Friday, September 16, 2022

तुम हमें यूँ भुला ना पाओगे

 सनातन संस्कृति: तुम हमें यूँ भुला ना पाओगे 

तीज, त्यौहार, उत्सव और समारोह  


Seema Sandesh, Sriganganagar  09.09.2022


समाज में तथाकथित आधुनिक लोग सनातन संस्कृति को भूलने का प्रयास कर रहे हैं और पाश्चात्य संस्कृति की नक़ल करना ज़्यादा पसंद करते हैं।  परन्तु सनातन संस्कृति कहती है कि तुम मुझे  यूँ भुला ना पाओगे।  पिछले कुछ लेखों  में मैंने ज़िक्र किया था  कि हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए हमें  कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।  माता, पिता, परिवार और  समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका है समाज में तीज, त्यौहार, उत्सव और समारोहों की जो  उत्साह को बढ़ावा देते रहते हैं और रिश्ते नातों को मजबूत करते हैं। 


जो तथाकथित आधुनिक लोग आपने आप को हाशिये पर खड़ा महसूस किया करते है वह ना ना करते हुए  भी वर्ष में दो तीन धार्मिक अनुष्ठान में तो भाग ले ही लेते हैं। होली  दिवाली तो सब मनाते हैं।  दीवाली के शुभावसर में शायद ही कोई होगा जो आपने घर में दीये नहीं जलाता  और काफी लोग तो लक्ष्मी पूजा भी  करते हैं। रिश्ते नातों को मजबूत करने के लिए राखी और भाई दूज पर भाई बहन का मिलन घर घर में उत्सव ही तो है और आपने सुहाग के लिए करवा चौथ का व्रत भी अधिकाँश महिलायें  रखती हैं कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि और नवरात्री अन्य त्यौहार हैं जिन से शायद ही कोई अछूता रहता हो।  पूर्वजों को याद कर श्राद और तर्पण भी लोग अक्सर किया करते हैं।  इसी तरह से मौसम की मस्ती छा जाने पर हरियाली तीज, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी इत्यादि से कौन अछूता रहता है।  कई लोग कुलदेवता और स्थान देवता का पूजन भी किया करते हैं।      आप में से कई घरों  में ऐसा होता होगा कि साल में दो बार मौसम बदलने के दिनों में एक एक दिन के लिए घर में आग जला कर कुछ भी नहीं पकाया जाता। उस दिन पहले से बना बासा खाना ही खाया जाता है। इसे बासडिया भी कहते हैं। रसोई को साफ करने का शायद यह अनूठा तरीका है। 


भारत की सनातन संस्कृति  में तो हर अमावस, पूर्णिमा, सक्रांति और एकादशी त्यौहार ही है। परन्तु आधुनिक समाज के रहन सहन में अधिकाँश लोग इन का ख्याल नहीं रखते। अधिकाँश लोगों को तो पता ही नहीं होता कि चाँद का कौन सा पक्ष चल रहा है: शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष। कई लोग तो शायद इस  शब्दावाली से  भी  अनजान हैं। शुक्ल पक्ष यानि अमावस से लेकर पूर्णिमा के वह 15 दिन जब रोज़ चाँद का दर्शन थोड़ा थोड़ बढ़ता रहता है।  और कृष्ण पक्ष इस का उल्टा।   प्रकृति में सब से सुन्दर दृश्य जो पृथ्वी पर  लगभग हर जगह देखने को सुलभ हैं वह हैं: प्रातःकाल में सूर्योदय, सायंकाल में सूर्य का अस्त होना और महीने में एक बार रात्रि में पूर्णिमा का चाँद।  पूर्णिमा के चाँद की उपमा को लेकर तो कवि लोग  अपनी महबूबा की प्रशंसा किया करते हैं और अमावस की काली रात में आसमान में तारागण को देखने का आनन्द ही कुछ और है।   पाश्चात्य संस्कृति में तो केवल नववर्ष को धूम धाम से मनाया जाता है।  परन्तु हिन्दू संस्कृति में हर महीने की शुरुआत को संक्रांति कह कर मनाया जाता है और नव वर्ष की शुरुआत को युगादी के नाम से।  अधिकाँश लोग शायद देशी महीनों के नाम से परिचित नहीं। नव वर्ष की  शुरुआत  चैत्र मास से होती है।  हर साल 13 अप्रैल को बैसाख महीने की सक्रांति होती है।  इस के पश्चात अधिकाँश महीने चाँद की  कलाओं के अनुसार है। चैत्र और बैसाख से वर्ष की शुरुआत होती है, ज्येष्ठ और आषाढ़ ग्रीषम ऋतू, श्रावण और भाद्रपद मानसून, आश्विन और कार्तिक पतझड़,  मार्गशीष और पोष शीतकाल और माघ और फागुन बसंत ऋतू।  इस के बाद एक पुरुषोत्तम मास अधिक मास  के रूप में होता है ताकि 365 दिन पूरे हो सकें।  


