Thursday, July 28, 2022

हिन्दू धर्म: पुरातन और सनातन

 

हिन्दू धर्म: पुरातन और सनातन

Seema Sandesh 30.07.2022 

आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। उत्तर पूर्व भारत के अधिकाँश राज्यों  में आदिवासी ईसाई हो चुके। मेघालया, मणिपुर, मिज़ोरम, नागालैंड में तो 70% से ज़्यादा ईसाई हो गए हैं। ओडिशा, आंध्र, तमिल नाडु, कर्नाटक  में भी काफी लोगों को ईसाई बनाये जाने का आरोप है। अब तो पंजाब जैसे प्रदेश में भी  काफी दलित या मजहबी सिख  ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे  हैं।  क्या  कभी किसी ने  सोचा है कि क्यों दलित, आदिवासी और अनुसूचित जनजाति आसानी से ईसाई बन जाते हैं।  ईसाई धर्म में परिवर्तन के लिए तीन  रास्ते अपनाये जाते हैं: स्कूल, हस्पताल और पैसे का लोभ। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 2.3% जनता ईसाई है और चार राज्यों में ईसाई बहुसंख्या में हैं। हिन्दुओं का अधिकाँश ईसाईकरण 1947 के बाद हुआ।  


1947 में एक बार तो देश का बटवारा इस्लाम के नाम पर हो गया और पकिस्तान और बांग्लादेश इस्लाम के नाम पर बन गए। अब देश में 15% जनता मुस्लिम है। आजकल हिन्दू से इस्लाम  धर्म  में परिवर्तन तो शायद कम  है।  परन्तुु यह चर्चा में है कि मुस्लिम जनसँख्या की वृद्धि हिन्दुओं से ज़्यादा है। पिछले दशक (2001-2011) में   हिंदू जनसंख्या में  16.76% वृद्धि हुई  जबकि मुस्लिम विकास दर 24.60%  थी। शादी विवाह के कारण भी कई लड़कियां मुस्लिम बन जाती है।  कई मर्द दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम बन जाते हैं।  जिस गली, कूचे, गाँव, शहर या प्रदेश में मुस्लिम जनसँख्या बढ़ जाती है वहां हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं और धीरे धीरे किनारा करने पर मज़बूर हो जाते हैं। जम्मू कश्मीर में 68% जनता मुस्लिम है और 1991 में वहां से कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर दिया गया और आज तक वापिस घर नहीं जा पाए।   केरल और  बंगाल में 27% जनता मुस्लिम है। उत्तर प्रदेश, बिहार में इस तरह के बहुत उदाहरण हैं जहाँ पर कई गली, कूचे, गाँव, शहर में मुस्लिम बहुसंख्या में हैं।  मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस क्यों करते हैं और मुस्लिम एक इलाके में इकट्ठे होकर क्यों रहते हैं यह अलग लेख का विषय है परंतु सच यह है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दु असुविधा महसूस करते हैं। 


धर्म को असल खतरा  आधुनिक जीवन शैली से है।  इस  के कारण हिन्दू स्वयं ही धार्मिक रीति रिवाज़ को भूल रहे हैं। विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी अर्थव्यवस्था और सभ्याचार पर गहरा प्रभाव डाला है। इस के कारण पूंजीवाद का बोलबाला है।  आज का आधुनिक मनुष्य  दिन भर के  काम से फुर्सत पाकर मंदिर, मस्जिद, गिरिजा घर या गुरुद्वारा जाने की बजाय जिम में गेम खेलना पसंद करता है या क्लब में जाकर दोस्तों के साथ समय व्यतीत करता है।  वह परम्परागत  तीज त्योहारों को महत्व नहीं देता बल्कि मनोरंजन के नए नए विकल्प ढूंढता है।   रिश्ते नाते प्यार वफ़ा अब मानव के व्यवसाय की व्यस्तताओं और ज़रूरतों की भेंट चढ़ गए हैं।  परिवार टूट रहे हैं।  संयुक्त परिवार तो रहे नहीं।  एकाकी परिवारों में भी पति पत्नी   इकट्ठे नहीं रह पाते।  परम्परा मालूम ही नहीं तो पालन कैसे होगा। 


