Sunday, January 31, 2021

जीवन और मृत्यु

 जीवन और  मृत्यु



मेरे बचपन के दोस्त संजीव तलवार का एक कार दुर्घटना में देहान्त हो गया। वह 65 वर्ष के थे। साथ में उनकी बेटी  का भी उसी दुर्घटना में  देहान्त हो गया। उनकी पत्नी और बेटा बाल बाल बच गए।  कई दिन से मन परेशान है। रह रह कर उन की याद  आती रहती है। मन है कि समझाए नहीं समझ रहा। मन को समझाने के लिए गीता पाठ किया। भगवान् ने कहा: "जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए शोक नहीं करते।"  जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है। जैसे जीवात्मा को देह की प्राप्ति होती है और फिर  बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था आती है उसी प्रकार देह त्याग हो जाता है और कर्मों के अनुसार फिर से  देह की प्राप्ति होती है। जीवात्मा तो नित्य है और देह अनित्य।  फिर शोक किस बात का ? बस  इस ज्ञान को समझ  कर  आत्मसात करने का  प्रयास कर रहा हूँ: जीवन क्या है और कर्मों के अनुसार जीवन और मृत्यु क्या है?  

हाँ, यह तो समझ में आ जाता है कि  है कि देह का त्याग तो निश्चित  है। जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है।  परन्तु देह त्याग के साथ साथ उस प्राणी के व्यक्तित्व के कई और पहलु लुप्तप्राय हो जाते है।  मैं आपने मित्र संजीव तलवार की उदाहरण लेता हूँ।  मैंने बचपन से उसे देखा है।  कैसे एक बाल्यावस्था से संजीव प्रज्ञावान इंसान बने और एक सूझवान नागरिक। यह सब प्रक्रिया में 65 वर्ष लग गए।  मात्र एक दुर्घटना के कारण  शरीर तो गया ही साथ ही साथ उसकी प्रज्ञा भी लुप्त हो गई। कोई कंप्यूटर होता तो उस का बैकअप ले लिया होता जो उस के बेटे के काम आ जाता। अब कहाँ गया वह  ज्ञान,वह सूझ, वह चंचलता, वह व्यकितत्व? इसी प्रकार कितने महापुरष आये।  उनका ज्ञान सब लुप्त हो गया उन की  देह त्याग के साथ साथ। इन विषयों को समझने का प्रयास कर रहा हूँ।  

जैसे मैंने पहले कहा कि मृत्यु की तो समझ आती है। जो पैदा हुआ उस को एक दिन देह का त्याग तो करना  ही है। परन्तु जन्म लेना ही बहुत बड़ी बात है।  एक पेड़ पर कितने बीज लगते हैं।  क्या सभी अंकुरित हो कर पेड़ बन पाते हैं? नहीं। पति पत्नी संसर्ग तो करते ही रहते हैं परन्तु हर संसर्ग से बच्चा उत्पन्न नहीं होता।  हर बार के संसर्ग से बच्चा उत्पन हो तो बच्चे ही बच्चे पैदा हो जाएँ।  जो बच्चा पैदा होता है वही एक चमत्कार है।  पैदा होना ही एक चमत्कार है जी। जन्म उपरान्त शिशु अवस्था और  बचपन से  जवानी और फिर  वृद्धावस्था तक का शरीर का सफर चुनौतिओं भरा है। किसी भी अवस्था में क्षीण हो जाने पर या दुर्घटना ग्रस्त हो जाने पर शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है। परन्तु आश्चर्य  तो यह है कि सब जानते हैं कि  मृत्यु होनी निश्चित है परन्तु मरना कोई नहीं चाहता। ज़िन्दगी भर संघर्ष रहता है जीने का। Darwin ने इस सिद्धांत को  परिभाषित करते हुए कहा था: There is Struggle for Existence and the Fittest Survives. मतलब जीवन में संघर्ष चलता रहता है और वही जीवित रहता है जो इस संघर्ष के लिए सक्षम है और संघर्ष में जीत जाता है। परन्तु हमेशा के लिए कोई ज़िंदा नहीं रहता। ना आज तक कोई अमर हुआ है ना होगा।  

