Friday, May 7, 2021

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर 


गुरुदेव श्री श्री रविशंकर वर्तमान समय में भारत के सुप्रसिद्ध एवं महान संत और आध्यात्मिक गुरु  हैं। आप का जन्म 13.05.1956 को हुआ और इस वर्ष आपका भौतिक शरीर  65 वर्ष का होने को है। 25 वर्ष की अल्पायु में (1981)  आप ने Art of Living  संस्था की स्थापना की।  इस वर्ष 2021 इस संस्था के 40  वर्ष पूरे होने जा रहे हैं।  आप के  द्वारा प्रशिक्षित सुदर्शन क्रिया  और जीवन शैली का प्रचार अति लोकप्रिय है और विश्व के 150 से ज़्यादा देशों में आप के करोड़ों अनुयायी हैं। Art of Living का मुख्य आश्रम भारत के कर्नाटक प्रदेश की राजधानी बैंगलोर में कनकपुरा रोड पर स्थित है और भारत के कई नगरों में एवं अनेक  देशों में संस्था की शाखाएं हैं। 40 वर्ष की अल्पावधि में इस संस्था का इतना विस्तार अति प्रभावशाली है।  आइए, गुरु जी के जीवन, उनकी संस्था और उनके द्वारा प्रशिक्षित जीवन शैली  की जानकारी साँझा करते  हैं। 

बहुत कम लोगों ने गुरुजी को सही ढंग से समझा है। प्राय लेखक कुछ आंकड़े दे कर तस्सली कर लेते हैं। कुछ भावुक हो कर उनके बारे में चार शब्द लिख देते हैं या गुरु स्टोरी प्रकाशित  कर देते हैं। गुरुजी का व्यक्तित्व और उनका प्रचार प्रसार इतना व्यापक और गहन है कि आंकड़ों  में उस का पार पाना कठिन है। यह प्रयास भी मात्र एक बौना सा प्रयास है। मुख्यतः तीन विषयों पर चर्चा करेंगे:

  1. गुरुजी का बचपन और शिक्षा

  2. गुरुजी के गुरुदेव एवं संन्यास 

  3. गुरुजी द्वारा स्थापित संस्था एवं सेवा प्रकल्प

गुरुजी का बचपन और शिक्षा: कहते हैं जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान । वैसे भी भारत में साधु सन्यासी परिवार से संबंध त्याग देते हैं।  फिर भी जिज्ञासु जानना ही चाहते हैं तो विदित हो:  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी की बहन श्रीमती भानुमति नरसिम्हा जी ने गुरुजी की जीवन कथा लिखी है जिस को Westland Publications Pvt Ltd, Chennai ने  2018 में प्रकाशित किया है। इस के अनुसार उन का जन्म 13.05.1956 को भारत के तमिलनाडु (जिला तंजावुर गांव पापनाशम) में उनके ननिहाल में हुआ और पालन पोषण बेंगलुरु के जयनगर क्षेत्र में हुआ। आप के माता पिता जाति से ब्राह्मण हैं। परिवार में पूजा पाठ की प्रथा और आस्था भरपूर रही।  गुरूजी की  माता श्रीमती विशालाक्षी सहज स्वभाव की नारी एवं पूजा पाठ में संलग्न रहती। इस का बालक रवि पर बहुत प्रभाव पड़ा। कहते हैं कि मात्र चार वर्ष की आयु में भगवद गीता शिशु रवि को कंठस्थ थी।  ऐसा दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवारों में प्राय होता ही है। परंतु बालक रवि के बारे में कहा जाता है कि उन्हें इस का गहन ज्ञान बचपन से ही था। गुरुजी प्राय सब शास्त्रों से परिचित हैं हालांकि उनके साथ रहने वाले लोग जानते हैं कि गुरुजी ने शास्त्रों का अध्ययन नियमित तौर पर नहीं किया। 

गुरु जी के  पिता श्री वेंकटरमण सुसंस्कृत और कर्मनिष्ट व्यक्तित्व   के मालिक थे और परिवार में साधु संतों का आवागमन लगा रहता था।  उन के पड़ोस में ही पंडित सुधाकर चतुर्वेदी रहते थे जिन्हों ने महात्मा गाँधी के सानिध्य जेल में  काफी दिन व्यतीत किए थे। ऐसा भी सुनने में आया है कि पंडित जी ने ही गांधी जी को गीता की ओर उन्मुख किया था। पंडित जी  से बालक रवि काफी प्रेरित होते रहे।  माता पिता के संस्कार, साधु संतों का सानिध्य, और शास्त्रों का अध्ययन - इन सब ने बालक रवि पर दूरगामी प्रभाव छोड़ा।  पूर्व जन्म के संस्कारों का योगदान तो होता ही है। 

कहते हैं कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात। वह महापुरुष जो आज के दिन जन जन के गुरु है वह उन दिनों भी उतनी ही प्रतिभा के मालिक रहे होंगे जब वह स्कूल या कॉलेज के विद्यार्थी थे। बालक रवि के स्कूल की शिक्षा बैंगलोर में ही MES स्कूल में हुई और St जोसफ कॉलेज से आप ने स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त की।  आप का एक सहपाठी मुझे मिला जिस ने मुझे बताया था कि रवि अत्यंत सौम्य प्रकृति के थे एवं खेल कूद की बजाय गीत संगीत में ज़्यादा दिलचस्पी रखते थे। गुरु जी स्वयं भी कई बार कहते हैं कि अगर वह अध्यात्म मार्ग पर ना आते तो अवश्य वीणा वादन करते। गुरूजी वीणा वादन में अति निपुण हैं।  गुरूजी का कथन है कि वीणा के सात तार जीवन के सात स्तर हैं: स्थूल शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और आत्मा। जब इन सब का सामंजस्य हो जाता है तो जीवन रूपी संगीत प्रकट हो जाता है । 

कुछ लोग जानना चाहते हैं कि गुरु जी का नामकरण कैसे हुआ और इस में दो बार श्री श्री का प्रयोग क्यों है?  रवि शंकर नामकरण का जिक्र तो भानु दीदी ने अपनी पुस्तक में विस्तार से किया है। गुरुजी का जन्म रविवार को हुआ इसलिए रवि शब्द का चयन किया गया। दादीश्री ने आशीर्वाद दिया की सूर्य की भांति रवि जग को रोशन करे गा। उन की जन्म तिथि का मेल जगद्गुरु शंकराचार्य जी से भी था। इसलिए पूरा नाम रखा गया रविशंकर। समय रहते रविशंकर प्रसिद्धि हासिल करने लगे। उन दिनों सितार वादक श्री रवि शंकर बहुत प्रसिद्ध थे। बस उन के नाम से थोड़ा भिन्न होने के कारण श्री श्री रविशंकर नामकरण हो गया और अब तो श्री श्री या गुरुदेव कहना ही काफी है।

गुरूजी की बहन ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनके भाई रवि स्कूल में उन बातों में दिलचस्पी नहीं लेते थे जिन में सामान्य किशोर इच्छुक होते हैं: जैसे खेल कूद फिल्मी दुनिया इत्यादि। बल्कि रवि की दिलचस्पी ज़िन्दगी की गहराईओं को जानने में हुआ करती थी।

 किशोर रवि किशोरों के लड़ाई जगडे  में पड़ने की बजाय उन को सुलझाने में लगे रहते। उन को उसी अवस्था में कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन के गुर आते थे।  उन में से एक गुर यह था कि किसी की दुर्भावना मात्र कुछ समय के लिए रहती है: ज़्यादा से ज़्यादा ढाई दिन।   अगर कुछ देर किनारा कर लिया जाए तो वह स्वयं दुर्भावना को भूल जाता है।  