कितने हिन्दू हैं जिनको हिन्दू धर्म और संस्कृति की सही पहचान है और वह इस का गर्व महसूस करते हैं कि वह हिन्दू हैं।  हिन्दू धर्म की पहचान मात्र तिलक, चोटी, साड़ी, बिन्दी, सिन्दूर,  मौली, भगवा, केसरिया और मंदिर शिवालों जैसे प्रतीकों  से ही नहीं है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है वेद, शास्त्र, योग, आयुर्वेद,  रामायण, महाभारत, भगवद गीता।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है गृहस्थ जीवन जिस में  माता पिता की सेवा,  नारी का सम्मान, साधु संत और अतिथि का आदर सत्कार है। हिन्दू संस्कृति की पहचान है  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का चिंतन और प्रयास।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य अस्तेय  और अपरिग्रह का अनुशासन। हिन्दू संस्कृति की पहचान है शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान जैसे नियम। हिन्दू संस्कृति की पहचान है ऐसी जाति प्रथा जिस में एक गोत्र में विवाह नहीं होता। हिन्दू संस्कृति की पहचान है  भजन, कीर्तन, मन्त्र,  श्लोक, साधना, सत्संग सेवा। हिन्दू संस्कृति की पहचान है समय की वह गणना जिस में सृष्टि के काल चक्र की पहचान है: जिस में महीने का हिसाब सूर्य और चन्दृमाँ    की गति पर रखा जाता है। सूर्य की  12 राशिआँ  और बारह सौर मास हैं।  प्रत्येक महीने में चाँद की कलाओं के अनुसार 15-15  दिन के दो पक्ष - शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक वर्ष  में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 28 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीज त्यौहार जो प्रकृति के साथ मेल खाते हैं।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के तीर्थ स्थान और मंदिर, आश्रम और गुरुकुल।  हिन्दू संस्कृति की पहचान है यहाँ के साधु संत, ऋषि और मुनि और तपस्वी। हिन्दू संस्कृति की पहचान है कर्म फल का ध्यान जो कहता है जैसा करोगे वैसा भरो गे। हिन्दू संस्कृति की पहचान है जीवन में  पाप और पुण्य का विचार। 


जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम हमेशा पर्यासरत रहते हैं। धर्म और विज्ञान  दो मार्ग हैं। धर्म पुरातन है और विज्ञान आधुनिक। गत 300 वर्षों में  विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी ने हमारी 10,000 साल पुरानी संस्कृति और रहन सहन पर बहुत प्रभाव डाला है। कई मामलों में विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और धर्म की मान्यताओं में स्पष्ट टकराव की स्थिति आ गई है। यह इस पीढ़ी के  निर्णय पर निर्भर करता है कि भविष्य में धार्मिक आस्थाओं को माना जाएगा या विज्ञान की खोज को या कोई बीच का रास्ता निकलेगा। आजकल बहुत चर्चा है कि हिन्दू धर्म खतरे में है। सब से बड़ा खतरा है धर्म परिवर्तन को कहा जा रहा है। परन्तु विज्ञान और विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी और उस से प्रभावित संस्कृति और अर्थव्यस्था ने हमारी धार्मिक आस्थाओं पर ज़्यादा प्रभाव डाला है और समाज आजकल धार्मिक अनुष्ठान में विश्वास नहीं रख  रहा।  


परन्तु ध्यान रहे, विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले और पूंजीवाद कितने भी पैर पसार ले या वामपंथी कितना भी धर्म का विरोध कर लें जब उदासी मन में घर कर लेती है और जब प्राकृतिक आपदा में मनुष्य घिर जाता है तो मन ईश्वर को याद करता है।  कहते हैं ना दुःख में सिमरन सब करे सुख में करे ना कोई।  जो सुख में सुमिरण करे तो दुःख काहे को होये। विज्ञान से प्रभावित मनुष्य सब कुछ परखना चाहता है। वह ईशवर और आस्थाओं को अंधविश्वास और रूढ़िवाद कहता है और उस के बारे में उदासीन है।  परन्तु हज़ारों वर्ष की परम्परा और विवेक को रूढ़िवाद कह देना भी रूढ़िवाद है।  ज़िन्दगी में कुछ जान कर चलो कुछ मान कर चलो।  हज़ारों वर्ष पुरातन संस्कृति से उदास मत हो जाइये।  यह पुरातन भी है और सनातन भी।  विज्ञान ने इस के कई पहलूयों को सही माना है।  इस लिए राम को समझो, कृष्ण को जानो, गीता ज्ञान हासिल करो, कर्मयोग को समझो, राजयोग को समझो, भक्ति और ज्ञान का मार्ग अपनाओ। तीर्थ यात्र करो।  सही साधु संतों का सानिध्य प्राप्त करो। सत्संगत करो।  और परम्परागत संस्कारों का सम्मान करो।  अगले कुछ अंको में इन पर चर्चा करेंगे।  