प्रत्येक पूर्णिमा देश में किसी न किसी त्यौहार से जुड़ी रहती  है। हर महीने कुछ न कुछ अच्छा होता है। आषाढ़ के  महीने गुरु पूर्णिमा, जो अनादि काल से गुरुओं की परंपरा को समर्पित है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि व्यास महर्षि ने  महाभारत भागवद पुराण   इत्यादि ग्रंथों के माध्यम से ब्रह्म ज्ञान और वेदों के सार को जन-जन तक पहुँचाया है।। इसलिए उन्हें वेद व्यास भी कहा जाता है। तो आषाढ़ में है  व्यास पूर्णिमा। इससे पहले  बुद्ध पूर्णिमा थी, जिस दिन महात्मा  बुद्ध का जन्म, ज्ञान और निर्वाण प्राप्त हुआ था, सभी एक ही दिन। और उससे पहले  बैशाख पूर्णिमा  और उससे पहले चैत्र पूर्णिमा। होली फागुन की पूर्णिमा को होती है और  श्रावण मास की पूर्णिमा को  रक्षा बंधन कहा जाता है जब  बहनें अपने भाइयों को अपनी  सुरक्षा के लिए राखी बाँधती हैं और वह  अपने भाई के कल्याण के लिए प्रार्थना करती हैं।   कार्तिक मास की पूर्णिमा गुरु नानक जयंती और देव दिवाली।   इसलिए हर पूर्णिमा का कुछ न कुछ महत्व होता है। 


इसी तरह से व्रत रखने की परम्परा है।  अमावस से लेकर पूर्णिमा और पूर्णिमा से अमावस के सफर में एकादशी को लोग व्रत किया किया करते हैं सेहत को अच्छा रखने के लिए।  महीने में दो व्रत का नियम रखने से सेहत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।   कई लोग तो हर सप्ताह सोमवार या मंगलवार को व्रत का संकल्प ले लेते हैं।  इस से सेहत पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और साथ साथ सोमवार को शिव पूजन या मंगल को हनुमान पूजन भी हो जाता है।  इसी तरह से सप्ताह के शेष दिनों में भी पूजन करने का प्रचलन है।  बुद्ध को गणेश वन्दना, वीर  को गुरुपूजा, शुक्र को देवी पूजा और शनि को शनि देव की पूजा अर्चना से लाभ होता है।  ऐसा काफी लोग मानते है। अक्सर  लोग यह संकल्प ले लेते हैं कि मंगलवार और नवरात्रों में मीट मॉस नहीं खाना और मदिरपन भी नहीं करना।  इसी बहाने इन से कुछ निजाद मिलती है।   


त्यौहार मनाने के दो महत्वपूर्ण मौसम हैं: बसंत और मॉनसून। जनवरी में मकर संक्रांति से मौसम करवट लेता है तो त्यौहार शुरू हो जाते हैं। दूसरी तरफ मॉनसून के शुरू होते ही चातुर्मास लग जाता है और धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। मार्गशीष के महीने की प्रथम तिथि।  पूरे भारत में उत्सव का माहौल हो जाता है।  उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, माघी का त्यौहार, उत्तर पूर्व में भोगाली बिहू, गंगा, यमुना के  किनारे मकर संक्रांति और दक्षिण भारत में इसे पोंगल कह कर मनाते हैं।  इसके उपरान्त माघ महीने की पांचवी तिथि को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है और माँ सरस्वती जो कि ज्ञान और संगीत की देवी है उनकी पूजा की जाती है।  कई प्रदेशों में पतंग उड़ाए जाते हैं।  बसंत का महत्त्व तो भारत में बताने की ज़रुरत नहीं।  मौसम ही इतना रमणीक है।  डाली डाली फूल खिल जाते हैं और पशु पक्षी इसी काल में प्रजनन करते हैं। इस के बाद महाशिवरात्रि मनाई जाती है जो कि सनातन धर्म का बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है।  