हालांकि किशोर रवि बाकी किशोरों से अलग प्रकृति के थे परन्तु ऐसा नहीं था कि वह उन से अलग थलग रहते थे। बल्कि वह उन की समस्याओं का हल निकाल देते थे। उनके सहपाठी और अध्यापकों का कथन है की रवि के सानिध्य से उन्हें सुकून मिलता था। वैसे कभी कभी किशोर रवि फिल्मी गीत संगीत का भी आनंद ले लेते थे और आज भी ऐसा है। उनका मनपसंद गीत है: आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने ना तू;  जो भी है बस यही इक पल है। और गुरु जी ने इस को सही मायने में आत्मसात किया है। गुरु जी पल पल वर्तमान में रहते हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। 

किशरवस्था का ही ज़िक्र कर रहे हैं तो इस बात का ज़िक्र भी उचित है।  भानु दीदी (गुरुजी की बहनज) ने लिखा है कि एक बार स्कूल की गुणकृता नाम की किशोर लड़की  ने देवी दुर्गा का नृत्य किया।  उसका चेहरा अति सुंदर था और  अभिव्यक्ति बहुत अर्थपूर्ण थी। उसके लम्बे बाल गुंथे हुए थे और उज्जवल बिंदी लगा रखी थी।  साक्षात् देवी लग रही थी। भानु दीदी लिखती हैं कि मेरे भाई ने उस का नृत्य बहुत ध्यानमग्न हो कर देखा और कुछ समय के लिए उस को ऐसा प्रतीत हुआ के उस ने विश्व के हर उस चेहरे का अवलोकन कर लिया जो उन का इंतज़ार कर रहा है। एक बार गुरु जी से पुछा गया कि आप किशोरावस्था में कैसा महसूस करते थे?  तो उन्होंने उत्तर दिया की वह महसूस करते थे कि वह सर्वव्यापी हैं।   

गुरुजी के गुरुदेव और सन्यास

रवि जब स्नातक हुए तो अन्य युवकों की तरह उन्हों ने नौकरी ढूंढने की बजाय आध्यात्मिक  गुरु की शरण में जाना सही समझा। कहते हैं गुरु बिन ज्ञान नहीं और सत्य को जानने की जिज्ञासा बहुत थी। किशोर रवि महर्षि महेश योगी जी की शरण में हो लिए। हुआ यूं कि आप महर्षि यूरोपियन रिसर्च यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड में दाखिल हुए और वहां पर महर्षि की कृपा से उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की गुरु दृष्टि हुई। परिवार में भी माता, पिता और बहन को संन्यास का तब ज्ञान हुआ जब दो वर्ष बाद यूरोप से वापिस घर आए। 

बस फिर क्या था। महर्षि की प्रसिद्ध उन दिनों इतनी ही थी जितनी आजकल गुरुजी की अपनी है। सन्यासी रवि महर्षि के अंतरंग और  अग्रणी  में से एक थे। वह भारत में महर्षि के विभिन्न सेवा प्रकल्प देखने में व्यस्त हो गए। 

प्राय देखने में आया है की जो इंसान सन्यास लेता है या  वह या तो स्वयं परिवार का त्याग कर देता है या फिर उसका परिवार उसका त्याग कर देता है। सन्यासी स्वयं परिवार का त्याग इसलिए करता है ताकि मोह माया से ऊपर उठ सके। परिवार सन्यासी का त्याग इसलिए कर देता है क्योंकि उस के भगत इतने हो जाते हैं कि परिवार संभाल नहीं पाता। सन्यासी अपना नाम तक बदल लेते हैं और प्राय उस नगर या गांव की तरफ नहीं जाते जहां उनका जन्म हुआ या लालन पालन हुआ। अक्सर गेरुआ पहन लेते हैं जो कि अग्नि का प्रतीक है। यह इसका भी प्रतीक है कि सन्यासी ने अपने पूर्वजीवन का अग्नि दाह कर दिया और केवल ज्ञान मार्ग या भक्ति मार्ग अपना लिया। 

श्री रविशंकर जी ने संन्यास लिया परंतु ना अपना नाम बदला, ना माता पिता, बहन को छोड़ा और ना ही उन्होंने रवि को छोड़ा। बल्कि माता पिता और बहन  ने सन्यासी रवि को अपना गुरु मान लिया और गुरु रविशंकर के गुरु बनने से जो घर में अत्यधिक सेवा करने का अवसर मिला उस को सहर्ष निभाया। गुरु जी ने गेरुआ  भी नहीं पहना। बल्कि सफेद कपड़ों को अपनाया। देखने में आया है कि सन्यासी जो भी करते हैं 100% करते हैं। सन्यासी या तो रूंड मुंड सब बाल कटवा देते हैं और या बिलकुल नहीं कटवाते। गुरुदेव रविशंकर जी सिर और दाढ़ी के बाल बिल्कुल नहीं काटते और खुले रखते हैं। शायद इसलिए कि किशोरावस्था में सन्यास लिया और भगत दाढ़ी वाले बाबा जी को स्याना समझते हैं। 

सन्यासी रविशंकर का  महर्षि महेश योगी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम और श्रद्धा रही। परंतु समय आ गया था कि वह अपने पैरों पर खड़े हो कर कुछ करें। कालांतर में 1981 में उन्हों ने आर्ट ऑफ लिविंग नामक संस्था की स्थापना की। उस को आज चार दशक पूरे होने को हैं। इस का जिक्र अगली किश्त में। 

सतीश कालड़ा

iamsatishkalra@gmail.com

08.05.2021

Sunday, January 31, 2021

जीवन और मृत्यु

 जीवन और  मृत्यु



मेरे बचपन के दोस्त संजीव तलवार का एक कार दुर्घटना में देहान्त हो गया। वह 65 वर्ष के थे। साथ में उनकी बेटी  का भी उसी दुर्घटना में  देहान्त हो गया। उनकी पत्नी और बेटा बाल बाल बच गए।  कई दिन से मन परेशान है। रह रह कर उन की याद  आती रहती है। मन है कि समझाए नहीं समझ रहा। मन को समझाने के लिए गीता पाठ किया। भगवान् ने कहा: "जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए शोक नहीं करते।"  जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है। जैसे जीवात्मा को देह की प्राप्ति होती है और फिर  बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था आती है उसी प्रकार देह त्याग हो जाता है और कर्मों के अनुसार फिर से  देह की प्राप्ति होती है। जीवात्मा तो नित्य है और देह अनित्य।  फिर शोक किस बात का ? बस  इस ज्ञान को समझ  कर  आत्मसात करने का  प्रयास कर रहा हूँ: जीवन क्या है और कर्मों के अनुसार जीवन और मृत्यु क्या है?  