वैदिक और सनातन संस्कृति में जीवन मरण को कर्मों का खेल कहा गया है।   विज्ञान में कहीं भी जीवात्मा और कर्मों  का  ज़िक्र नहीं  है और बता दिए जाने  पर  भी मान्यता नहीं है। विज्ञान के अनुसार जीव हाड मॉस का पुतला है जो स्वचालित है। शरीर एक प्रणाली  है जिस में विभिन्न क्रियाएं  कार्यरत हैं जैसे कि:  सांस लेना, खाना, पीना, सोना, सम्भोग करना इत्यादि और  दिल, दिमाग, जिगर, गुर्दा इत्यादि की क्रियाएँ। यह सब जब तक शरीर का हिस्सा बन कर सुचारू रूप से कार्यरत हैं और आसपास के वातावरण के साथ सही ताल मेल  में रहते हैं तब तक जीवन  है। जब तक यह तालमेल है  तब तक यह जीवन चलता है। अन्यथा जीव  मौत को प्राप्त होता है। कुछ  अंग या क्रिया ऐसी हैं  कि जब फेल  हो जायें तो तुरंत मृत्यु प्राप्त हो जाती है।  जैसे कि  सांस ना आये तो मृत्यु तुरंत है।  दिल धड़कना बंद कर दे तो मृत्यु तुरंत है।  परन्तु दिमाग फेल हो जाने से प्राणी  काफी देर तक  ज़िंदा रह  सकता  है।  गुर्दा  और जिगर  तो स्थानांतरित भी हो  जाते हैं।  वातावरण भी जब तक अनुकूल है तब तक जीवन संभव है।  सर्दी, गर्मी, तापमान, दबाव (Pressure)  जल, वायु और पृथ्वी, सूर्य, चाँद इत्यादि ग्रहों की अनुकूलता और आस पास के स्थावर, जंगम प्राणियों (पेड़, पौधे, वनस्पति, छोटे बड़े घरेलू/ जंगली जानवर, बैक्टीरिया इत्यादि) की अनुकूलता पर भी जीवन निर्भर करता है। 

विज्ञान पूर्वजन्म और पुनर्जन्म  को नहीं मानता।  परन्तु विज्ञान ने कई मुद्दों का उत्तर अभी तक नहीं दिया: हाड मॉस के पुतले में जान कहाँ से और कैसे आती है ?  वह आपने जैसा प्राणी कैसे पैदा कर देता है?  विज्ञान की तरह ही कई  धर्म, पंथ और विचारधारा ऐसी हैं जो पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को  और आत्मा और परमात्मा को  भी नहीं मानती। 

वैदिक और  सनातन परम्परा में यह धारणा है कि जीवन मरण कर्मों का खेल है। कर्म सिद्धांत के अनुसार हर प्राणी जो कर्म करता है उस को उन का फल भुगतना पड़ता है।  कुछ फल तुरंत प्रभाव  देते हैं और कुछ के  प्रभाव संचित हो जाते  हैं ।  जैसे  जीवन में जो रुपया पैसा हम कमाते हैं उस में से कुछ का सेवन हम  तभी कर लेते हैं और कुछ को बचा कर बैंक में जमा कर लेते हैं। फिर  बैंक खाते संचित धन निकाल कर हम समय समय पर खर्च कर सकते हैं।  इसी प्रकार  संचित कर्मों में से कुछ कर्म जो आपना फल देना शुरू कर देते हैं उनको प्रारब्ध कहते हैं। यह उसी तरह है  जैसे बैंक में संचित  धन में से कुछ धन निकाल कर  उस का प्रयोग करना। 

जीव अपनी प्रारब्ध को  लेकर जन्म पाता  है। और जिस प्रारब्ध के अनुसार उस का जन्म हुआ उस को इस जन्म में भोगना अनिवार्य है।  और जैसे ही उसकी प्रारब्ध  का कोटा पूरा हो जाता है वह शरीर त्याग देता है।  यह इसी प्रकार है  कि जैसे हम गाडी में पेट्रोल डाल कर यात्रा शुरू करते हैं।  जैसे ही पेट्रोल ख़त्म हुआ गाडी रुक जाती है। प्रारब्ध का कोटा पूरा होने का अर्थ यह नहीं  कि संचित कर्म भी समाप्त हो गए।  बल्कि संचित कर्मों के आधार पर  फिर प्रारब्ध मिलती है और फिर जीवन मिलता  है।  यानि  बैंक से पैसे निकलवा कर फिर से नई  गाडी ली, उस में पेट्रोल डाला और नई  यात्रा शुरू कर दी।   कर्म सिद्धांत  अनुसार  आज जो जीवन  है यह  पहले से संचित  किये गए कर्मों में से क्रियान्वित प्रारब्ध के अनुसार हैं और अभी जो क्रियामाण कर्म हम कर रहे हैं वह या तो अभी तुरंत असर दे देंगे  या संचित हो जाएँ गे  उन के आधार पर हमारी भविष्य की प्रारब्ध बनेगी।  यह कर्मों की यात्रा है।

