फूलों पर मंडराते हैं। सब आपने आपने नित्यकर्म का श्री गणेश करते हैं। इधर घर में कोई रसोई संभाल रहा है, तो कोई घर के पशु पक्षिओं को और वाहनों को। यह नज़ारा तो पृथ्वी पर सब जगह उपलब्ध है परन्तु हिन्दू संस्कृति की विशेषता है कि हम हिन्दू सूर्य को देवता मान कर प्रणाम करते हैं और सूर्यनमस्कार करते समय प्रार्थना करते है कि हे सूर्य देव हमें शक्ति दो ताकि हम जीवन को सार्थक कर सकें। धरती पर सूर्य से उत्तम और प्रत्यक्ष शक्ति का स्रोत और क्या है? आज भी जब मैं सिंगापुर इत्यादि देश में सुबह सवेरे सूर्य नमस्कार करता हूँ तो राहगीर विस्मय से देखते हैं कि यह सज्जन पूर्व दिशा में किस को नमस्कार कर रहा है। इसी तरह से पृथ्वी से ज़्यादा स्नेह कहाँ से मिलता है। पृथ्वी के ग्रुत्वकर्षण के कारण हमें स्थिरता प्राप्त होती है और अनाज, फल फूल और सब्ज़ियाँ पृथ्वी से ही उपलब्ध होती है। पृथ्वी यह सब कार्य सब जगह करती है परन्तु हम इस के लिए पृथ्वी को माता कह कर नमन करते हैं। इसी तरह से जल को 'वरुण' देवता माना जाता है। जल ही जीवन है। और वायु को भी देव माना गया है। वायु तो प्राण का आधार है। जल, वायु, पृथ्वी और अग्नि के धारण कर्ता है आकाश तत्व जिस को शिव का रूप माना गया है। शिव चाँद को धारण करते हैं और इस पृथ्वी पर जल के लिए गंगा को धारण किये हैं। इसी लिए शिव की वंदना करते हुए कवि आत्मविभोर होकर कहता है: “चंद्र्शेखराय नमः ॐ; गँगाधराय नमः ॐ; परमेश्वराय नमः ॐ; शिव शंकराय नमः ॐ,शिव शंकराय नमः ॐ। शिव का लिंग और मूर्ती रूप की पूजा करने में भक्ति भाव है अन्यथा आकाश से भी विशाल शिव को मूर्ति या लिंग या शब्दों में कहाँ सीमित किया जा सकता है। शिव आकाश रूप में कल्याण कारी हैं। उनका त्रिशूल दर्शाता है कि प्रकृति सत्त्व, रजस और तमस लिए त्रिगुणात्मक है और उनका डमरू इनफिनिटी को दर्शाता है। जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी तत्त्व का जो तांडव होता है उस को शिव का नटराज रूप माना जाता है। इस तरह से हिन्दू सनातन संस्कृति में प्रकृति के हर तत्व को देव तुल्य माना गया है और इनके साथ सामजस्य रख कर जीवन जीने की कला सहजता से ही हिन्दू संस्कृति का भाग है। इसी भाव से रहने से जीवन आनंद से भरपूर रहता है। इसी तरह से जीवन व्यतीत करते हुए आप सब का कल्याण हो यही मनोकामना है। 

 सतीश कालड़ा 
 बैंगलोर 
 24.08.2022

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