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

24.02.2022




Sunday, July 3, 2022

चार जुलाई: स्वामी विवेकानंद

 चार जुलाई: स्वामी विवेकानंद 


सतीश कालड़ा, बैंगलोर 


SeemaSandesh 04.07.2022


“To the 4th July”   स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित एक अंग्रेजी कविता है। स्वामीजी  ने संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर 4 जुलाई 1898 को यह कविता लिखी थी। इस कविता में, स्वामी विवेकानंद जी ने स्वतंत्रता की प्रशंसा और महिमामंडन किया है। इस  कविता से पता लगता है कि मानव  स्वतंत्रता का  उनके दिल में कितना महत्व था । संयोग से, 4 जुलाई 1902 को स्वयं विवेकानंद स्वामी जी ने महासमाधि ली और उनकी आत्मा ने इस भौतिक शरीर से स्वतंत्रता प्राप्त की। 4 जुलाई  संयुक्त राज्य अमेरिका की वर्ष गांठ है और संयुक्त राज्य अमेरिका स्वामी जी की कर्मभूमि रही।  “To the 4th July”   कविता लिख कर  स्वामी जी द्वारा स्वतंत्रता की भावना का महिमामंडन करना और 4 जुलाई 1902 को भौतिक शरीर से मुक्ति प्राप्त करना शायद स्वामी जी का अपनी कर्मभूमि को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक अंदाज़ था।  मुक्त तो स्वामी जी सदा से ही थे।  


1893 में विवेकानंद विश्व धर्म संसद में भारत और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गए। संसद में भारी सफलता प्राप्त करने के बाद, 1893 से 1897 तक, उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड की यात्रा की, और धर्म और वेदांत पर व्याख्यान की एक श्रृंखला दी। वह 1897 में भारत लौट आए और 1897 और 1899 के बीच कई राज्यों का दौरा करते हुए वहां की यात्रा की। 1898 में स्वामी जी  कश्मीर गए, जहाँ वे डल झील पर एक हाउसबोट पर रुके। कुछ अमेरिकी और अंग्रेजी शिष्यों के साथ कश्मीर में यात्रा करते हुए, विवेकानंद ने यह कविता 4 जुलाई 1898 को संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की वर्षगांठ के उत्सव के एक भाग के रूप में लिखी और उस दिन के नाश्ते के दौरान इसे जोर से पढ़ने को कहा। कविता अंग्रेजी में है इस लिए इस का कविता में अनुवाद करना शायद  हो पाए।  आइये जानते है इस कविता में लिखे भावों का सार।  



To the 4th Julu

स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर 4 जुलाई

Behold, the dark clouds melt away,

That gathered thick at night and hung

So like a gloomy pall above the earth!

Before thy magic touch, the world

Awakes. 

The birds in chorus sing.

The flowers raise their star-like crowns—

Dew-set, and wave thee welcome fair.

The lakes are opening wide in love

Their hundred thousand lotus-eyes

To welcome thee, with all their depth.

All hail to thee, thou Lord of Light!

A welcome new to thee, today,

O Sun! Today thou sheddest Liberty!

Bethink thee how the world did wait,

And search for thee, through time and clime.

Some gave up home and love of friends,

And went in quest of thee, self-banished,

Through dreary oceans, through primeval forests,

Each step a struggle for their life or death;

Then came the day when work bore fruit,

And worship, love, and sacrifice,

Fulfilled, accepted, and complete.

Then thou, propitious, rose to shed

The light of Freedom on mankind.

Move on, O Lord, in thy resistless path!

Till thy high noon o'erspreads the world.

Till every land reflects thy light,

Till men and women, with uplifted head,

Behold their shackles broken, and

Know, in springing joy, their life renewed!

देखो, वह काले और घने बादल 

जो   इकट्ठा होकर रात होने का अंदेशा दे रहे थे 

और अन्धकार जिस ने घेर रहा था 

और पृथ्वी के ऊपर एक उदासी छ रही थी!


आज 4 जुलाई उगते सूरज  के  जादुई स्पर्श से, 

दुनिया जाग रही है। 

पक्षी कोरस में  गा रहे  हैं।

फूल खिल खिला रहे  हैं-

और ओस की बूंदे मोती बन कर 

आपका स्वागत कर रही हैं।

झीलें प्यार में खुल रही हैं

उनके एक लाख कमल

कमल नेत्रों की तरह आपका स्वागत 

पूरी गहराई के साथ कर रही हैं।


हे प्रकाश के प्रभु, सब तेरी जय हो!

आज आपका स्वागत है,

हे सूर्य! आज तूने दुनिआ को स्वतंत्रता दी!

