Thursday, June 2, 2022

धर्म, समाज, संस्कृति और राजनीति

 धर्म, समाज, संस्कृति  और राजनीति


Seema Sandesh, Sriganganagar 02.06.2022


समाज में आजकल धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है। आइये समझने की कोशिश करते हैं कि धर्म क्या है, धर्म आधारित संस्कृति और समाज क्या है,   धर्म कैसे हठधर्म बन कर संस्कृति को विकृत करता है और धर्म  के नाम पर कैसे और क्यों राजनीति होती है। 

व्यक्ति को  धर्म की प्रारम्भिक राह और पहचान  विरासत में ही मिल जाती  है।  हिन्दू की  सन्तान  हिन्दू, मुस्लिम की मुस्लिम, ईसाई की ईसाई और सिख की सिख। परन्तु  धर्म की गहराई   गुरु शिष्य परम्परा से सुलभ होती है।  गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर ही मनुष्य सही परम्परा से धर्म मार्ग पर  अग्रसर होता है।  एक ही   परम्परा का पालन करने वाले सम्प्रदाय   बन जाते हैं।  भारत में धर्म आधारित मुख्य परम्पराऐं  हैं हिन्दू (78%), मुस्लिम (18%) और  ईसाई (2%)। अन्य समुदाय हैं बौद्ध, जैन, सिख और पारसी।  

गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर भी मनुष्य एक परम्परा को तो पकड़ लेता है परन्तु गहराई को वह अपनी साधना के आधार पर ही पाता है। ईश्वर सत्य  की उच्चतम अवधारणा  है।   ईश्वर सृष्टि के कण कण में विराजमान है। प्रकृति में है, प्रकृति के बाहर नहीं।   दिव्यता  प्रकृति का सार है।   ईश्वरीय स्वभाव हर इंसान, हर बच्चे में मौजूद हो। इसे कैसे प्रकट करें? इसे कैसे प्रकट करें? यही धर्म का विज्ञान है। हजारों मनुष्यों में कोई एक ही परमात्मा की  प्राप्ति अर्थात सत्य की खोज के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में से भी कोई एक परमात्मा के  परायण होकर परमात्मा को   तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है (भगवद गीता अध्याय- 7     श्लोक- 3)। अधिकाँश लोग तो सिर्फ नाम से ही धर्म के अनुयायी होते हैं: अधिकाँश के ऊपर यह  मोहर है कि  वह अमुक धर्म के माता पिता के घर जन्मे और कुछ के ऊपर धर्म की यह मोहर है कि वह अमुक धर्म गुरु अर्थात परम्परा का अनुसरण कर रहे हैं और उस सम्रदाय के अनुसार रहन सहन,  पहरावे और पूजा पाठ  करते हैं। असल में अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला तो कोई विरला ही होता है।  कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई सत्य यानी परमात्मा वास्तव में जान पाता है। 

धर्म के दो आयाम हैं: नैतिक आयाम और वैज्ञानिक आयाम। नैतिक आयाम वह धर्म है जिसमें आप पैदा हुए हैं। इसमें आपकी कोई पसंद नहीं। आप सिर्फ एक विशेष परिवार में पैदा हुए हैं ईसाई, हिंदू, मुस्लिम, या कुछ भी। लेकिन वैज्ञानिक आयाम वह है जब आप स्वयं  उसे खोजते हो। बिना खोजे कोई विज्ञान नहीं है। तो जब आप धार्मिक होना चाहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप आध्यात्मिक हो जाते हैं। विज्ञान सार्वभौम है। इसी तरह आध्यात्मिक सत्य सार्वभौमिक हैं। कोई एक विशेष धार्मिक संप्रदाय या क्षेत्र में पैदा हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक होने के कारण  सार्वभौमिक होने के लिए विकसित होता है। यही धर्म का वैज्ञानिक आयाम है जो साधना  से आता है। केवल एक विशेष परंपरा में पैदा होने से आपको यह नहीं मिलता है।

 