श्रावण उत्सव का महीना है। इतने सारे उत्सव शुरू हो जाते  हैं। रक्षा बंधन के बाद जन्माष्टमी आएगी, जो भगवान् कृष्ण का जन्मदिन है। फिर  गणपति के बाद नवरात्रि और उस के  के बाद दशहरा और  दिवाली। तो हर सप्ताह और हर दिन कोई न कोई त्योहार। जीवन का जश्न मनाने का कोई भी बहाना अच्छा है। आज, जब दुनिया इस तरह के उदास मूड में हो रही है, ये उत्सव निश्चित रूप से मानव भावना को ऊपर उठाते हैं। तो, इन त्योहारों का सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अपना उद्देश्य और उपयोगिता है। हमें उन बातों का पालन करना चाहिए। हमें इन परंपराओं का पालन करना चाहिए क्योंकि ये सभी जाति, पंथ, धर्म आदि के लोगों को एकजुट करती हैं। जब आज कई विभाजनकारी ताकतें हैं तो हमें जागना और देश के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करना जरूरी है।


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

01.09.2022   



उठो, जागो और जो वरदान मिला है उसे सुनो

सनातन धर्म: शास्त्र और धर्म ग्रन्थ  

उठो, जागो और जो वरदान मिला है उसे सुनो


Seema Sandesh Srigangaganagr 16.09.2022

पिछले लेख में मैंने रामायण और महाभारत का ज़िक्र किया था। पाठकों का अनुरोध है कि सनातन धर्म के बाकी शास्त्र और धर्म ग्रन्थों का भी ज़िक्र किया जाए। इस सन्दर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि  मैंने  उन विषयों का ज़िक्र करने का संकल्प लिया था  जो जनसाधारण को सहजता से सुलभ हैं। वेद, शास्त्र, उपनिषद इत्यादि को   सुनना, समझना और समझाना  तो विद्वान् और पंडित लोगों का काम है।  इसे गुरु शिष्य परम्परा से ही समझना उचित है।  फिर भी पाठकों के अनुरोध को मद्देनज़र रखते हुए सामान्य ज्ञान हित्तार्थ जो सूचना प्राप्त की है उस का विवरण दे रहा हूँ। कोई अतिश्योक्ति हो जाए तो अग्रिम क्षमाप्राथना है क्योंकि मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूँ।    

  • दूसरी  श्रेणी के ग्रन्थ स्मृति और आगम कहलाते हैं। ये ऋषि प्रणीत माने जाते हैं। इस श्रेणी में 18 स्मृतियाँ, 18 पुराण तथा रामायणमहाभारत ये दो इतिहास भी माने जाते हैं।  भगवद्गीता महाभारत का ही भाग है परन्तु आपने आप में सम्पूर्ण ग्रन्थ है। आगम ग्रन्थ भी स्मृति-श्रेणी में माने जाते हैं।  उपास्य देवता की भिन्नता के कारण तीन प्रकार के आगम हैं: वैष्णव आगम (पंचरात्र तथा वैखानस आगम), शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धांत, त्रिक आदि) तथा शाक्त आगम।

  • भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के साथ मिलकर वेदान्त की 'प्रस्थानत्रयी' कहलाते हैं। ब्रह्मसूत्र, वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है। इसके रचयिता महर्षी बादरायण हैं। इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र, शारीरक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस पर अनेक आचार्यों  ने भाष्य भी लिखे हैं। ब्रह्मसूत्र में उपनिषदों के  दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विचारों के  साररूप को  एकीकृत किया गया है।

 

