पतंजलि योग सूत्र
अन्तराष्ट्रीय योग दिवस की आप सब को शुभ कामनायें। योग विश्व को भारत की एक अनूठी भेंट है। 200 वर्ष भारत में राज करने के दौरान अंग्रेज़ भारत से सम्पति लूटते रहे। कहीं भारत के आध्यात्म को सीख लिया होता तो विश्व शांति की और अग्रसर हो गया होता। परन्तु देर आये दरुस्त आये। अब योग का प्रचलन विश्व भर में हो रहा है। विडम्भना यह है कि भारत में भी जनसाधारण में योग अब ज़यादा प्रचलित हुआ है जब पश्चिम के देशों और अमरीका में इस को मान्यता मिली। इस से पहले तो यह कुछ योग केंद्रों तक सीमित था। वर्तमान काल में स्वामी रामदेव और श्री श्री रवि शंकर जैसे गुरुओं के प्रयासों से योग का प्रचार और प्रसार जन जन तक पहुंचा है।
योग के वैश्वीकरण का प्रमुख कारण है कि इसे शारीरक स्वास्थ्य के लिए सही व्यायाम समझा जाता है। योगासन करना ही योग समझ लिया जाता है। असल में योग केवल योगासन नहीं। योग का भारत के बहुत से ग्रंथों में ज़िक्र है। भगवद गीता के 18 के 18 अध्यायों के नाम में योग शब्द है: अर्जुन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान योग, ध्यान्योग, भक्ति योग इत्यादि। गीता के अनुसार कर्म की कुशलता का नाम ही योग है। परन्तु योग के बारे में विशेष ग्रन्थ है पतंजलि योग सूत्र जिसमें ऋषिजी ने सुन्योजित ढंग से इस की व्याख्या की है और इस को विज्ञान का रूप दे दिया है।
पतंजलि ऋषि के अनुसार योग एक अनुशासन हैं जिस के द्वारा मन की वृतियों का निरोध करना ही योग है। मन बहुत चंचल है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन को काबू करने का अनुशासन ही योग है। और यह अनुशासन कोई पुस्तक पढ़ कर हासिल नहीं होता या कोई ज्ञान प्रवचन सुन कर नहीं होता। इस के लिए तप और स्वाधयाय आवश्यक है और वह भी दीर्घ काल तक, निरंतर अभ्यास करते रहना है और इस अभ्यास को सत्कार सहित और वैराग्य से करना है। योग के पथ पर सफलता, किये गए अभ्यास और ईश्वर कृपा पर निर्भर करती है। सफलता का अर्थ है चित्त का संयमित हो जाना।
महर्षि पतंजलि ने योग के लिए आठ अंगों का मार्ग सुझाया है जिसे अष्टांग योग कहते हैं। यह हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। वैसे तो योग के आठ अंगों का वर्णन नियमित क्रम से दिया गया है परन्तु श्री श्री रवि शंकर के मतानुसार इनका अनुसरण अनुक्रमिक ढंग से अनिवार्य नहीं हैं। आपका कथन है कि जैसे कुर्सी के एक पैर को खींचने से पूरी कुर्सी आपके पास आ जाती है, वैसे ही इन आठ अंगों में से किसी एक को मजबूती से पकड़कर अभ्यास शुरू हो जाता है और आप योग के मार्ग में मजबूती से स्थापित हो जाते हैं।
मन को समाधि तक लेकर जाने की साधना और उसी अवस्था में स्थितप्रज्ञ होने का नाम ही योग है। साधना उसकी की जाती है जिस के बारे में ध्यान किया जाए। ध्यान उस का किया जाता है जिस को धारण कर लिया जाए। और मन में कुछ धारण करने के लिए अन्तरमुखी होना आवश्यक है। इस लिए प्रत्याहार (अन्तरमुखी होना), धारणा, ध्यान और सामधि मिल कर मन को संयम करने की एक साधना है। संयमी मनुष्य योगी है और सब कुछ हासिल कर सकता है।