आध्यात्मिक स्तर पर धर्म हर व्यक्ति की परमात्मा और प्रकृति के प्रति उस की व्यक्तिगत धारणा, आस्था और विश्वास है।   उस आस्था और विश्वास के आधार पर परमात्मा की प्राप्ति के लिए उस के प्रयास, उस की साधना, उस के भाव और भावनाएं, उस का व्यवहार, उस के रीति रिवाज़:   इन सब के  समूह को उस का व्यक्तिगत धर्म या धर्म आधारित व्यवहार कह सकते हैं।  इस लिहाज से देखा जाए तो हर व्यक्ति का आपना आपना धर्म हो सकता है और इस में कोई ऐतराज भी नहीं होना चाहिए।   प्रकृति ने हर मनुष्य को अलग रूप और रंग और स्वाभाव दिया है। कोई किसी से मिलता नहीं।   कोई आस्तिक हो सकता है तो कोई नास्तिक।  किसी के लिए परमात्मा निर्गुण निराकार है और किसी के लिए सगुण  साकार।  कोई मूर्ती पूजा करता है तो कोई पुस्तक  पड़ता है।  कोई सत्संग कीर्तन करता है तो कोई गुफा में बैठ कर साधना करता है।  कोई पूजा अर्चना करता है तो कोई इबादत करता है। 

परम्परा प्राय रूढ़िवादी होती है। परन्तु बदलते समय के साथ इस में सुधार अपेक्षित रहता है।   अनुसंधान सभी परंपरा का हिस्सा बना रहे तो यह सामयिक हो जाती हैं। जब परंपरा इन चीजों को खो देती है तो वह कट्टरता या हठधर्म  होने लगती है। कोई धर्म वैर भाव नहीं सिखाता।  परन्तु हठधर्म के कारण अलग अलग सम्प्रदाय कुएँ के मेंढक बन जाते हैं और एक दुसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लग जाते हैं।  सम्प्रदायिक  झगड़ों की नींव यहीं से रखी जाती है।  अध्यात्म और धर्म स्वयं इन सभी संघर्षों से परे है। यह शांति, प्रेम और सद्भाव के लिए है। परन्तु जब यह सामाजिक राजनीतिक ताकतों से प्रभावित होता है और इसके आगे झुक जाता है तो यह संकीर्ण और रूढ़िवादी  बन जाता है जिससे संघर्ष, असहिष्णुता हिंसा और यहां तक कि विज्ञान की भावना का भी दमन होता है। इसे ही धर्म का अनैतिक आयाम कहा जाता है। समाज में आजकल जो धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है वह इसी अनैतिक आयाम का प्रभाव है। आवश्यकता है आध्यात्मिक बनने की।  आइये विज्ञान के इस युग में धर्म के वैज्ञानिक आयाम का अनुसरण कर अध्यात्म को प्राप्त हों और हठधर्म का त्याग करें और धर्म को राजनीति से तो हमेशा दूर  रखें। ऐसी शुभकामना है। 

 

सतीश कालड़ा, बैंगलोर 

iamsatishkalra@gmail.com 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 


 



Saturday, April 9, 2022

राम नवमी के शुभावसर पर राम राज्य की परिकल्पना

 राम नवमी के शुभावसर पर राम राज्य की परिकल्पना

Seema Sandesh, Sriganganagar 10.04.2022

राम नवमी के शुभ अवसर पर सब  को हार्दिक शुभकामनायें। अति संतोष का विषय है कि राम जन्म भूमि का विवाद सुलझ चुका है और भव्य राम मंदिर का शिलान्यास हो चुका है।  देश में जय श्री राम का बोलबाला है। हिन्दू संस्कृति में राम और कृष्ण भक्ति जीवन का आधार  है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर हिंदी साहित्य को एक गौरव ग्रन्थ प्रदान किया  और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम के जीवन और उनके परिवार की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिस में  आदर्श पिता, आदर्श पुत्र, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श सेवक, आदर्श गुरु, आदर्श राजा का ऐसा चरित्र चित्रण किया जिस से हिन्दू समाज सदिओं से प्रेरणा लेता रहा है। अंग्रेज़ जब गरमाटिया मज़दूरों  को फीजी, टोबैगो, मॉरिशयस, सूरीनाम इत्यादि देशों में लेकर गए तो वह लोग आपने साथ रामचरितमानस और हनुमान चालीसा ले गए।  अब वह देश आज़ाद हो गए परन्तु राम कथा का चलन अभी भी वहां पर प्रचलित है।  इसी तरह से बाली और कम्बोडिया में भी राम लीला खेली जाती है।  भारत में हर हिन्दू के घर में रामायण और गीता का पाठ चलता ही रहता है।    