हाँ, यह तो समझ में आ जाता है कि  है कि देह का त्याग तो निश्चित  है। जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है।  परन्तु देह त्याग के साथ साथ उस प्राणी के व्यक्तित्व के कई और पहलु लुप्तप्राय हो जाते है।  मैं आपने मित्र संजीव तलवार की उदाहरण लेता हूँ।  मैंने बचपन से उसे देखा है।  कैसे एक बाल्यावस्था से संजीव प्रज्ञावान इंसान बने और एक सूझवान नागरिक। यह सब प्रक्रिया में 65 वर्ष लग गए।  मात्र एक दुर्घटना के कारण  शरीर तो गया ही साथ ही साथ उसकी प्रज्ञा भी लुप्त हो गई। कोई कंप्यूटर होता तो उस का बैकअप ले लिया होता जो उस के बेटे के काम आ जाता। अब कहाँ गया वह  ज्ञान,वह सूझ, वह चंचलता, वह व्यकितत्व? इसी प्रकार कितने महापुरष आये।  उनका ज्ञान सब लुप्त हो गया उन की  देह त्याग के साथ साथ। इन विषयों को समझने का प्रयास कर रहा हूँ।  

जैसे मैंने पहले कहा कि मृत्यु की तो समझ आती है। जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है। परन्तु जन्म लेना ही बहुत बड़ी बात है।  एक पेड़ पर कितने बीज लगते हैं।  क्या सभी अंकुरित हो कर पेड़ बन पाते हैं? नहीं। पति पत्नी संसर्ग तो करते ही रहते हैं परन्तु हर संसर्ग से बच्चा उत्पन्न नहीं होता।  हर बार के संसर्ग से बच्चा उत्पन हो तो बच्चे ही बच्चे पैदा हो जाएँ।  जो बच्चा पैदा होता है वही एक चमत्कार है।  पैदा होना ही एक चमत्कार है जी। जन्म उपरान्त शिशु अवस्था और  बचपन से  जवानी और फिर  वृद्धावस्था तक का शरीर का सफर चुनौतिओं भरा है। किसी भी अवस्था में क्षीण हो जाने पर या दुर्घटना ग्रस्त हो जाने पर शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है। परन्तु आश्चर्य  तो यह है कि सब जानते हैं कि  मृत्यु होनी निश्चित है परन्तु मरना कोई नहीं चाहता। ज़िन्दगी भर संघर्ष रहता है जीने का। Darwin ने इस सिद्धांत को  परिभाषित करते हुए कहा था: There is Struggle for Existence and the Fittest Survives. मतलब जीवन में संघर्ष चलता रहता है और वही जीवित रहता है जो इस संघर्ष के लिए सक्षम है और संघर्ष में जीत जाता है। परन्तु हमेशा के लिए कोई ज़िंदा नहीं रहता। ना आज तक कोई अमर हुआ है ना होगा।  

वैदिक और सनातन संस्कृति में जीवन मरण को कर्मों का खेल कहा गया है।   विज्ञान में कहीं भी जीवात्मा और कर्मों  का  ज़िक्र नहीं  है और बता दिए जाने  पर  भी मान्यता नहीं है। विज्ञान के अनुसार जीव हाड मॉस का पुतला है जो स्वचालित है। शरीर एक प्रणाली  है जिस में विभिन्न क्रियाएं  कार्यरत हैं जैसे कि:  सांस लेना, खाना, पीना, सोना, सम्भोग करना इत्यादि और  दिल, दिमाग, जिगर, गुर्दा इत्यादि की क्रियाएँ। यह सब जब तक शरीर का हिस्सा बन कर सुचारू रूप से कार्यरत हैं और आसपास के वातावरण के साथ सही ताल मेल  में रहते हैं तब तक जीवन  है। जब तक यह तालमेल है  तब तक यह जीवन चलता है। अन्यथा जीव  मौत को प्राप्त होता है। कुछ  अंग या क्रिया ऐसी हैं  कि जब फेल  हो जायें तो तुरंत मृत्यु प्राप्त हो जाती है।  जैसे कि  सांस ना आये तो मृत्यु तुरंत है।  दिल धड़कना बंद कर दे तो मृत्यु तुरंत है।  परन्तु दिमाग फेल हो जाने से प्राणी  काफी देर तक  ज़िंदा रह  सकता  है।  गुर्दा  और जिगर  तो स्थानांतरित भी हो  जाते हैं।  वातावरण भी जब तक अनुकूल है तब तक जीवन संभव है।  सर्दी, गर्मी, तापमान, दबाव (Pressure)  जल, वायु और पृथ्वी, सूर्य, चाँद इत्यादि ग्रहों की अनुकूलता और आस पास के स्थावर, जंगम प्राणियों (पेड़, पौधे, वनस्पति, छोटे बड़े घरेलू/ जंगली जानवर, बैक्टीरिया इत्यादि) की अनुकूलता पर भी जीवन निर्भर करता है। 

विज्ञान पूर्वजन्म और पुनर्जन्म  को नहीं मानता।  परन्तु विज्ञान ने कई मुद्दों का उत्तर अभी तक नहीं दिया: हाड मॉस के पुतले में जान कहाँ से और कैसे आती है ?  वह आपने जैसा प्राणी कैसे पैदा कर देता है?  विज्ञान की तरह ही कई  धर्म, पंथ और विचारधारा ऐसी हैं जो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को  और आत्मा और परमात्मा को  भी नहीं मानती। 

वैदिक और  सनातन परम्परा में यह धारणा है कि जीवन मरण कर्मों का खेल है। कर्म सिद्धांत के अनुसार हर प्राणी जो कर्म करता है उस को उन का फल भुगतना पड़ता है।  कुछ फल तुरंत प्रभाव  देते हैं और कुछ के  प्रभाव संचित हो जाते  हैं ।  जैसे  जीवन में जो रुपया पैसा हम कमाते हैं उस में से कुछ का सेवन हम  तभी कर लेते हैं और कुछ को बचा कर बैंक में जमा कर लेते हैं। फिर  बैंक खाते संचित धन निकाल कर हम समय समय पर खर्च कर सकते हैं।  इसी प्रकार  संचित कर्मों में से कुछ कर्म जो आपना फल देना शुरू कर देते हैं उनको प्रारब्ध कहते हैं। यह उसी तरह है  जैसे बैंक में संचित  धन में से कुछ धन निकाल कर  उस का प्रयोग करना। 

जीव अपनी प्रारब्ध को  लेकर जन्म पाता  है। और जिस प्रारब्ध के अनुसार उस का जन्म हुआ उस को इस जन्म में भोगना अनिवार्य है।  और जैसे ही उसकी प्रारब्ध  का कोटा पूरा हो जाता है वह शरीर त्याग देता है।  यह इसी प्रकार है  कि जैसे हम गाडी में पेट्रोल डाल कर यात्रा शुरू करते हैं।  जैसे ही पेट्रोल ख़त्म हुआ गाडी रुक जाती है। प्रारब्ध का कोटा पूरा होने का अर्थ यह नहीं  कि संचित कर्म भी समाप्त हो गए।  बल्कि संचित कर्मों के आधार पर  फिर प्रारब्ध मिलती है और फिर जीवन मिलता  है।  यानि  बैंक से पैसे निकलवा कर फिर से नई  गाडी ली, उस में पेट्रोल डाला और नई  यात्रा शुरू कर दी।   कर्म सिद्धांत  अनुसार  आज जो जीवन  है यह  पहले से संचित  किये गए कर्मों में से क्रियान्वित प्रारब्ध के अनुसार हैं और अभी जो क्रियामाण कर्म हम कर रहे हैं वह या तो अभी तुरंत असर दे देंगे  या संचित हो जाएँ गे।  उन के आधार पर हमारी भविष्य की प्रारब्ध बनेगी।  यह कर्मों की यात्रा है।

यह कर्मों की गति बहुत न्यारी और गहन  है।  इस को समझने के लिए मैंने कुछ प्रवचन सुने जो YouTube पर उपलब्ध हैं। उधारणार्थ:  "स्वामी निश्चलानंद जी, शंकराचार्य जगनाथ पूरी  (https://youtu.be/Lh79SDtlIk कर्म और प्रारब्ध)";  "श्री श्री रवि शंकर, Art of Living  (https://youtu.be/iRds-yNMRCg Secrets of Karma);"  "स्वामी निश्चलानंद जी, शंकराचार्य जगनाथ पूरी  ( https://www.youtube.com/watch?v=7cQtb_JqubI&t=1031s )  जीवात्मा शरीर को कब  छोड़ता है )।