वेद प्राचीनतम हिंदू ग्रंथ हैं। वेद शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'विद्' धातु से हुई है। विद् का अर्थ है जानना या ज्ञानार्जन, इसलिये वेद को ज्ञान का ग्रंथ कहा जा सकता है। भारतीय मान्यता के अनुसार ज्ञान शाश्वत है अर्थात् सृष्टि की रचना के पूर्व भी ज्ञान था एवं सृष्टि के विनाश के पश्चात् भी ज्ञान ही शेष रह जायेगा। चूँकि वेद ईश्वर के मुख से निकले और ब्रह्मा जी ने उन्हें सुना इसलिये वेद को श्रुति भी कहा जाता हैं। श्रुति यानि जो सुना गया है।  श्रुति ऋषियों द्वारा  की गई खोज  और अनुभूति है।  ऋषियों ने इसे सुना और इसे देवों से प्राप्त किया और बार बार गाया। इन पवित्र शिक्षाओं को  आधुनिक काल तक कभी नहीं लिखा गया था, बल्कि दिल से इसे याद किया जाता रहा और लगातार दोहराया जाता रहा। ऋषिओं   ने इसे  अपने शिष्यों  के लिए गाया जो मनन करते करते मुनि बन गए, और मनीषियों ने उन्हें उसके आगे शिष्यों के लिए  गाया। गुरु शिष्य परम्परा से   बार-बार ज्ञान गाया और  सुना गया    जब तक कि  वह पूरी तरह से आत्मसात  नहीं कर लिया गया। शिष्य  अभी भी इसी तरह श्रुति सीखते हैं जैसे उनके पूर्वजों ने इसे बहुत प्राचीन काल  में सीखा था, और आज भी आप  किसी भी वैदिक पाठशाला या गुरुकुल में इसका जप पाठ करते हुए विद्यार्थिओं को सुन सकते हैं। इस को सुनना, समझना और गाना  तो विद्वान् और पंडित लोगों का काम है परन्तु साधारण जनमानस के लिए इनको  सुनने में ही इतना आनंद है जिस का ब्यान नहीं किया जा सकता।  कानून की पुस्तकों का या संविधान का  जनसाधारण को कोई  ज्ञान नहीं होता है।   वह तो विद्वान वकीलों का काम है। जब ज़रूरत पड़ती है हम वकील की सलाह ले लेते हैं।   इसी तरह से श्रुति और स्मृति विद्वानों और पंडितों का विषय है।  जन साधारण इन का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करने मात्र से  ही कल्याण हो जाता है  और आवश्यकता पढ़ने पर पंडित जी से धार्मिक अनुष्ठान करवा लिया जाता  है। आपमें से भी अगर कोई इस ज्ञान को हासिल करना चाहे तो गुरुकुल सही स्थान है।  पुरातन काल में शायद केवल ब्राह्मण परिवार के सदस्य इस शिक्षा को  हासिल करते थे। अब तो कोई भी इस की शिक्षा ग्रहण कर सकता है।  गुरुकुल में इसके लिए BA, MA, PhD भी की जा सकती है।   


प्रत्येक  वेद के  चार भाग हैं: मन्त्र संहिता, ब्राह्मण भाग, अरण्यक और  उपनिषद।    मन्त्र संहिता में  मंत्रों का संग्रह है।  मन्त्र वह  वाक्य होते हैं जिनमें ध्वनियों के क्रम में एक विशेष शक्ति होती है जो  कुछ प्रभाव उत्पन्न करती है। ये देवताओं के भजनों के रूप में हैं।   जब उचित पर्शिक्षित   व्यक्तियों द्वारा इनका उचित उच्चारण किया जाता है, तो कुछ परिणाम सामने आते हैं। इनका उपयोग धार्मिक आनुष्ठानो और समारोहों में किया जाता है, और समारोह का प्रभाव्  मुख्य रूप से उनके उचित दोहराव पर निर्भर करता है। श्रुति में जो पाया जाता है वह सर्वोच्च ज्ञान  है और इसके  सच्चे  अनुयायी इसको अटल सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।  सनातन धर्म के  सभी संप्रदाय, सभी दार्शनिक प्रणालियां, श्रुति को अंतिम  सत्य  के रूप में स्वीकार  करती हैं और  हर विवाद का निर्धारण इन्हीं से करते हैं। 


उपनिषद् ‘वेद’ के अन्त में आते हैं। ‘वेद’ साहित्य के अन्त में होने के कारण उपनिषद् वेदान्त कहे जाते हैं और इन का शाब्दिक अर्थ है  गुरु के समक्ष बैठ कर लिया गया ज्ञान। इस  भाग में ब्रह्म की प्रकृति, सर्वोच्च और पृथक आत्मा पर, मनुष्य और ब्रह्मांड पर, बंधन और मुक्ति पर गहरी दार्शनिक शिक्षाएं शामिल हैं। इस विभाग के ग्रन्थों की संख्या 123 से लेकर 1194 तक मानी गई है, किन्तु उनमें 10 ही मुख्य माने गये हैं: ईष, केन, कठ, प्रश्, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।  इस के अतिरिक्त श्वेताश्वतर और कौशीतकि को भी महत्त्व दिया गया हैं। केवल उच्च शिक्षित पुरुष ही उपनिषदों का  अध्ययन कर सकते हैं; दूसरों के लिए यह बहुत कठिन है।  वेद का   एक और भाग था, जिसे  तंत्र  कहा जाता है। तांत्रिक विद्या में विज्ञान और विज्ञान पर आधारित व्यावहारिक निर्देश शामिल थे।  लेकिन बहुत कम सच्चा प्राचीन तंत्र बचा है।  ऋषिओं ने इसे  कलयुग के लिए अनुपयुक्त समझा  जब लोग कम आध्यात्मिक हैं। 

