धर्म, समाज, संस्कृति और राजनीति
समाज में आजकल धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है। आइये समझने की कोशिश करते हैं कि धर्म क्या है, धर्म आधारित संस्कृति और समाज क्या है, धर्म कैसे हठधर्म बन कर संस्कृति को विकृत करता है और धर्म के नाम पर कैसे और क्यों राजनीति होती है।
व्यक्ति को धर्म की प्रारम्भिक राह और पहचान विरासत में ही मिल जाती है। हिन्दू की सन्तान हिन्दू, मुस्लिम की मुस्लिम, ईसाई की ईसाई और सिख की सिख। परन्तु धर्म की गहराई गुरु शिष्य परम्परा से सुलभ होती है। गुरु दक्षिणा प्राप्त कर ही मनुष्य सही परम्परा से धर्म मार्ग पर अग्रसर होता है। एक ही परम्परा का पालन करने वाले सम्प्रदाय बन जाते हैं। भारत में धर्म आधारित मुख्य परम्पराऐं हैं हिन्दू (78%), मुस्लिम (18%) और ईसाई (2%)। अन्य समुदाय हैं बौद्ध, जैन, सिख और पारसी।
गुरु दक्षिणा प्राप्त कर भी मनुष्य एक परम्परा को तो पकड़ लेता है परन्तु गहराई को वह अपनी साधना के आधार पर ही पाता है। ईश्वर सत्य की उच्चतम अवधारणा है। ईश्वर सृष्टि के कण कण में विराजमान है। प्रकृति में है, प्रकृति के बाहर नहीं। दिव्यता प्रकृति का सार है। ईश्वरीय स्वभाव हर इंसान, हर बच्चे में मौजूद हो। इसे कैसे प्रकट करें? इसे कैसे प्रकट करें? यही धर्म का विज्ञान है। हजारों मनुष्यों में कोई एक ही परमात्मा की प्राप्ति अर्थात सत्य की खोज के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में से भी कोई एक परमात्मा के परायण होकर परमात्मा को तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है (भगवद गीता अध्याय- 7 श्लोक- 3)। अधिकाँश लोग तो सिर्फ नाम से ही धर्म के अनुयायी होते हैं: अधिकाँश के ऊपर यह मोहर है कि वह अमुक धर्म के माता पिता के घर जन्मे और कुछ के ऊपर धर्म की यह मोहर है कि वह अमुक धर्म गुरु अर्थात परम्परा का अनुसरण कर रहे हैं और उस सम्रदाय के अनुसार रहन सहन, पहरावे और पूजा पाठ करते हैं। असल में अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला तो कोई विरला ही होता है। कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई सत्य यानी परमात्मा वास्तव में जान पाता है।
धर्म के दो आयाम हैं: नैतिक आयाम और वैज्ञानिक आयाम। नैतिक आयाम वह धर्म है जिसमें आप पैदा हुए हैं। इसमें आपकी कोई पसंद नहीं। आप सिर्फ एक विशेष परिवार में पैदा हुए हैं ईसाई, हिंदू, मुस्लिम, या कुछ भी। लेकिन वैज्ञानिक आयाम वह है जब आप स्वयं उसे खोजते हो। बिना खोजे कोई विज्ञान नहीं है। तो जब आप धार्मिक होना चाहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप आध्यात्मिक हो जाते हैं। विज्ञान सार्वभौम है। इसी तरह आध्यात्मिक सत्य सार्वभौमिक हैं। कोई एक विशेष धार्मिक संप्रदाय या क्षेत्र में पैदा हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक होने के कारण सार्वभौमिक होने के लिए विकसित होता है। यही धर्म का वैज्ञानिक आयाम है जो साधना से आता है। केवल एक विशेष परंपरा में पैदा होने से आपको यह नहीं मिलता है।
आध्यात्मिक स्तर पर धर्म हर व्यक्ति की परमात्मा और प्रकृति के प्रति उस की व्यक्तिगत धारणा, आस्था और विश्वास है। उस आस्था और विश्वास के आधार पर परमात्मा की प्राप्ति के लिए उस के प्रयास, उस की साधना, उस के भाव और भावनाएं, उस का व्यवहार, उस के रीति रिवाज़: इन सब के समूह को उस का व्यक्तिगत धर्म या धर्म आधारित व्यवहार कह सकते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो हर व्यक्ति का आपना आपना धर्म हो सकता है और इस में कोई ऐतराज भी नहीं होना चाहिए। प्रकृति ने हर मनुष्य को अलग रूप और रंग और स्वाभाव दिया है। कोई किसी से मिलता नहीं। कोई आस्तिक हो सकता है तो कोई नास्तिक। किसी के लिए परमात्मा निर्गुण निराकार है और किसी के लिए सगुण साकार। कोई मूर्ती पूजा करता है तो कोई पुस्तक पड़ता है। कोई सत्संग कीर्तन करता है तो कोई गुफा में बैठ कर साधना करता है। कोई पूजा अर्चना करता है तो कोई इबादत करता है।
परम्परा प्राय रूढ़िवादी होती है। परन्तु बदलते समय के साथ इस में सुधार अपेक्षित रहता है। अनुसंधान सभी परंपरा का हिस्सा बना रहे तो यह सामयिक हो जाती हैं। जब परंपरा इन चीजों को खो देती है तो वह कट्टरता या हठधर्म होने लगती है। कोई धर्म वैर भाव नहीं सिखाता। परन्तु हठधर्म के कारण अलग अलग सम्प्रदाय कुएँ के मेंढक बन जाते हैं और एक दुसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लग जाते हैं। सम्प्रदायिक झगड़ों की नींव यहीं से रखी जाती है। अध्यात्म और धर्म स्वयं इन सभी संघर्षों से परे है। यह शांति, प्रेम और सद्भाव के लिए है। परन्तु जब यह सामाजिक राजनीतिक ताकतों से प्रभावित होता है और इसके आगे झुक जाता है तो यह संकीर्ण और रूढ़िवादी बन जाता है जिससे संघर्ष, असहिष्णुता हिंसा और यहां तक कि विज्ञान की भावना का भी दमन होता है। इसे ही धर्म का अनैतिक आयाम कहा जाता है। समाज में आजकल जो धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है वह इसी अनैतिक आयाम का प्रभाव है। आवश्यकता है आध्यात्मिक बनने की। आइये विज्ञान के इस युग में धर्म के वैज्ञानिक आयाम का अनुसरण कर अध्यात्म को प्राप्त हों और हठधर्म का त्याग करें और धर्म को राजनीति से तो हमेशा दूर रखें। ऐसी शुभकामना है।
सतीश कालड़ा, बैंगलोर

No comments:
Post a Comment