तुम सोचो कि दुनिया ने कैसे इंतजार किया,

और कितने समय और काल से  तुझे ढूंढ़ा।

कुछ ने घर छोड़ दिया और दोस्तों का प्यार,

और तेरी तलाश में चले  गये, 

कुछ स्व-निर्वासित हुए,

कुछ सुनसान महासागरों में चले गए, 

कुछ ने   जंगलों की राह ली,

प्रत्येक कदम उन्हों ने  जीवन या मृत्यु के लिए संघर्ष किया;

फिर वह दिन आया जब कर्म फलित हुआ,

और पूजा, प्रेम और बलिदान के फलस्वरूप ,

उनकी प्रार्थना पूर्ण हुई, स्वीकृत हुई ।

तब तू हितैषी,बन कर उठे 

मानव जाति पर स्वतंत्रता का प्रकाश किया।


आगे बढ़ो, हे प्रभु, अपने प्रतिरोधहीन मार्ग पर!

और आपने प्रचुर प्रकाश  को दुनिया के हर कोने  में फैला दो।

जब तक   भूमि का हर क्षेत्र तेरी रोशनी को प्रतिबिंबित न करे,

जब तक पुरुष और महिलाएं, 

ऊपर उठे हुए सिर के साथ,

स्वतंत्रता के प्रकाश को महसूस कर लें 

देखो सब की बेड़ियाँ टूट जाएँ  और

बसंत की खुशियाँ 

 उनकी  जिंदगी में   खिल उठें!





Friday, July 1, 2022

मानव शरीर के सात चक्र

  मानव शरीर के सात चक्र  


Seema Sandesh, Sriganganagar 30.06.2022

विज्ञान और तकनीक के इस युग में धर्म को आदिकालीन, पिछड़ा और रूढिवाद कह कर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। परन्तु हिन्दू वैदिक संस्कृति में कितने ही ऐसे आयाम हैं जिन में प्रकृति के ऐसे ऐसे रहस्यों की व्याख्या है  जिस तक आधुनिक विज्ञान को पहुँचने में शायद काफी समय लगेगा।  मानव मनोविज्ञान और शरीर क्रिया का जो अध्ययन योग गुरुओं ने किया है उस की बारीकी तक विज्ञान कब पहुंचे गा कह नहीं सकते।  निम्नलिखित ज्ञान मैंने योग गुरु श्री श्री रवि शंकर जी के कुछ परवचनो से संकलित किये हैं।  इन्हें पढ़ कर आप इस बात का खुद अन्दाज़ लगा सकते हैं कि प्रकृति के यह कितने गहन रहस्य हैं।  कोई अतिश्योक्ति हो जाए तो पहले से ही क्षमा प्रार्थना करता हूँ।  


गुरुदेव कहते हैं मानव शरीर में मुख्य सात चक्र है। चक्र माने जहाँ नस नाडियां सब एकत्रित होती हैं। तो हमारे शरीर में सात चक्र हैं।  प्रथम है मूलाधार चक्र जहाँ से रीढ़ की हड्डी शुरू होती है। यह गुदा  प्रदेश के पास है। उससे 2-4 ऊँगली ऊपर जननेद्रीय के पीछे है दूसरा चक्र जिसे स्वादिष्ठान चक्र कहते हैं। तीसरा चक्र नाभि पर है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। चौथा चक्र हृदय में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। पाँचवाँ चक्र गले में  है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। छटा चक्र दोनों भौहों  के बीच जो स्थान है वहां स्थित है जिसे आज्ञा चक्र कहते है। और सातवां चक्र है सर की छोटी पर।  इसे सहस्त्रार कहते हैं। 


क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं? जी हाँ। हमारी भावनायों की संवेदना  इन चक्रों से जुडी रहती हैं। आपने महसूस किया होगा की जब हमें डर लगता है तो हमारी गुदा सिकुड़ जाती है। जब ईर्ष्या होतो है तो पेट में जलन होती है।  प्रेम और द्वेष की भावना का सम्बन्ध हृदय चक्र से रहता है।  


गुरूदेव का कथन है कि प्राण ऊर्जा एक ही है।  इस का अनुभव अलग अलग चक्रों में अलग अलग तरह से होता है।  कुछ अनुभव सकारात्मक होते हैं कुछ नकारात्मक।  जैसे मूलाधार चक्र  स्थिरता का द्योतक है और जड़ता भी इसी के कारण से होती है।  पृथ्वी तत्व का प्रभाव शरीर पर इसी चक्र  से महसूस होता  है। पृथ्वी स्थिरता प्रदान करती है।  ढोल नगाड़े जैसे वाद्य इस चक्र को प्रभावित करते है। स्वादिष्ठान चक्र से जनन इन्द्रिय प्रभावित होती है। जल तत्व का प्रभाव इस चक्र से संचालित होता है।  इस चक्र का सकारात्मक प्रभाव व्यक्ति में सृजन और कला को उजागर करता है और इस का नकारात्मक प्रभाव काम वासना उत्पन करता है।  