यह कर्मों की गति बहुत न्यारी और गहन  है।  इस को समझने के लिए मैंने कुछ प्रवचन सुने जो YouTube पर उपलब्ध हैं। उधारणार्थ:  "स्वामी निश्चलानंद जी, शंकराचार्य जगनाथ पूरी  (https://youtu.be/Lh79SDtlIk कर्म और प्रारब्ध)";  "श्री श्री रवि शंकर, Art of Living  (https://youtu.be/iRds-yNMRCg Secrets of Karma);"  "स्वामी निश्चलानंद जी, शंकराचार्य जगनाथ पूरी  ( https://www.youtube.com/watch?v=7cQtb_JqubI&t=1031s )  जीवात्मा शरीर को कब  छोड़ता है )।

इन प्रवचनों को सुन कर जो समझ आया  कि प्रारब्ध के मूल में संचित कर्म हैं। पूर्वजीवन  में या पूर्वजन्मों में जीव के द्वारा किये गए शुभ अशुभ कर्म जो अभी तक भोगे नहीं जा चुके हैं वह जमा हैं उन का नाम है संचित कर्म . अन्तर्यामी परमात्मा के संकल्प से संचित कर्म में से जितना अंश फल देने के लिए उन्मुख हो जाते हैं उस का नाम है प्रारब्ध।  यानि  जिन कर्मों का फल प्रारम्भ हो चुका है उसी का नाम है प्रारब्ध।  प्रारब्ध तीन रूप में फलीभूत  होता है: जाति, आयु और भोग।  जाति का अर्थ है: जन्म।  प्रारब्धानुसार जीव जन्म से ही पशु, पक्षी, मनुष्य, स्त्री, पुरष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, काला या गोरा, पंजाबी, गुजराती या विदेशी हो जाता है।  यह उस की प्रारब्ध है।  दूसरा फल है आयु।  जीवन में कितने श्वास लेने हैं यह भी जन्म के साथ प्रारब्ध अनुसार निर्धारित हैं।  तीसरा है भोग।  इस का अर्थ है  सुख, दुःख देने वाली सामग्री, व्यक्ति और वस्तु की उपलब्धि और उन के सेवन या संपर्क से सुख दुःख का मिलना। तो जीवन में जाति, आयु और भोग प्रारब्ध अनुसार उपलब्ध होते हैं। प्रारब्ध को भाग्य या किस्मत भी कहते हैं। तो जीवन में जाति, आयु और भोग प्रारब्ध/ भाग्य / किस्मत  अनुसार उपलब्ध होते हैं।  कोई जन्म से ही अमीर के घर पैदा होता है और तीव्र बुद्धि पाता  है। कोई गरीब के घर पैदा होता है। Some are born with a silver spoon in mouth while some are born paupers or handicapped. 

तो क्या जीवन प्रारब्ध के हाथों कठपुतली है।  शास्त्र कहते हैं कि ऐसा नहीं।  जीव पुरषार्थ करने का अधिकारी भी है। प्रारब्ध को नया बल नहीं होता पुरषार्थ को होता है।  इस लिए पुरषार्थ की प्रधानता सिद्ध होती है परन्तु लोग अपनी किस्मत को ही कोसते रहते हैं।  कभी प्रारब्ध प्रबल होता है कभी पुरषार्थ और कभी बराबर। प्रारब्ध के भी भेद होते है: अनुकूल एवं प्रतिकूल। अनुकूल प्रारब्ध के साथ यदि अनुकूल पुरषार्थ किया जाए तो सोने पे सुहागा हो जाता है। और अगर प्रारब्ध अनुसार प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होती है तो उस में सोचना चाहिए कि इस में कौन सी चीज़ की जाए जिस से  प्रतिकूल परिस्थिति अनुकूल हो जाए।  प्रारब्ध को नया बल नहीं प्राप्त।  प्रारब्ध फल दे कर नष्ट हो जाता है।  पुरषार्थ के द्वारा प्रारब्ध को दबाया जा सकता है।  प्रबल पुरषार्थ के द्वारा यह संभव है। इस लिए कोई गरीब  के घर पैदा होकर भी पुरषार्थ द्वारा सब कुछ हासिल कर लेते हैं और कई अमीर माँ बाप से मिली जायदात  से भी कुछ हासिल नहीं कर पाते।  

वैदिक और सनातन परम्परा के अनुसार प्राणी प्रारब्धानुसार जन्म  लेता है और आपने कर्म भोगता है।  प्रारब्ध अनुसार जैसे ही उस के श्वास प्रश्वास का कोटा पूरा हो जाता है वह शरीर त्याग देता है।  परन्तु इस जीवन में किये गए कर्मों का फल भी उसे प्राप्त होगा।  जीवात्मा जब तक शरीर में है सब मंगल है।  जैसे ही जीवात्मा से शरीर अलग होता है शरीर  शव बन जाता है।  शव से बदबू आती है और परिवार शव को तुरंत अंतिम संस्कार की तरफ ले जाता है वह चाहे दाह संस्कार हो या दफनाना।  