इन प्रवचनों को सुन कर जो समझ आया  कि प्रारब्ध के मूल में संचित कर्म हैं। पूर्वजीवन  में या पूर्वजन्मों में जीव के द्वारा किये गए शुभ अशुभ कर्म जो अभी तक भोगे नहीं जा चुके हैं वह जमा हैं उन का नाम है संचित कर्म . अन्तर्यामी परमात्मा के संकल्प से संचित कर्म में से जितना अंश फल देने के लिए उन्मुख हो जाते हैं उस का नाम है प्रारब्ध।  यानि  जिन कर्मों का फल प्रारम्भ हो चुका है उसी का नाम है प्रारब्ध।  प्रारब्ध तीन रूप में फलीभूत  होता है: जाति, आयु और भोग।  जाति का अर्थ है: जन्म।  प्रारब्धानुसार जीव जन्म से ही पशु, पक्षी, मनुष्य, स्त्री, पुरष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, काला या गोरा, पंजाबी, गुजराती या विदेशी हो जाता है।  यह उस की प्रारब्ध है।  दूसरा फल है आयु।  जीवन में कितने श्वास लेने हैं यह भी जन्म के साथ प्रारब्ध अनुसार निर्धारित हैं।  तीसरा है भोग।  इस का अर्थ है  सुख, दुःख देने वाली सामग्री, व्यक्ति और वस्तु की उपलब्धि और उन के सेवन या संपर्क से सुख दुःख का मिलना। तो जीवन में जाति, आयु और भोग प्रारब्ध अनुसार उपलब्ध होते हैं। प्रारब्ध को भाग्य या किस्मत भी कहते हैं। तो जीवन में जाति, आयु और भोग प्रारब्ध/ भाग्य / किस्मत  अनुसार उपलब्ध होते हैं।  कोई जन्म से ही अमीर के घर पैदा होता है और तीव्र बुद्धि पाता  है। कोई गरीब के घर पैदा होता है। Some are born with a silver spoon in mouth while some are born paupers or handicapped. 

तो क्या जीवन प्रारब्ध के हाथों कठपुतली है।  शास्त्र कहते हैं कि ऐसा नहीं।  जीव पुरषार्थ करने का अधिकारी भी है। प्रारब्ध को नया बल नहीं होता पुरषार्थ को होता है।  इस लिए पुरषार्थ की प्रधानता सिद्ध होती है परन्तु लोग अपनी किस्मत को ही कोसते रहते हैं।  कभी प्रारब्ध प्रबल होता है कभी पुरषार्थ और कभी बराबर। प्रारब्ध के भी भेद होते है: अनुकूल एवं प्रतिकूल। अनुकूल प्रारब्ध के साथ यदि अनुकूल पुरषार्थ किया जाए तो सोने पे सुहागा हो जाता है। और अगर प्रारब्ध अनुसार प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होती है तो उस में सोचना चाहिए कि इस में कौन सी चीज़ की जाए जिस से  प्रतिकूल परिस्थिति अनुकूल हो जाए।  प्रारब्ध को नया बल नहीं प्राप्त।  प्रारब्ध फल दे कर नष्ट हो जाता है।  पुरषार्थ के द्वारा प्रारब्ध को दबाया जा सकता है।  प्रबल पुरषार्थ के द्वारा यह संभव है। इस लिए कोई गरीब  के घर पैदा होकर भी पुरषार्थ द्वारा सब कुछ हासिल कर लेते हैं और कई अमीर माँ बाप से मिली जायदात  से भी कुछ हासिल नहीं कर पाते।  

वैदिक और सनातन परम्परा के अनुसार प्राणी प्रारब्धानुसार जन्म  लेता है और आपने कर्म भोगता है।  प्रारब्ध अनुसार जैसे ही उस के श्वास प्रश्वास का कोटा पूरा हो जाता है वह शरीर त्याग देता है।  परन्तु इस जीवन में किये गए कर्मों का फल भी उसे प्राप्त होगा।  जीवात्मा जब तक शरीर में है सब मंगल है।  जैसे ही जीवात्मा से शरीर अलग होता है शरीर  शव बन जाता है।  शव से बदबू आती है और परिवार शव को तुरंत अंतिम संस्कार की तरफ ले जाता है वह चाहे दाह संस्कार हो या दफनाना।  

परन्तु आश्चर्य  तो यह है कि सब जानते हैं कि  मृत्यु होनी निश्चित है परन्तु मरना कोई नहीं चाहता। उधर महापुरुष कहते हैं की जीवन मरण से छुटकारा कब प्राप्त होगा।  इन सब का ज़िक्र अगले अंक में।       

​सतीश कालड़ा 
बैंगलोर 

Wednesday, January 13, 2021

स्वामी विवेकानंदस्वामी जी के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है?

 स्वामी विवेकानंद के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है?

आज स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है।  स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 कलकत्ता में हुआ। आज उन के जीवन और उन के द्वारा दी गई  शिक्षा/ ज्ञान  का  स्मरण करना  उचित रहेगा। स्मरण तो उसे किया जाता है जो भूल जाए।  स्वामी जी ने जो ज्ञान दिया वह एक बार आत्मसात हो जाए तो भूलता  ही नहीं।  सनातन ज्ञान है।  

स्वामी विवेकानंद जी को जन साधारण इस लिए याद करते हैं कि उन्होंने 11 सितम्बर 1893 वाले दिन  अमरीका के शहर शिकागो में आयोजित World Parliament of Religion में एक ऐतहासिक भाषण दिया जिस में उन्हों ने अमरीका के लोगों को बहन और भाई कह कर संबोदन किया और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनंदन किया गया।  परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि  स्वामी जी ने उस दिन   हिन्दू धर्म का सही परिचय दिया। सिस्टर निवेदिता के शब्दों में, "जब स्वामी जी ने बोलना शुरू किया तो यह हिन्दुओं के धार्मिक विचारों के बारे में व्याख्यान था परन्तु जब उन्हों ने सब कह दिया तो हिन्दु धर्म  क्या है इस का जगत को ज्ञान हुआ।"  इस से पहले शायद हिन्दू धर्म  को किसी ने इतनी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी थी। यह भी कहा जाता है की हिन्दू धर्म  में कई मत मतान्तर  थे और रहे हैं।  आजकल भी  देश में हिन्दू धर्म की परिभाषा को लेकर फिर से मत मतान्तर चल रहे है।  ऐसे में स्वामी जी के सन्देश को  जान कर सही मार्ग निर्देश मिल सकता है। 

स्वामी जी के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है ?  

स्वामी विवेकानंद  ने जो कहा उस का सार यह है:  हिन्दूओँ   ने अपना धर्म  वेदों से प्राप्त किया है।  वेद अनंत ज्ञान की खान हैं।  वेद हमें सिखाते हैं कि सृष्टि का ना आदि  है न अंत है।  वेद हमें बताते हैं कि सृष्टि का आधार परमात्मा है और वही परमात्मा सब प्राणियों में आत्मा रूप में विध्यमान है।  एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और आत्मा का परमात्मा के साथ सम्बंद: क्या है। इन नियमों या सत्य का आविष्कार / प्रतिपादन वेदों में किया गया है और यह आविष्कार करने वाले ऋषि कहलाते हैं। वेदो की रचना ऋषिओं ने की। वेद का ना आदि है ना अंत है। वर्तमान में भी ऋषि और आविष्कार कर रहे हैं और करते  रहें गे।  इस तरह से वेद विज्ञान की  तरह सत्य की खोज है।  हिन्दू धर्म में कट्टरता और हठधर्म का स्थान नहीं है। 

वेद घोषणा करते हैं कि प्रकृति एवं प्राकृतिक नियमों के मूल में परमपिता परमेश्वर मौजूद हैं।  उसी  के आदेश से वायु चलती है, अग्नि दहकती है, बादल बरसते हैं, जनम मृत्यु का  खेल पृथ्वी पर होता है।  