अब समय आ गया है राम राज की स्थापना करने का। यही भगवान् राम की सही पूजा अर्चना होगी। कई लोग तो इस का परिहास भी कर देते हैं। वह कहते है कि राम राज का  मतलब ऐसा राज जिस में जिस का जो मन करे कर ले।  परन्तु यह परिहास अज्ञानता का परिणाम है। राम राज की परिकल्पना देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी की थी। देश की आज़ादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के पश्चात अमृत काल में देश में राम राज की स्थापना करने से बेहतर संकल्प और क्या हो सकता है? आइये समझते हैं कि राम राज से क्या तातपर्य है?


14 वर्ष का बनवास पूरा कर भगवान् राम अयोध्या के राज सिंघासन पर विराजमान हुए और चक्रवर्ती सम्राट बने। आम लोग इस राज  के बारे में शायद यही जानते हैं कि किसी धोबी के कहने पर श्री राम चन्दर जी ने सीता माता को त्याग दे दिया और सीता माता अज्ञातवास में चली गई।  कई लोग इस बात का परिहास भी करते है।  परन्तु बहुत कम लोग इस बात से अवगत हैं कि उस कालखंड में देश में शांति, उत्साह और अदभुद प्रगति हुई थी और उसी को रामराज कहते है।  यह वह कालखंड था जब देश में कोई भूखा प्यासा  नहीं सोता था।  सब को रोज़गार प्राप्त  था और रोटी, कपड़ा और मकान  सुलभ था।  देश में कानून और व्यवस्था थी।  कोई चोरी डकैती धोखा बलात्कार रिश्वतखोरी  इत्यादि नहीं करता था।  बल्कि सब आपने आपने कर्तव्य का पालन करते थे।  सही आचरण और विचार सब जगह था।  यह सब इस लिए संभव था कि गुरुकुल में सही शिक्षा दी जाती थी और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति सही आचरण एवं प्यार   की प्रतिमूर्ति थे। कर्मचारी  कर्तव्यपरायण थे, व्यापारी धोखा नहीं करते थे और सेवक वफादार थे।   


“सब का साथ, सब का विकास और सब का विश्वास” नारा देकर  शायद सरकार देश को राम राज की तरफ अग्रसर करना चाहती है।  परन्तु देश में बहुत कुछ करना बाकी है।  रोज़गार के अवसर सब को सुलभ नहीं है। 10% जनता भुखमरी से ग्रसित है, 25% जनता गरीब है, और कर्मचारी घूसखोर है।  भ्रष्ट नेता, रिश्वतखोर अधिकारी और पुलिस  और टैक्स चोर व्यापारियों का गठबंधन हो रखा है।  उन्होंने विलासता भरी ऐसी जीवन शैली अपना रखी है कि जनसाधारण परेशान है। ऐन केन प्रकेण अर्जित धन से बने अमीरों को जनता आदर्श समझ  लेती है।    किसान परेशान है और किसान के बच्चे ज़मीन बेच कर विदेश जा रहे हैं।  