परन्तु आश्चर्य  तो यह है कि सब जानते हैं कि  मृत्यु होनी निश्चित है परन्तु मरना कोई नहीं चाहता। उधर महापुरुष कहते हैं की जीवन मरण से छुटकारा कब प्राप्त होगा।  इन सब का ज़िक्र अगले अंक में।       

​सतीश कालड़ा 
बैंगलोर 

2 comments:

  1. आत्मा ,परमात्मा , प्रकृति पर कई तरह की धारणाएं प्राचीन काल से प्रचलित हैं. सिद्धार्थ गौतम जब २९ साल की आयु में महल से सत्य की खोज में निकले तो उस समय ६२ धारणाएं मानी जाती थीं. आत्मा और परमात्मा एक हैं, अलग अलग हैं, आत्मा शरीर में रहती है या अलग वगैरह। इन्हें मुख्य तौर पर ६ भागों में

    उस समय आत्मा, परमात्मा, साकार, निराकार, लोक और परलोक हैं या नहीं हैं इस पर लगभग बासठ दार्शनिक विचार धाराएं साथ साथ ही चल रहीं थीं. इनमें से प्रमुख हैं:

    * न्याय दर्शन जिसमें परमात्मा को सर्वव्यापी और निराकार कहा गया है. प्रकृति को अचेतन और आत्मा को शरीर से अलग कहा गया है. यह दर्शन महर्षि गौतम द्वारा रचित है.

    * वैशेषिक दर्शन में वेदों को ईश्वर का वचन माना गया है. मनुष्य के कल्याण और उन्नति के लिए धर्म पर चलना आवश्यक बताया गया है. महर्षि कणाद के अनुसार जीव और ब्रह्म अलग अलग हैं और एक नहीं हो सकते.

    * सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा रचित है. इसमें कहा गया है कि प्रकृति अचेतन और शाश्वत है पर मनुष्य चेतन है और प्रकृति को भोगता है. असत्य से सत्य की उत्पति नहीं होती और सत्य कारणों से ही सत्य कार्य होते हैं.

    * योग दर्शन में परमात्मा और आत्मा का मिलन यौगिक क्रियाओं द्वारा कराने की बात कही गई है. इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर ध्यान और समाधि लगाने से आत्मा और परमात्मा का योग संभव है. अंतःकरण शुद्धि पर महर्षि पतंजलि ने ज्यादा जोर दिया है.

    * महर्षि जैमिनी द्वारा रचित मीमांसा दर्शन वेद मन्त्र और वैदिक क्रियाओं को सत्य मानता है. यह दर्शन उन्नति के लिए पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों पर ज्यादा जोर देता है.

    * वेदांत दर्शन या उत्तर मीमांसा महर्षि व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्र में रचित है. इसमें कहा गया है कि ब्रह्म सर्वज्ञ है पर निराकार है और जन्म-मरण से ऊपर है पर आत्मा से अलग है. मीमांसा में भी आगे चल कर कई धाराएं चल पड़ी - द्वैत, अद्वैत, विशिष्ठाद्वैत.

    * नास्तिकवादी विचार भी उस समय प्रचलित थे. ईश्वर और परलोक ना मानने वाले, केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने वाले और वेदों से असहमति रखने वाले दर्शन भी थे जैसे कि चार्वाक दर्शन, माध्यमिक, योगाचार, सौतांत्रिक, वैभाषिक और आर्हत दर्शन इत्यादि.
    आत्मा और परमात्मा को ले कर प्रकृति को, घटनाओं को समझना मुश्किल हो जाता है. मसलन मसबकी आत्माएं परमात्मा से जुडी हैं तो दुःख क्यों हो, आपसी मारकाट क्यों हो? यहां कर्म के सिद्धांत पर व्याख्या करना आसान लगता है.
    दूसरी बात है कर्म के संचय कैसे होता होगा या हिसाब कौन रखता होगा ये भी मिस्ट्री है.

    बुद्ध के अनुसार मनुष्य स्वयं अपना मालिक है ना की कोई प्रारब्ध या कोई पावर। मुख्य प्रश्न हमारे सामने यह है की दुःख का निवारण कैसे हो. आत्मा परमात्मा के प्रश्न 'अव्यक्त' हैं अर्थात इन पर विचार अंतहीन हैं.
    - हर्ष वर्धन

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