 उस परमेश्वर का रूप क्या है? वह सर्व-व्यापी है, शुद्ध है , निराकार है , सर्वशक्तिमान है।  सब पर उस की पूरी दया है। वैदिक ऋषिओं ने यही गाया। "तू ही हमारा पिता है, तू ही हमारी माता है, तू ही हमारा सखा है, तू ही सभी शक्तिओं का मूल है।  हमें शांति प्रदान  कर।  तू ही इन अखिल पिंडों का भार वहन  करने वाला है।  तू मुझे  जीवन के क्षूद्र भार को वहन करने की शक्ति दे और इस से मुक्ति दे ।"   

और हम उस की पूजा कैसे करें ? प्रेम द्वारा उस की  पुजा की जा सकती है।  समस्त वस्तुओं से भी अधिक  उस की पूजा और प्रेम करना  चाहिए। वेद हमें शुद्ध प्रेम के सम्बन्ध में इस प्रकार की शिक्षा देते हैं:- इस संसार में इस तरह रहना चाहिए जैसे जल में कमल का  पत्ता।  हृदय ईश्वर की तरफ लगा  रहे और हाथ  कर्म  करने की तरफ। ईश्वर से  प्रेम के लिए ही प्रेम करना सब से उचित है।  उस से यही प्रार्थना करनी चाहिए: "हे भगवान्, मुझे ना तो सम्पति चाहिए, ना संतति, ना विद्या।  यदि   तेरी इच्छा है तो सहस्त्र बार जनम मृत्यु के चक्र में पडूंगा। परन्तु हे  प्रभु इतनी  कृपा करना कि मैं फल की आशा छोड़ तेरी भक्ति करू । केवल प्रेम के लिए ही मेरा तुझ से निस्वार्थ प्रेम हो।"

वेद अनुसार प्राणी आत्मा स्वरुप है।  आत्मा क्या है ? यहाँ मैं खड़ा हूँ और जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं क्या हूँ ? क्या मैं पदार्थों का समूह के सिवाय कुछ नहीं हूँ ?  वेद घोषणा करते हैं: मैं शरीर में रहने वाली आत्मा हूँ - शरीर नहीं।  शरीर मर जाएगा पर मैं नहीं मरूं  गा। मैं इस शरीर में विध्यमान हूँ और जब शरीर का पतन हो जाए गा  तब भी विध्यमान रहूँगी।  वेद कहते हैं आत्मा ब्रह्मस्वरूप है।  वह केवल पंचभूतों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) के बंधन में बंध गयी है।  और उस बंधन के छूटने से ही आपने पूर्णत्व  को प्राप्त होगी।  इस अवस्था का नाम है मुक्ति - यानि   अपूर्णता, जनम मृत्यु, आदि व्याधि से छुटकारा।

अब प्रश्न यह उठता है कि यह विशुद्ध, पूर्ण और विमुक्त आत्मा इस प्रकार जड़ का दासत्व क्यों करती है।  स्वयं पूर्ण होते हुए भी इस को अपूर्णतव की यह भ्रमात्मक धारणा कैसे प्राप्त होती है।  और प्राय  प्राणी आपने आप को शरीर समझता है।  वेद कहता है कि आत्मा अनादि और अमर है।  पूर्ण और अनंत है।  और मृत्यु का अर्थ है एक शरीर से दुसरे शरीर में स्थानांतरण/ केंद्रपरिवर्तन। वर्तमान अवस्था हमारे पूर्वनिष्ट कर्मों द्वारा निश्चित होती है और भविष्य वर्तमान कर्मों द्वारा।  आत्मा जनम और मृत्यु के चक्र में लगातार घूमती  हुई कभी ऊपर उठती है कभी नीचे जाती है।  तो यहां दूसरा प्रश्न उठता है।  कि क्या प्राणी अच्छे बुरे कर्मों के   परवश हुआ इधर उधर भटकता रहता है?  इस प्रकार से   अंतर्मन  कांप उठता है।  एक पौराणिक ऋषि ने आविष्कार कर यह घोषणा की: "हे अमृत के पुत्र मैंने अनादि परम पुरुष को पहचान लिया है जो समस्त अज्ञान और माया से परे है। केवल उस  कृपा से ही तुम जनम मृत्यु के चक्कर से छूट सकते हो। दूसरा कोई पथ नहीं।" 

क्या आत्मा का बंधन केवल ईश्वर की दया से ही टूट सकता है और उस की दया शुद्ध पवित्र स्वभाव वाले को प्राप्त होती है?  अतः पवित्रता ही उस के अनुग्रह की प्राप्ति का उपाय है।  हिन्दू शब्दों और सिद्धांतों के जाल में नहीं पड़ता।  यदि इस जीवन के परे कोई अवस्था है जो शाश्वत है (आत्मा या परमात्मा) तो वह उस का अनुभव/ साक्षात्कार करना चाहता है।  हिन्दू ऋषि परम पिता  परमात्मा के विषय में यही प्रमाण देता है कि मैंने आत्मा का / परमात्मा का दर्शन एवं साक्षात्कार किया है।  हिन्दू धर्म  का मूल मंत्र है, " मैं आत्मा हूँ।"- यह विश्वास और तद्रूप आत्मा में ही वास करना।  अतः हिन्दुओं की सभी साधना प्रणाली का लक्ष्य है: पूर्ण बन जाना, देवता बन जाना, ईश्वर के निकट जा कर उन के दर्शन कर लेना, और इस प्रकार ईश्वर सानिध्य को पाकर  दर्शन कर लेना, उस सर्व लोक पिता के समान पूर्ण हो जाना- यही असल में हिन्दू धर्म  है। 

स्वामी जी ने राज योग की व्याख्या करते हुए सन्देश दिया कि हर प्राणी में दिव्यता मौजूद है। लक्ष्य इस दिव्यता को प्राप्त करना है। उस का साक्षात्कार करने के चार साधन हैं : कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग और चौथा है पतंजलि ऋषि द्वारा सुझाया योग अनुशासन जिस को राजयोग के नाम से जाना जाता है। इन में से किसी भी  साधन से या उक्त साधनो के  योग से ईश्वर साक्षात्कार किया जा सकता है .  

 अन्य सभी साधन/ सिद्धांत, नीति, रस्मो रिवाज़, पुस्तक पाठ, मंदिर/ मूर्ती पूजा, तीर्थयात्रा  इत्यादि सब उस सीढी  तक पहुँचाने के चरण हैं। स्वामी जी ने किसी भी साधन या सिद्धांत की निंदा नहीं की।  उन  का मानना है कि  मानव नीचे से शिखर की तरफ जो यात्रा करता है वह सब सच की  यात्रा है। मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार कर के खुद ईश्वर बनाना है। वेद कहता है  मूर्तियाँ, मंदिर, या शास्त्र ग्रन्थ तो धर्मजीवन की बाल्यावस्था में केवल सहायक मात्र हैं।  साधक को कहीं रुकना नहीं चाहिए। मूर्ती पूजा सब एक  अवस्था है।  आगे बढ़ने की अवस्था में मानसिक साधना दूसरी अवस्था है। और सब से ऊपर वह अवस्था है जब ईश्वर का साक्षात्कार हो जाये। यदि कोई मनुष्य ब्रह्मभाव को मूर्ती के सहारे अधिक सरलता से हासिल कर सकता है, तो क्या उसे गलत कहना उचित  होगा? हिन्दू की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं बड़  रहा बल्कि सत्य से सत्य की ओर: यानी निम्न श्रेणीके सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की और अग्रसर है।