स्मृति: जिन महर्षियों ने श्रुति के मन्त्रों को प्राप्त किया, उन्हींने अपनी स्मृति की सहायता से जिन धर्मशास्त्रों के ग्रन्थों की रचना की, वे `स्मृति ग्रन्थ´ कहे गये हैं। इनमें समाज की धर्ममर्यादा - वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, राज-धर्म, साधारण धर्म, दैनिक कृत्य, स्त्री-पुरूष का कर्तव्य आदि का निरूपण किया है। स्मृतियाँ  स्मृतिकार  के नाम से ही प्रसिद्द  हैं: मनु २ अत्रि ३ विष्णु ४ हारीत ५ याज्ञवल्क्य ६ उशना ७ अंगिरा ८ यम ९ आपस्तम्ब १० संवर्त ११ कात्यायन १२ बृहस्पति १३ पराशर १४ व्यास १५ शंख १६ लिखित १७ दक्ष १८ गौतम १९ शातातप २० वशिष्ठ।  इनके अलावा निम्न ऋषि भी स्मृतिकार माने गये हैं और उनकी स्मृतियाँ उपस्मृतियाँ मानी जाती हैं। १ गोभिल २ जमदग्नि ३ विश्वामित्र ४ प्रजापति ५ वृद्धशातातप ६ पैठीनसि ७ आश्वायन ८ पितामह ९ बौद्धायन १० भारद्वाज ११ छागलेय १२ जाबालि १३ च्यवन १४ मरीचि १५ कश्यप … आदि

हिंदू समाज स्मृति में दिए  कानूनों पर आधारित और संचालित होता रहा है।  मनु स्मृति  आर्य कानून का मुख्य संग्रह है। बाकी स्मृतियों का  अब अधिक अध्ययन या उल्लेख नहीं किया जाता  सिवाय कुछ दक्षिणी  के भारत भागों  में। आजकल तो मनुस्मृति को लेकर समाज  भी कई विवाद हैं।  उच्चतम न्यायालय ने मनुस्मृति को लेकर  कुछ महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं जिन का अनुपालन अनिवार्य है। 

पुराण: वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ होने के कारण आम आदमियों के द्वारा उन्हें समझना बहुत कठिन था, इसलिये रोचक कथाओं के माध्यम से वेद के ज्ञान की जानकारी देने की प्रथा चली। इन्हीं कथाओं के संकलन को पुराण कहा जाता हैं। पौराणिक कथाओं में ज्ञान, सत्य घटनाओं तथा कल्पना का संमिश्रण होता है। पुराण ज्ञानयुक्त कहानियों का एक विशाल संग्रह होता है। पुराणों को वर्तमान युग में रचित विज्ञान कथाओं के जैसा ही समझा जा सकता है। पुराण संख्या में अठारह हैं।18 पुराणों के नाम  इस प्रकार है - ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण - वायु पुराण, श्रीमद्भावत महापुराण - देवीभागवत पुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेय पुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण, लिंगपुराण, वाराह पुराण, स्कन्द पुराण, वामन पुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण। इनके अलावा देवी भागवत में 18 उप-पुराणों का उल्लेख भी है - गणेश पुराण, नरसिंह पुराण, कल्कि पुराण, एकाम्र पुराण, कपिल पुराण, दत्त पुराण, श्रीविष्णुधर्मौत्तर पुराण, मुद्गगल पुराण, सनत्कुमार पुराण, शिवधर्म पुराण, आचार्य पुराण, मानव पुराण, उश्ना पुराण, वरुण पुराण, कालिका पुराण, महेश्वर पुराण, साम्ब पुराण, सौर पुराण। अन्य पुराण है:  पराशर पुराण, मरीच पुराण, भार्गव पुराण, हरिवंश पुराण, सौरपुराण, प्रज्ञा पुराण, पशुपति पुराण। पुराणों में सृष्टिक्रम, राजवंशावली, मन्वन्तर-क्रम, ऋषिवंशावली, पंच-देवताओं की उपासना, तीर्थों, व्रतों, दानों का माहात्म्य विस्तार से वर्णन है। इस प्रकार पुराणों में हिन्दु धर्म का विस्तार से ललित रूप में वर्णन किया गया है।

रामायण और महाभारत  को इतिहास ग्रंथ माना जाता है। जबकि श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का ही अंश है, इसमें प्राप्त अमूल्य ज्ञानबोध के कारण इसको स्वतन्त्र ग्रंथकी मान्यता प्राप्त है।