केंद्र सरकार के कार्यों में कुछ सुधार होना शुरू हुआ है।  देश में सड़कों का जाल  बिछ गया है और रेल यात्रा में भी सुधार हुआ है।  विदेश नीति से भी देश की प्रतिभा बढ़ी है। देश की कर्तव्य परायण सेना ने देश को सुरक्षा प्रदान कर रखी है।   देश का युवा वर्ग अच्छी अच्छी पढाई कर विश्व की उम्दा कम्पनिओं में नेतृत्व कर रहे हैं।  परन्तु अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है और ख़ास तौर पर बैंकिंग सेक्टर में।   प्रदेश सरकारों में और जिला और पंचायत स्तर  के कर्मचारी और पुलिस अभी भी रिश्वत खोर हैं और अदालतों में जनता को इन्साफ मिलने में बहुत देरी होती है।  गृहस्थ जीवन भी बिखरता जा रहा है।   केवल जय श्री राम का नारा लगाने से कुछ नहीं बनेगा।  राम के आदर्श पर चलने की आवश्यकता है और कर्तव्यप्रायण कर्मचारी चाहिए और सुदृढ़ परिवार।  राम नवमी के सुअवसर पर पुनः यह शुभकामना करते हैं कि हर नर में राम सा चरित्र हो और नारी में सीता का और देश में राम राज स्थापित हो।  


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर

10.04.2022




Tuesday, February 8, 2022

प्रकृति और परमेश्वर भाग-1

 प्रकृति और परमेश्वर 

भाग-1

सीमा सन्देश, श्रीगंगानगर 

09.02.2022


वैदिक दर्शन  में प्रकृति को मिथ्या कहा गया है। शंकराचार्य के कथन अनुसार, “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या जीवोब्रमैहव नापरह,”  अर्थात् -- ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म ही है।  क्या सच में जीवन मिथ्या है।  सामान्य प्राणी  के लिए जीवन  एक संघर्ष है। उसे भूख लगती है, प्यास लगती है। सर्दी गर्मी लगती है।  भूख से मरता हुआ इंसान और कड़ाके की  सर्दी में फुटपाथ पर सोने को मजबूर इंसान कैसे कह सकता है कि जगत मिथ्या है। उस को ज़िंदा रहने के लिए दुःख दर्द सहना पड़ता है। भौतिक दुःख के समाधान के लिए पुरषार्थ करना अनिवार्य है।  इस को मिथ्या कह कर जीवन जीना संभव है क्या? विज्ञान ने प्रकृति को समझा और भौतिक दुखों का समाधान करने का प्रयास  किया है। 

मिथ्या वह है जिस का अस्तित्व नहीं । प्रकृति  के दो संघटक हैं: पदार्थ (matter) और ऊर्जा।  विज्ञान मानता है कि पदार्थ और ऊर्जा दोनों को ना ही  बनाया जा सकता है ना मिटाया जा सकता है।  इनकी  मात्रा जितनी है उतनी ही रहती है।  बस इन के रंग रूप बदल सकते हैं।  जैसे कि पदार्थ कभी ठोस, कभी तरल और कभी गैस या वायु रूप में हो सकता है। कुछ पदार्थ मिल कर नया रंग रूप ले सकते हैं। यह बदलाव भौतिक भी हो सकता है और रासायनिक भी। इसी तरह से ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं: उष्णता, प्रकाश, ध्वनि, विधुत, चुंबकीय शक्ति इत्यादि। इस लिहाज से देखा जाए तो प्रकृति का अस्तित्व तो है। हाँ हम यह कह सकते हैं कि यह परिवर्तनशील है। तो जगत मिथ्या कैसे? शायद इस लिए कि प्रकृति में इस के घटको से कई रंग रूप बनते रहते हैं और बिखरते रहते हैं।  हर चीज़ जो बनती है बिखर भी जाती है।  इस लिए प्रकृति के घटको से बनी हुई कोई चीज़ स्थाई नहीं।  शायद इस लिए परिवर्तनशील जगद को मिथ्या कहा गया है।  