स्वामी जी ने एक और पहलु पर प्रकाश डाला।  अलग अलग स्त्री पुरष अपनी अपनी रुचि  के अनुसार आपने आपने इष्ट देवता का पूजन करते हैं। स्वामी  जी ने कहा ऐसी  विविधता में भी कोई दोष नहीं। विभिन्नता में एकता - यही तो प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भली भाँती पहचाना।  जितने भगत उतने ही रास्ते सब एक ही बिंदु पर एकत्रित होते हैं।  तातपर्य यह है कि मनुष्य को अपनी मानसिक प्रकृति के अनुसार अग्रसर होना है। उसी तरह आपने आपने स्वाभाव अनुसार मनुष्य इष्ट देवता, मंदिर, तीरथ, पूजा पद्दति  या विभिन्न रीती रिवाज के साथ जोड़ लेता है।  परन्तु उसे तो निरंतर प्रगति करते हुए उस मंज़िल तक पहुँचाना है जहाँ पर जा कर ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार हो जाए।  

स्वामी जी  ने यह  संवेदना भी प्रकट की  कि, "सांप्रदायिकता, कट्टरता और इससे पैदा हुए हठधर्म ने  लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़ा हुआ  हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी  ही बार  यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता।" और इस के साथ ही साथ स्वामी जी ने यह उद्घघोष किया कि, " मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।"   उन्हों ने कहा कि   आवश्यकता है एक ऐसे  सार्वभौमिक धर्म  की  जो  देश और काल से मर्यादित ना हो और जिस में हठधरम और कट्टरवाद न हो। अन्यत्र स्वामी जी ने  कहा कि अन्य धर्मों ने ज़ोर ज़बरदस्ती से विभिन्न लोगों  को आपने मत में धर्मांतरण पर मज़बूर किया है  परन्तु हिन्दू धरम ने कभी किसी को ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने की  कोशिश नहीं की। परन्तु संभावना है कि इस की विशालता को देख इस को लोग अपनाना पसंद करें।  स्वामी जी ने हिन्दू धर्म अनुयायों की संकीर्ण भावना की भतर्स्ना  भी की।  

यही  है शिक्षा और ज्ञान स्वामी विवेकानंद  का।  इस को संक्षेप में प्रस्तुत किया है।  सारांश करते हुए कहीं त्रुटि हो गई हो तो क्षमा प्रार्थना है।  पाठकों से निवेदन है की विस्तार जानने के लिए स्वामी जी का साहित्य पड़ें। अद्वैत आश्रम ((https://shop.advaitaashrama.org)  द्वारा प्रकाशित Complete Works of  Swami Vivekanand अंग्रेजी और हिंदी भाषा में सुलभ हैं। विभिन्न विषयों पर लघु पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।  जैसे कर्मयोग,  ज्ञानयोग, भक्तियोग, राजयोग, Lectures From Colombo to  Almora इत्यादि।  स्वामी जी को सही समझना हो तो उन के जीवन के बारे में जानना  सही रहे गा।  

स्वामी जी का जीवन


स्वामी विवेकानंद  को बचपन से ही में बहुत जिज्ञासा थी ईश्वर को जानने की।  बचपन से ही यह संस्कार थे।  प्रगाढ़ बुद्धि के मालिक थे।  ईश्वर को जानने के लिए सब प्रयास और प्रयोग करने को आतुर थे और करते भी रहते थे।  ब्रह्म समाज का भी आसरा लिया। कई सन्त महात्माओ से वार्तालाप किया;  ज्ञान पढ़ा, विज्ञान पढ़ा, दर्शन शास्त्र भी पढ़ा और योग साधना भी की।  परन्तु मार्ग सही तब मिला जब गए ठाकुर रामकृष्ण परमहंस की शरण में।  ठाकुर का अक्षर ज्ञान तो मालूम नहीं लेकिन उनकी साधना बहुत सही थी एवं निष्ठा दृढ़ थी।  उन्होंने नरेंदर (स्वामी विवेकानंद जी का बचपन का नाम) को आश्वस्त किया कि  ना केवल वह  खुद भगवान् के बारे में जानते  हें  बल्कि नरेंदर को भी दर्शन करा सकते हैं । जिज्ञासु  नरेंदर   ने उनको अपना गुरु धारण करने के बावजूद कई बार उन्हें परखा परन्तु ठाकुर की साधना और ज्ञान के आगे वह नतमस्तक हो गए और सही ज्ञान अर्जित किया ।  ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने आपने जीवन काल में हिन्दू धर्म  की विशालता को पहचाना; सब मत मतान्तरों के अनुसार जीवन व्यतीत किया और जिज्ञासू  नरेंदर  को सही राह दिखाई जिस का प्रतिभिम्ब स्वामी  जी के  शिकागो भाषण और जीवन पर्यन्त प्रत्यक्ष हुआ।

16.08.1886 को ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी ने देह त्याग दी।  उस के पश्चात स्वामी जी भारत भ्रमण  पर निकले।  उन्हों ने बड़ी संजीदगी से जाना कि  भारत में कितना अंधविश्वास है और गरीबी है परन्तु धर्म के प्रति आस्था भी है। स्वामी जी ने महसूस किया की भारत में जनसाधारण का जीवन बहुत दयनीय स्थिति  में था। स्वामी जी  कुछ करना चाहते थे।  उन्हों ने  महसूस किया कि भारत में  जनता को धर्म का सही रूप समझाना है और उनको कृषि और इंडस्ट्री को भी सुधार लाना है।     

सितम्बर 1893 में अमरीका के शहर शिकागो में आयोजित World Parliament of Religion का आयोजन हो रहा था।  स्वामी जी ने उस में जाकर हिन्दू धर्म और भारत का  पक्ष रखना उचित समझा।  स्वामी जी का सन्देश बहुत पसंद किया गया।  तत्पश्चात स्वामी जी ने साढ़े तीन वर्ष अमेरिका और यूरोप में बिताये जहाँ उन्हों ने वेदांत के ऊपर बहुत प्रवचन दिए।  पश्चिम के इस दौर में  बहुत महत्वपूर्ण विदेशी उन के शिष्य एवं मित्र बन गए।  इन में एक थे श्री गोडविन जिस ने स्वामी जी द्वारा दिए गए हरेक भाषण को लिखित रूप दिया और यही  कारण है कि आज हमें स्वामी जी  शिक्षा एवं विचार उपलब्ध हैं।  गोडविन स्वामी जी के साथ भारत में भी रहे। 

जनवरी 1897 में स्वामी जी भारत वापिस आये।  कोलोंबो से अल्मोड़ा तक की अपनी यात्रा में उन्हों ने भारत की सोइ हुई आत्मा को जागृत करने के लिए अनमोल भाषण दिए जिन का संकलन उपलब्ध है उन की पुस्तक: Lectures From Colombo to  Almora. इस प्रकार स्वामी जी का साहित्य के तीन पक्ष हैं: उनके World Parliament of Religion में दिए गए भाषण, यूरोप और अमेरिका में दिए गए भाषण और Lectures From Colombo to  Almora. 