इस के अतिरिक्त हिन्दू धर्म ने  भक्ति,  विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में  शानदार साहित्य और संस्कृति को जन्म दिया है: संस्कृत भाषा, व्याकरण,  ज्योतिष, आयुर्वेद और कविता इत्यादि।   भारतीय दर्शनशास्त्र में भी छः विभाग हैं। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है: (१) न्याय -- महर्षि गौतम;  (२) वैशेषिक -- महर्षि कणाद; (३) साङ्ख्य -- महर्षि कपिल; (४) योग -- महर्षि पतञ्जलि; (५) पूर्व मीमांसा -- महर्षि जैमिनी; (६) उत्तर मीमांसा या वेदान्त -- महर्षि वादरायण।  इन सभी का एक ही उद्देश्य है:   मानव स्वयं को सक्षम करके अपनी व्यथा और  दर्द का अंत कैसे कर सकता है और   परमात्मा   के साथ फिर से कैसे जुड़ सकता है। हर मानव के सोचने और  काम करने के तरीके अलग-अलग हैं।  इसी तरह से वह अलग अलग रास्ते ढूँढ़ता है।   जैसे  अलग-अलग सड़कें  एक शहर की ओर ले जाती  हैं इसी तरह से भारतीय दर्शन की छह प्रणालियां हैं। 

सनातन धर्म  पूरी तरह से बताता है कि भगवान, या आत्मा का सटीक और वास्तविक स्वरूप क्या है, और यह दर्शाता है कि मनुष्य की जीवात्मा मूल रूप से इस ईश्वर का अंश ही है  और बताता है कि मनुष्य कैसे और क्या  करे   ताकि कर्म उसे बांध न सके; और अंत में  ईश्वर की माया शक्ति क्या है, जिसके द्वारा यह सारा संसार प्रकट होता है   और गायब हो जाता है, वह कैसे योग के अभ्यास के द्वारा  खुद को भगवान् के साथ  मोक्ष प्राप्त कर सकता है।