यह भी कहा जाता  है कि प्रकृति जड़ है। जड़ मायने मृतप्राय। विज्ञान भी इस को मानता है।  महान वैज्ञानिक नयुटन  के अनुसार  प्रकृति में जो पदार्थ जिस स्थिति में है वह तब तक उसी स्थिति में रहेगा जब तक कि किसी  बल द्वारा उस को उस स्थिति से परिवर्तित ना कर  दिया जाए। तो प्रकृति में इतनी हलचल कैसे। और जो हलचल है वह भी बहुत सुनियोजित है। प्रकृति तो ऐसा लगता है कि जीता जागता जीव है। ऊपर गगन विशाल जिस  में अनगिणत सूर्य, चंद्र और तारागण और आकाश गंगा। हमारा सूर्य तो जैसे जीवन का आधार है जिस के इर्द गिर्द हमारी धरती परिक्रमा करती रहती है और दिन रात और सर्दी गर्मी इत्यादि ऋतुओं को बनाती  है। सूर्य, चांद और पृथ्वी प्रतीक हैं प्रकृति के नियमित होने का। सूर्य हमेशा पूर्व से उदय पश्चिम में अस्त। दिन के बाद रात, रात के बाद दिन। दिन रात की इस अदला बदली से समय का काल चक्र जिस में दिन महीनो में और महीने सालों में और साल युगों की गिनती में आ रहे हैं। और इसी तरह ना जाने कितने सौर मंडल हैं प्रकृति में। 

और फिर हमारी पृथ्वी को देखें तो यहाँ की रचना भी अदबुद्ध। इस   की कोख में ना जाने कितने खनिज और जल। पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से ढका हुआ  जो जीवन का आधार है। धरती को ढक रखा है वायुमंडल ने जिस में अधिकांश मात्रा में जीवनदायनी ऑक्सीजन है। यह पृथ्वी का वातावरण ही है जिस में यहाँ के तापमान और वाष्पीकरण के कारण यहाँ जीवन है: पेड़, पौधे, जलचर, नभचर, स्थावर और जंगम प्राणी।  और हम सब मानव।    


तो सोचने वाली बात यह है कि प्रकृति में इतना सब कुछ सुनियोजित ढंग से कैसे हो रहा है।  जल, वायु, ठोस धरातल, अग्नि और आकाश से लेकर इतने खूबसूरत जीव, जन्तु, पेड़, पौधे और मानव बन रहे हैं और मिट रहे हैं।  फिर इस में मानव को ही देख लो।  उस में स्थूल शरीर के साथ साथ देखने की शक्ति है, सूघने की शक्ति है, सुनने की शक्ति है, स्वाद चखने की शक्ति है, स्पर्श करने की शक्ति है, सोचने समझने महसूस करने की शक्ति है, स्मरण शक्ति है, बुद्धि है, विवेक है। और मानव समाज और राष्ट्र बना कर पृथ्वी का स्वामी बना बैठा है।  जड़ मिटटी से बना यह पुतला  उस में इतना ज्ञान, विज्ञान और विवेक  कहाँ से और कैसे।  


धर्म के अनुसार प्रकृति का आधार परमात्मा है परन्तु विज्ञान परमात्मा को नहीं मानता। इस का ज़िक्र अगली कड़ी में। 


सतीश कालड़ा 

iamsatishkalra@gmail.com 

22.01.2022


Tuesday, January 11, 2022

राष्ट्रीय युवा दिवस: स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात 12 जनवरी

 राष्ट्रीय युवा दिवस

स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात 12 जनवरी


Seema Sandesh Sriganganagar 

12.01.2022

भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने  सन् 1984 को अन्तर राष्ट्रीय युवा वर्ष  घोषित किया था। तत्पश्चात भारत सरकार ने घोषणा की कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानंद  जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाए।  

 

स्वामीजी के जीवन और दर्शन में ऐसा क्या है जिस के कारण भारत सरकार ने उन्हें युवकों के लिए प्रेरणा स्रोत समझा? युवा अवस्था जोश का नाम है। जोश के साथ होश मिल जाए तो सोने पे सुहागा हो जाता है। जोशीले और संस्कार पूर्ण और युवा नरेंद्र को (स्वामी जी का सन्यास से पहले का नाम) विवेक मिला उनके गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस से जिन की शरण में वह 1881 में गए। वह युवा अवस्था में ही सकारात्मक विचारों, संस्कारों, अध्यात्म और आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। उनका जीवन अनुकरणीय प्रेरणा स्रोत है।

 