संयम के इस पथ पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम सहायक सिद्ध होते हैं। सर्वप्रथम निरोगी काया का होना अनिवार्य है। निरोगी काय वाला प्राणी ही सही आसान में बैठ कर साधना कर सकता है। इस लिए योग में आसन का महत्त्व है। प्राण जीवन का आधार हैं। श्वास चल रही है तो जीवन है। सांस विभिन्न भावनाओं से जुड़ी हुई है। क्रोध में श्वास धौंकनी की तरह चलता है। चिंताग्रस्त मनुष्य का सांस डूबने लगता है। वह ठंडी आहें भरता है। बाईं नासिका से चलने वाला श्वास ठंडक प्रदान करता है दाईं नासिका का श्वास गर्मी प्रदान करता है। मन को श्वास से नियंत्रित किया जा सकता है। श्वास प्रश्वास की सही क्रिया का नाम ही प्राणायाम है और इस को किसी समर्थ गुरु से सीखना चाहिए और सिखाये गए प्राणायाम का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।
कितने भी आसन प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि कर लो, जब तक नियत ठीक नहीं मन की चंचलता बनी रहेगी और योग नहीं होगा। मन अगर विषय विकारों से भरा हुआ है, काम क्रोध, लोभ मोह में फसा रहता है, चोरी चकारी, धोखा धड़ी, झूठ खसूठ और व्यभिचार घर कर गया है तो कहाँ राहत मिलेगी। मात्र सुबह शाम का योग आसन व्यायाम कर लेने से योग नहीं हो जाता। प्रार्थना भी अच्छी से अच्छी हैं। शब्द तो बहुत अच्छे हैं: “विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, दुःख दूर करो देवा; श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा प्रेम बढ़ाओ सन्तन की सेवा।” परन्तु इस को तोते की तरह सुबह शाम रटने से क्या फायदा अगर इस के ऊपर अमल ही नहीं किया तो। कोई आचार संहिता तो होनी चाहिए। पतंजलि महाऋषि ने बहुत वैज्ञानिक तरीके से आचार संहिता दी है।
पतंजलि ने व्यक्तिगत नैतिकता के लिए पांच नियम दिए और सामाजिक नैतिकता के लिए पांच यम। पांच यम हैं: सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचार्य, अस्तेय और अपरिग्रह। पांच नियम हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। कहने को तो यह 10 शब्दों की आचार संहिता है परन्तु इनका पालन कर लिया जाए तो मानव समाज पृथ्वी पर ही स्वर्ग का अनुभव कर सकता है। महात्मा गाँधी ने मात्र सत्य और अहिंसा का निष्ठा पूर्वक पालन किया था और वह राष्ट्रपिता बन गए। इन का विस्तार से ज़िक्र करने के लिए अलग से लेख लिखना उचित रहेगा। परन्तु क्या रखा है शब्दों में इन्हे परोने से। फायदा तो इनको निष्ठापूर्वक पालन करने में ही है। इस लिए किसी अच्छे गुरु की शरण लेकर इन को समझना चाहिए और निष्ठा पूर्वक इन का अभ्यास करना चाहिए।
धीरज रखिये। योग के मार्ग पर तुरंत कुछ हासिल नहीं होता। योग के मार्ग पर धीरज रख कर सत्कार सहित अभ्यास करते चलिए। सत्य का व्रत लें, अस्तेय (चोरी ना करने) का व्रत लें, अपरिग्रह (ज़रुरत से ज़्यादा संग्रह ना करने) का व्रत लें। शुरू शुरू में व्रत लें कि अगले 10 दिन तक झूठ नहीं बोलूंगा, चोरी और भ्रष्टाचार नहीं करूँगा, ग्राहक को ठीक सौदा दूँगा। फिर धीरे धीरे इस अवधि को बढ़ाते चलें। धीरे धीरे सफलता हासिल होगी। पतंजलि महर्षि ने सुझाया है कि शुरुआत क्रिया योग से करो। इस का अर्थ है तीन नियम: तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। तप का अर्थ है धीरज रख कर कठिनता का सामना करना। स्वाध्याय मतलब जागरूक होना। सत्संग से और आत्म चिंतन से जागरूकता आती है। और ईश्वर प्रणिधान मतलब ईश्वर के प्रति आस्था और भक्ति को बनाये रखो सफलता अवश्य आप के कदम चूमेगी। आप सब का कल्याण हो। यही शुभेच्छा है। जय गुरुदेव।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर

बहुत बेहतरीन प्रस्तुति है। बधाई हो।
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