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

26.08.2022 



Saturday, August 27, 2022

हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान: भाग- 2



हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान 

भाग- 2

सीमा सन्देश 27.08.2022 

 पिछले अंक में मैंने लिखा था कि मैं हिन्दू हूं और हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए मुझे कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा। माता, पिता, परिवार और समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा गए। अब अगर कोई मुझ से पूछे कि हिन्दू संस्कृति क्या है तो मुझे उस को परिभाषित करना असंभव सा लगता है। परिभाषित करने का अर्थ है कोई सीमा निर्धारित करना। हिन्दू धर्म और संस्कृति में अथाह गहराई और विशालता है और कोई सीमा नहीं। इसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सब का मार्ग प्रशस्त किया गया है। यह सब को सुलभ है चाहे कोई कर्म प्रधान हो, ज्ञान प्रधान हो या भावना प्रधान। इसमें अनुशासन भी है और कला और गीत संगीत भी। इस में प्रकृति की समझ भी है और प्रकृति के आधार परमात्मा की आस्था भी है और नास्तिक प्रथा भी है (यथा चार्वाक) । इस में कोई हठधर्म नहीं। यह एक जीवन जीने की परम्परा है जो सदियों से ऋषिओं मुनिओं के अनुभव और अनुसन्धान से लेकर सामान्य जनमानस के आचरण और व्यवहार में आ गई और परिपक्व होती चली गई और निरंतर चल रही है। इसीलिए इसे सनातन धर्म की संज्ञा भी दी गई है। सनातन यानि पुरातन भी और नूतन भी और निरंतर भी। ऋषिओं मुनिओं के अनुभव और अनुसन्धान आधुनिक विज्ञान के अनुसन्धान से कहीं कम नहीं हैं बल्कि बेहतर हैं। विज्ञान के अनुसन्धान तो मात्र 300 - 500 वर्ष से सुलभ हैं और विज्ञान से प्रेरित टेक्नोलॉजी ने प्रकृति का शोषण ही किया है और शोषण करना सिखाया है। परन्तु हज़ारों वर्ष पुरातन सनातन परम्परा ने प्रकृति से सामजस्य कर के इतनी उत्तम जीवन शैली दी है जिस को जनसाधारण सहजता से जीवन में उतार लेता है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश को देव स्वरुप मान कर उनका शोषण नहीं बल्कि उसके अनुकूल रहा जाता है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी जीवन जीने के लिए कोई आचार संहिता नहीं बना पाई। सनातन संस्कृति ने जीवन जीने की कला जो दी है उस से कल्याण ही कल्याण निहित्त है। इस के कुछ उदहारण प्रस्तुत हैं। ज़िन्दगी में प्रकृति के हर तत्त्व को देव स्वरुप मानने की प्रथा माता पिता और दादा दादी के आचरण से ही प्राप्त हो जाती है। तारों की छाव में ही उठ कर घर के बज़ुर्ग और माता पिता नित्यकर्म से निवृत हो जाते और देवी देवताओं को नमन करते। हमारे यहाँ तारों की छाव की बेला को अमृतकाल कहा जाता है और इस में उठने और जागने का आपना ही आनंद है। अमृतकाल में खेत खलिआनो में सैर करने निकल जाना और सूर्योदय का अनूठा नज़ारा है। इस तरह के सुबह सबेरे से आत्मविभोर होकर इस काल को अरुणोदय, प्रातःकाल इत्यादि सज्ञा भी दी गई है। अरुणोदय का अर्थ है सूर्योदय से पहले क्षितिज का लाल होना और तरह तरह के रंग बिखेरना। सूर्योदय का पहर ही ऐसा है जिस से मन खिल जाता है: हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला गगन विशाल, हर दिशा से पक्षी कलरव करते हैं, भवरें और तितलिआं सुन्दर फूलों पर मंडराते हैं। सब आपने आपने नित्यकर्म का श्री गणेश करते हैं। इधर घर में कोई रसोई संभाल रहा है, तो कोई घर के पशु पक्षिओं को और वाहनों को। यह नज़ारा तो पृथ्वी पर सब जगह उपलब्ध है परन्तु हिन्दू संस्कृति की विशेषता है कि हम हिन्दू सूर्य को देवता मान कर प्रणाम करते हैं और सूर्यनमस्कार करते समय प्रार्थना करते है कि हे सूर्य देव हमें शक्ति दो ताकि हम जीवन को सार्थक कर सकें। धरती पर सूर्य से उत्तम और प्रत्यक्ष शक्ति का स्रोत और क्या है? आज भी जब मैं सिंगापुर इत्यादि देश में सुबह सवेरे सूर्य नमस्कार करता हूँ तो राहगीर विस्मय से देखते हैं कि यह सज्जन पूर्व दिशा में किस को नमस्कार कर रहा है। इसी तरह से पृथ्वी से ज़्यादा स्नेह कहाँ से मिलता है। पृथ्वी के ग्रुत्वकर्षण के कारण हमें स्थिरता प्राप्त होती है और अनाज, फल फूल और सब्ज़ियाँ पृथ्वी से ही उपलब्ध होती है। पृथ्वी यह सब कार्य सब जगह करती है परन्तु हम इस के लिए पृथ्वी को माता कह कर नमन करते हैं। इसी तरह से जल को 'वरुण' देवता माना जाता है। जल ही जीवन है। और वायु को भी देव माना गया है। वायु तो प्राण का आधार है। जल, वायु, पृथ्वी और अग्नि के धारण कर्ता है आकाश तत्व जिस को शिव का रूप माना गया है। शिव चाँद को धारण करते हैं और इस पृथ्वी पर जल के लिए गंगा को धारण किये हैं। इसी लिए शिव की वंदना करते हुए कवि आत्मविभोर होकर कहता है: “चंद्र्शेखराय नमः ॐ; गँगाधराय नमः ॐ; परमेश्वराय नमः ॐ; शिव शंकराय नमः ॐ,शिव शंकराय नमः ॐ। शिव का लिंग और मूर्ती रूप की पूजा करने में भक्ति भाव है अन्यथा आकाश से भी विशाल शिव को मूर्ति या लिंग या शब्दों में कहाँ सीमित किया जा सकता है। शिव आकाश रूप में कल्याण कारी हैं। उनका त्रिशूल दर्शाता है कि प्रकृति सत्त्व, रजस और तमस लिए त्रिगुणात्मक है और उनका डमरू इनफिनिटी को दर्शाता है। जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी तत्त्व का जो तांडव होता है उस को शिव का नटराज रूप माना जाता है। इस तरह से हिन्दू सनातन संस्कृति में प्रकृति के हर तत्व को देव तुल्य माना गया है और इनके साथ सामजस्य रख कर जीवन जीने की कला सहजता से ही हिन्दू संस्कृति का भाग है। इसी भाव से रहने से जीवन आनंद से भरपूर रहता है। इसी तरह से जीवन व्यतीत करते हुए आप सब का कल्याण हो यही मनोकामना है। 