स्वामी जी ने रामकृष्णा मठ  और रामकृष्णा मिशन की स्थापना की। कोलकत्ता में  बेलूर मठ  की और देश विदेश में रामकृष्णा मठ  और रामकृष्णा मिशन के केंद्र स्थापित किये जिन में से प्रमुख हैं: बेलूर मठ कोलकत्ता, राम कृष्ण मिशन, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर, मसूर इत्यादि।  स्वामी जी का साहित्य  अद्वैत आश्रम (https://shop.advaitaashrama.org) से  उपलब्ध है. पाठक समय निकाल कर इन केंद्रों में जा कर लाभान्वित हो सकते हैं।  

Wednesday, August 12, 2020

कोरोना का कहर

 कोरोना का कहर 

सतीश कालड़ा 
बैंगलोर : 29.07.2020 

गत 6-7 महीने से COVID -19 अथवा CORONA  नामक महामारी ने विश्व भर में एक अदभुद डर का माहौल पैदा कर दिया है। दिसंबर 2019 में चीन के  वूहान प्रदेश में इस से काफी लोग प्रभावित हुए।  उस के पश्चात 10 जनवरी 2020 से विश्व के बाकी देश  प्रभावित होने लगे। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड  जैसे देश इस की चपेट में आये। फिर अमरीका और ब्राज़ील भी बुरी तरह से फसे। 30 जनवरी से WHO ने इसे महामारी घोषित कर दिया।    आजकल भारत में भी इस की  दहशत है।  भारत में आज तक  (जुलाई 2020 तक) 15  लाख लोग संक्रमित पाए गए और लगभग 50000 लोग मर गए है।  24 मार्च 2020 को  देश के प्रधान मंत्री श्री नरिंदर मोदी ने सारे देश में 24 दिन का Lockdown कर दिया जिस से सब गतिविधियाँ ठप हो गयीं । बाजार बंद, यातायात बंद, रेल, बस, टैक्सी, हवाई यात्रा सब बंद. जो जहाँ था  वहीँ फँस गया।  कोई दुकान नहीं खुली, Shopping Malls बंद;  स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सब शिक्षण  संस्थान बंद।   कई बच्चे आपने घर नहीं जा  पाए।  यह सब उस वक़्त हुआ जब देश में प्रभावित लोग मात्र 500 थे। 14 अप्रैल को Lockdown 31 मई तक बड़ा दिया गया।  देश की अर्थ व्यवस्था पर काफी असर हुआ है।देश के महानगरों से असंख्य मज़दूर बेरोज़गारी से परेशान  दूर दराज़ आपने आपने गाँव की तरफ निकल पड़े। पहले तो उन्हें पुलिस ने मार पीट की क्योंकि वह Lockdown का उलंगन कर रहे थे।  परन्तु वो तो इतना बड़ा जनसैलाभ था की थामे नहीं थमा।   आखिर सरकार को कुछ सुविधा देनी पड़ी। 

धीरे धीरे परन्तु निरंतर ढंग से महामारी की चपेट में  लोग आते  रहे।  मार्च 2020 में 500-600 लोग संक्रमित थे और वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 15  लाख तक पहुँच गयी है।  अभी तक इस का कोई पक्का इलाज सामने नहीं आया।  सरकार अब समझ चुकी है कि  Lockdown को और बढ़ाया नहीं जा सकता। लोग Lockdown से मरें  ना मरें;  बेरोज़गारी से चरमरा जाएँगे ।   इस लिए कुछ सावधानियां बरतने को कहा गया है।  यानि  जितना हो सके घर में रहें। घर से बहार निकलें तो Mask पहन कर निकले। अन्य लोगों से कम  से कम एक मीटर की दूरी बना कर रखें। इत्यादि इत्यादि।  गत 4-5  महीने से रोज़, सुबह शाम मुख्य समाचार यही है कि  कोरोना से कितने लोग प्रभावित हैं, कितने ठीक हो गए, कितने मर गये । 

जब तक कोई व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित नहीं होता तब तक यह सब तो संख्या ही मालूम पड़ती है। परन्तु इस की गंभीरता  का तब पता चलता है जब कोई खुद प्रभावित होता है अथवा सगे सम्बन्धिओं  में / पड़ोस में / मित्र मंडली में कोई प्रभावित होता है।  वैसे तो काफी लोग ठीक हो रहे हैं।  मरने वालों की संख्या मात्र 3% है। ज़्यादातर मरते वह हैं जो 60 वर्ष की आयु से ऊपर हैं या 10 वर्ष की आयु से काम हैं या पहले से किसी रोग से प्रभावित हैं। जैसे कि  शुगर , Blood Pressure / दिल का रोग इत्यादि। परन्तु जो मरते हैं बुरी तरह से मरते हैं।  उन्हें  सांस लेना मुश्किल हो जाता है।  फिर जो मरता है उस की लाश को कोई हाथ लगाने को तैयार  नहीं होता।  घर वाले ही पीछे हट जाते हैं।  डर यह लगता है कि संपर्क से Infection न पकड़ ले।  इस लिए अस्पताल में भी पूरी तरह से सावधानी बरती जा रही है।  डॉक्टर और नर्सें मुँह सिर  ढक कर मरीज़ के पास जाते हैं। जो मरीज़ के संपर्क में आ जाए तो उस को भी अलग जगह रहने को कहा जाता है।  

हाल ही में  हमारे पड़ोस में एक बज़ुर्ग की Corona के कारण मृत्यु हो गयी। जाहिर है उन के परिवार के सब सदस्यों को Self-Isolation में रहने को कहा गया। जिस दफ्तर में उन का बेटा काम करता था उन को भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  जहाँ  पर वह बैडमिंटन खेलता था उनको भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  मामला चलते चलते हमारे परिवार तक आ पहुंचा क्योंकि मेरा बेटा  उस के साथ बैडमिंटन खेलता है जिस के दफ्तर में उस का बेटा  काम करता है जिस के पिता की कोविड के कारण मृत्यु हुई।  मैं कहीं दूर तक मृतक के परिवार के संपर्क के घेरे में संभावित नहीं था। परन्तु हमारे पूरे परिवार को सेल्फ आइसोलेशन में रहने का सन्देश मिला। मुझे रात के 11 बजे सन्देश दिया गया सेल्फ-आइसोलेशन के लिए।  सेल्फ आइसोलेशन का सन्देश क्या आया मुझे थोड़ा सा बुखार भी हो गया। और शक हुआ कि आखिर  मुझे भी कहीं COVID तो नहीं !!

मैंने सोचा अब तो बारी आ गयी क्यों कि  मैं तो हूँ भी 67 वर्ष का और पत्नी भी। रात का समय। नींद आ नहीं रही। अभी अस्पताल जा नहीं सकते।  क्या  यह सचमुच COVID  ही है।  ऐसे लगा कि जैसे मौत के साथ सामना हो रहा है। । मौत का एहसास। मन में तरह तरह के विचार आने लगे। जो जो विचार मन में आये वह सांझे कर रहाँ  हूँ।  