तीसरा चक्र नाभि क्षेत्र में है और इसे मणिपुर चक्र कहते है। अग्नि तत्त्व इस चक्र को प्रभावित करता है। इस चक्र के सही ढंग से काम करने से मनुष्य में संतोष, उदारता और ख़ुशी की भावना बनी रहती है।  इस चक्र का नकारात्मक प्रभाव ईर्ष्या और द्वेष है।  ईर्ष्या और द्वेष से पेट में जलन होना स्वाभाविक है।  इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में तार से संगीत निकलता है जैसे सितार, एक तारा, इत्यादि।  


चौथा चक्र हृदय क्षेत्र में है जिसे अनहद चक्र कहते हैं। जीवन मैं शुद्ध प्रेम की भावना इस चक्र से संचालित होती है और वायु तत्त्व इस को प्रभावित करता है। प्रेम उन्मुख हुआ व्यक्ति वायु तत्त्व के प्रभाव से वायु की तरह चंचल रहता है। इस चक्र को वह वाद्य प्रभावित करते हैं जिन में वायु से संगीत  निकलता है जैसे कि बांसुरी, माउथ ऑर्गन इत्यादि। 


पाँचवाँ चक्र गले में  है उस को विशुद्धि चक्र कहते हैं। यह आकाश तत्त्व से प्रभावित है।  कृतज्ञ होने के भाव हमें इस चक्र से महसूस होते है। आप ने महसूस किया होगा कि कृतज्ञ होने पर गला रौंद जाता है।  दुखी इंसान को भी गले में हरकत महसूस होती है। आकाश तत्त्व की प्रधानता के कारण इस चक्र को भी बांसुरी जैसे यंत्र ही प्रभावित करते हैं।  


आज्ञा चक्र ज्ञान का चक्र है और दोनों भौहों  के बीच जो स्थान है वहां स्थित है। ज्ञान और क्रोध का अनुभव इस चक्र से होता है।  और सातवां चक्र है सर की छोटी पर।  इसे सहस्त्रार कहते हैं। ज़िन्दगी में आनंद का अनुभव इस चक्र से होता है।   अगर कोई सो रहा हो तो उस के सर की छोटी के ऊपर 12 ऊँगली की दूरी तक अगर थोड़ा हाथ हिला दो या हलकी सी चुटकी की आवाज़ करो या उनका नाम फुसफुसाओ तो वह जग जाएगा। उनको छूने की ज़रुरत नहीं।


क्या हम इन चक्रों को महसूस कर सकते हैं और इनको खोट रहित करने के लिए साधना कर सकते हैं? जी हाँ। जब हम आपने शरीर के इन चक्रों पर ध्यान दे कर साधना करते हैं या समाधी लगते  हैं तो पहले तो कुछ अनुभव नहीं होता।  खालीपन सा लगता है।  फिर थोड़े दिन के अभ्यास के उपरान्त  वहां स्पंदन होने लगता है। तरंग का अनुभव होता है। गुरुदेव कहते हैं कि अभ्यास करने से तरंगों के अनुभव के पश्चात प्रकाश भी अनुभव में आता है।  यह सब निरंतर और सत्कार सहित सहज समाधि का अभ्यास करने से अनुभव में आता है और सहज समाधि की दीक्षा किसी अच्छे गुरु से ली जा सकती है।  साधना के लिए मधुर संगीत का श्रवण भी किया जा सकता है। हर चक्र को उजागर करने के विभिन्न वाद्य और राग भी हैं।  


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सतीश कालड़ा, बैंगलोर 



देवताओं का निवास


शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास इस प्रकार है—


१. आँख — चन्द्र, सूर्य


२. कान —दशो दिशाएँ


३. नाक —अश्विनी कुमार


४. मुँह — अग्निदेव


५. जिभ्या — वरुण


६. हाथ — इन्द्र


७. पैर — उपेन्द्र


८. गुदा — गणेश


९. लिंग —ब्रह्मा


१०. नाभि — विष्णु-लक्ष्मी


११. हृदय — शिव-पार्वती


१२. कंठ — सरस्वती


१३. आज्ञाचक्र-- शिव