 सतीश कालड़ा 
 बैंगलोर 
 24.08.2022

Tuesday, August 23, 2022

हमारी पहचान: रामायण और महाभारत

हमारी पहचान: रामायण और महाभारत 

सीमा सन्देश 24.08.2022 

पिछले लेख में मैंने ज़िक्र किया था कि हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए हमें  कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।  माता, पिता, परिवार और  समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका है हिन्दू समाज में रामायण और महाभारत का पठन पाठन और भगवान् राम और भगवान् कृष्ण की भक्ति।   दुनिया में ऐसी बहुत कम किताबें हैं जिन्होंने आम जनता के दिलो दिमाग पर सदिओं तक  इतना गहरा प्रभाव  डाला हो। रामायण और महाभारत कुछ ऐसी  प्राचीन गाथाएं हैं जिन का ज्ञान सब को सहजता से ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि परिवार और समाज में इन  की चर्चा ही इतनी होती रहती है  और यह  जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। सब को इन  की कहानी मालूम है।  परन्तु फिर भी बार बार इस का अभ्यास होता रहता है।  देश के कई भागों में नवरात्री के दिनों में राम लीला खेली जाती  है। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस तो शायद सब के घर में उपलब्ध है जिस का समय समय पर अखण्ड  पाठ या साधारण पाठ चलता रहता है। इस के अतिरिक्त रामायण और महाभारत के विषय को लेकर दूरदर्शन के सीरियल अत्यधिक लोकप्रिय हैं। फिल्में भी बनी हुई हैं।  बच्चों के कॉमिक भी इन विषयों को लेकर बने हुए है। रामायण और महाभारत  में हर तरह के लोगों के लिए कुछ न कुछ मिलता है: चाहे वह विद्वान् हो या गाँव में रहने वाला साधारण अनपढ़ गंवार। रामायण और महाभारत की कथा से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि परिवार और समाज को  क्या जोड़ता है और क्या तोड़ता है।   किस तरह समाज में  मर्यादा   कायम की जा सकती है। 


रामायण और महाभारत को  लिखने वाले हैं महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास। महर्षि वाल्मीकि ने सब से पहले राम कथा संस्कृत भाषा में लिखी।  फिर इस कथा को समय समय पर कई कविओं और लेखकों ने लिखा।  उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस भक्ति की पराकाष्टठा है और बहुत लोकप्रिय ग्रंथ है।  महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की गाथा लिख कर मानव समाज को अदभुद भेट दी है।  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी का कथन है कि हज़ारों ऋषि और मुनियों की शृंखला में महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास  जी अग्रणी हैं। इन्होंने ब्रह्म ज्ञान को बड़ी सरलता से रामायण, महाभारत इत्यादि के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। समस्त विश्व इनके इस अमूल्य योगदान का सदैव ऋणी रहेगा। 


क्या रामायण और महाभारत सिर्फ कथा है या वास्तविक इतिहास है?   यह चर्चा इतिहास के तथाकथित विद्वान् समय समय  पर किया करते हैं।  इस को इतिहास मानो या कथा  इन की महानता पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता। सदिओं पहले रिश्ते नातों और समाज की मर्यादा  का इतना अच्छा विश्लेषण अगर काल्पनिक कथा द्वारा भी किया गया है तो उन ऋषिओं को नमस्कार है जिन्हों ने इतना बढ़िया ग्रन्थ रचा और जनसाधारण को ज्ञान दिया।  परन्तु हिन्दू समाज के लिए राम और कृष्ण साक्षात् भगवान् के अवतार हैं और भक्ति और श्रद्धा का आधार हैं।  राम भक्ति से ओत प्रोत तो सब इतने हैं कि अभिवादन के लिए राम राम शब्द का प्रयोग किया जाता है।  राम भक्त हनुमान सब के दिल में बस्ते  हैं और भारत में सीता नारी जाति का आदर्श है।  कृष्ण तो भक्ति का सार हैं।  वृन्दावन में कृष्ण भक्ति की सरिता बहती है।  सुरदास और मीरा ने कृष्ण भक्ति की वह धारा  बहाई जिस से   सारा हिन्दू समाज  आत्मविभोर होता रहता है। कृष्ण द्वारा जो अर्जुन को ज्ञान दिया गया वह महाभारत का ही भाग है जिस को हम भगवद गीता के नाम से  जानते हैं।  इस की चर्चा अगले अंक में। इस अंक में बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि तथाकथित आधुनिक बनने के चक्र में इन महान ग्रंथो को नज़रअंदाज़ करना समझदारी नहीं।  इन का ज्ञान सनातन है और इन के साथ जुड़े रहना रूढ़िवाद नहीं बल्कि विवेक है।  आशा करता हूँ कि सब  रामायण और महाभारत से प्रेरणा लेते रहेंगे।  


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

10.08.2022