  1.  याद आया कि  गीता में लिखा है कि "जो पुरुष अन्तकाल में भगवान् को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह मेरे साक्षात रूप  को प्राप्त होता है - इस में कोई संशय नहीं।" (भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 4) मतलब कि मुक्ति ही प्राप्त हो जाती है। तो भगवान् का नाम याद करना शुरू कर दिया जाए।
  2. फिर संशय आया क्या पता मैं ठीक से भगवान् का स्मरण कर रहा  हूँ या नहीं।  मन्त्रजाप करना है, या गीता का पाठ करना है  या Meditation  अथवा ध्यान में बैठना है या सत्संग कीर्तन करना है या ज्योत जलानी है  या हवन  यज्ञ करना है या केवल भगवान्  को केवल याद ही करना है।  अगर ऐसा है तो कौन से भगवान् को याद करना है।  अगर मरते समय पास में डॉक्टर सिख हो और नर्स ईसाई हो तो मैंने किस भगवान् को याद करना है।    इत्यादि इत्यादि।  या आपने ही हिन्दू देवी  देवता को ही याद करने से मुक्ति प्राप्त होगी।  
  3.  मुक्ति अगर इतने सस्ते में  उपलब्ध है तो फिर सारी  उम्र भर पाप पुण्य का क्या डर?  कर्मों का खेल है क्या?  इस लिए लगता नहीं मात्र इस से मुक्ति प्राप्त हो जाए हालांकि इस को भी कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं।  वैसे मरने के वक़्त परमात्मा उसी को याद आता है जिस ने सारी  उम्र इस याद को  बना रखा होगा।  याद आया कि  दो वर्ष पहले जब 90 वर्षीय पिताश्री मृत्यु के नज़दीक पहुंचे ICU में थे तो उन के हाथ में मैंने उनकी माला थमा दी थी।  रात को माला थमा कर आया था।  सुबह ही उनहों ने शरीर त्याग दिया था।  मुझे ऐसा लगा था की उनहोंने  गीता के अनुसार नाम स्मरण करते हुए प्राण त्यागे।  उन्हें ज़रूर मुक्ति प्राप्त हुई होगी।  परन्तु फिर भी पंडित जी ने बहुत से क्रियाकर्म करने को कहा था।  एक साल भर तक करते रहे थे। अभी भी हर साल पितृपक्ष में श्राद करने को कहा जाता है।  
  4. कुछ भी हो।  शास्त्रों में लिखा है।  गुरु जी ने भी करने को कहा है।  कर लेना चाहिए।  मन्त्र, तन्त्र का ज्ञान नहीं है, पूजा पाठ की विधि ठीक गलत हो सकती है भगवान् का स्मरण कर उनसे किये कर्मो की क्षमा मांग कर समर्पण तो किया जा सकता है।  जब पैदा हुए थे तो माँ को समर्पित थे।  मरते समय भगवान् को समर्पित हो जाते हैं। 
  5. ऐसी धारणा  चल रही थी कि  भगवद गीता के कुछ और श्लोकों का  स्मरण हो आया।  (अध्याय 18 श्लोक 65-66): "हे अर्जुन ! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भगत बन, मेरा पूजन करने वाला  हो और मुझ को प्रणाम कर। ऐसा करने से तू  मुझे प्राप्त हो गा। यह मैं  जूझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ। सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल मुझ सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की शरण में आ जा।  मैं तुझे  सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँ गा।" दिल में विश्वास आ गया कि सच्चे दिल से भगवान में समर्पण से मुक्ति प्राप्त हो गी ही।  
  6. वैसे भी  मृत शरीर को जलाने के बाद पंचभूत शरीर यहीं का यहीं पर रह जाना है जी।  मिट्टी मिट्टी में, जल वाष्पीकरण हो कर चला जाएगा और इन्हीं बादलों के साथ अठखेलियन करेगा। शरीर की ऊर्जा अग्नि के साथ और प्राण  पखेरू बन कर वायु मंडल में घुल जाएँ गे और मुट्ठी भर शरीर ने जो आकाश घेर रखा है यहीं का यहीं । परन्तु शरीर नहीं रहे गा।  मन बुद्धि चित्त और अहंकार शायद  तब तक हैं जब तक शरीर है।  बाद में इनका क्या? आत्मा जो  है तो परमात्मा का ही अंश है उसी में मिल जाएगी।  
  7. परन्तु मुझे ध्यान आया कि  कुछ काम करने बाकी हैं।  Lockdown में एक दूकान से सामान खरीदते वक़्त 40 रुपए कम थे। उस को 40 रूपये देने हैं।  एक और दूकान दार से सामान  मंगवाया था  उस के 15800 रुपये देने हैं।   यह ना दिए तो मुक्ति कहाँ से मिलेगी।   फेसबुक/ व्हाट्सप्प  में कुछ ग्रुप में  एडमिन हूँ।  उन में भी कुछ इंतज़ाम कर जाऊँ।  
  8.  फिर ध्यान आया कि  अपनी वसीयत भी तो लिख दूँ। मरणोपरांत बच्चे आपस में ना झपट लें।  परन्तु इस का ध्यान आते ही कुछ विचार आने लगे। बच्चे तो अब पढ़ लिख कर बड़े हो गए हैं।  आपने आप संभाले हुए है।  उन को मेरे चाँद पैसे टकों की क्या ज़रुरत है।  वैसे भी हम रूपए पैसे को क्यों बचा कर रखते हैं।  यह तो हमारे कर्म का फल है।  कर्मफल को संचित करने का मतलब है बन्दन।  और  यहाँ मैं तो मुक्ति प्राप्त करने का सोच रहा  हूँ।  
यही सब सोचते सोचते नींद आ गई।  सुबह उठा। शरीर देखा।   विध्यमान था। तापमान सही था। खिड़की खोली। पोह फट रही थी।  चिड़िआ चहचहा रही थी।  दूर से कोयल ने कुहू कुहू किया।  पपीहे ने पीहू पीहू किया।  पड़ोसी ने कहा आप प्रिवेंटिव क्वारंटाइन में हैं।  दूध सब्ज़ी ला देता हूँ।  मुझे सूर्य की उषणता उपलब्ध हुई, मंद मंद और सुगन्धित वायु चलने लगी, पक्षी चहचहा रहे हैं, भवरे गीत गा  रहे है, शरीर निरोगी है, परिवार साथ है, पडोसी सेवा कर रहे हैं।  मुझे  तो लगा स्वर्ग यहीं है यहीं है। मुझे खुद क्या करना है इस के बारे में सोचना चाहिए ना कि मृत्यु क्या है।  जीवन जीना है तो इस के बारे में सोचना है कि  इतनी ज़्यादा संख्या में जो मज़दूर बेघर हो गए हैं उन का दुःख दर्द कैसे काम करूँ। 

इतने में मालूम हुआ कि पड़ोस में दो परिवार COVID  ग्रस्त हो गए।  पास वाली परिसर में 10 लोग ग्रसित हैं।  BBC का न्यूज़ बुलेटिन लगाया।  संसार में COVID का कहर जारी है।  विश्व भर ने 31 जुलाई 2020  तक   17 लाख लोग 188  देशों में प्रभावित हो चुके हैं और 6. 82 लाख लोग इस से मर चुके हैं।  अभी तक इस का इलाज नहीं मिला।  गत 300 वर्ष से विज्ञान  और तकनीक की प्रगति से मानव  ऐसा महसूस कर रहा था कि उस ने प्रकृति पर विजय पा ली है। जो सुख सुविधाएं आज के युग में सामान्य मानव को उपलब्ध हैं वह आज से 300 वर्ष पूर्व राजा  महारजा को भी उपलब्ध नहीं थी।  परन्तु एक वायरस ने सब ठप कर दिया है।  सब सुख सुविधाएँ धरी की धरी रह गई हैं।  लोग आपने आपने घरों में बंद है।  अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रहीं हैं।  यातायात बंद या न्यूनतम हैं।  परन्तु प्राकृतिक सुधार नज़र आ रहा है।  आसमान साफ़ नीले रंग का दिखाई देता है।  नदिआँ  साफ़ हो गई हैं।  वायु का प्रदूषण कम हो गया है।  लोग घर से काम कर रहें है।  मुझे याद आ रहे है चार्ल्स डिकेन्स के वह शब्द जो उस ने थे Tale of Two Cities के शुरू में ही लिखे थे।  मुझे लगता है यह अभी भी सही हैं।  

It was the best of times, it was the worst of times, it was the age of wisdom, it was the age of foolishness, it was the epoch of belief, it was the epoch of incredulity, it was the season of Light, it was the season of Darkness, it was the spring of hope, it was the winter of despair, we had everything before us, we had nothing before us, we were all going direct to Heaven, we were all going direct the other way – in short, the period was so far like the present period, that some of its noisiest authorities insisted on its being received, for good or for evil, in the superlative degree of comparison only.

यानी यह समय सब पहले के समय से बेहतर है क्योंकि प्रदूषण काम हो रहा है।  परन्तु यह समय मानव इतहास का सब से चुन्नोतिपूर्ण समय भी है। 

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