स्वामी विवेकानन्द ने आपने छोटे से जीवन काल में (12 जनवरी 1863 - 4 जुलाई 1902 तक -39 वर्ष) वेदान्त के प्रभावशाली  गुरु के रूप में कीर्तिमान स्थापित किया।  उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में सनातन धर्म  का प्रतिनिधित्व किया था।   वेदान्त दर्शन को अमेरिका और यूरोप के कई देशों में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुँचा। भारत के जनमानस को प्रेरित किया। उन्हों ने  रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जो आज भी अतुलनीय सेवा का काम कर रहा है। उनका आह्वान था, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”  

 

स्मरण रहे कि यह वह कालखंड था जब भारत पर अंग्रेजों का राज था और अंग्रेज भारतवासियों को हीन भावना से देखते और बरतते थे। जहां अंग्रेजों के दफ्तर,  क्लब या निवास स्थान इत्यादि होते थे वहां लिखा रहता था कि वहां कुत्ते और भारतीय नहीं जा सकते। यह भारत वासियों को नीचा दिखाने के लिए किया जाता था। जब भारत में यह हाल था तो पाश्चात्य जगत में क्या स्थिति रही होगी इस का अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसे कालखंड में 1893 में अमरीका के शहर शिकागो में एक विश्व धर्म महासभा का आयोजन हुआ। स्वामी जी ने वहां जाकर भारत की सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने का विचार किया। यात्रा के लिए पैसे की कमी ही नहीं शून्यता थी। कुछ सहयोग मिला तो अमरीका पहुंच गए। वहां कोई जान पहचान नहीं। सभा में भाग लेने के लिए ना कोई औपचारिक निमंत्रण था ना ही कोई नामांकन। ऐन केण प्रकेण  एक अनजान व्यक्ति के रूप में 30 वर्ष के  युवा स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म महासभा के उद्घाटन समारोह में 11.09.1893 को मात्र पांच मिनट का भाषण दिया।  उस से ना केवल स्वामी जी को पहचान मिली बल्कि पाश्चात्य जगत को भारत की सनातन संस्कृति का आधिकारिक परिचय  मिला। यह पश्चिम के गढ़ में भारत की सनातन संस्कृति के एकाकी सैनानी ने विजय पताका फहराई थी और उस में संदेश था प्यार का, सद्भावना का, विश्व बंधुत्व का। इस को कहते हैं युवा सोच और समझ। नोबेल पुरस्कार विजेता रोमेन रोलैंड कहते हैं कि विवेकानंद ने युद्ध स्तर से ज्यादा शक्तिशाली शब्दों से पश्चिम की अन्तरात्मा को झकझोर दिया था। 

 

विश्व धर्म महासभा के बाद  स्वामी जी की ख्याति चारों और फैल गई।  उनको विभिन्न संस्थानों ने व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। स्वामी जी तीन वर्ष तक अमरीका और यूरोप में रहे और उन्हों ने बहुत महत्वपूर्ण भाषण दिए जिस से पाश्चात्य जगत को वैदिक संस्कृति का परिचय मिला।  

 

स्वामी विवेकानंद की अमरीका और यूरोप विजय यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सही सोच और विश्वास के साथ मनुष्य कुछ भी कर सकता है। इस के बाद स्वामी जी भारत आए तो उनका का बहुत स्वागत हुआ। उन्हों ने पूरे भारत का भ्रमण किया और भारत वासियों को प्रोत्साहित किया और उनके मन में स्वाभिमान और उत्साह के बीज बोए। यह भाषण उपलब्ध हैं उनकी  कोलंबो से अल्मोड़ा नामक पुस्तक में। स्वामी विवेकानन्द कहते थे "मुझे कुछ युवा नर और नारी दो जो शुद्ध और निस्वार्थ हैं और मैं दुनिया को हिला दूंगा।" ऐसा ही हुआ भी। स्वामी जी से प्रेरणा लेकर देश के कई युवकों ने आज़ादी के संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभाई।  

बाल गंगाधर तिलक  ने तो स्वामी जी की गहराई को उनके अमरीका जाने से पहले ही पहचान लिया था। इन दो महान पुरुषों में बहुत अच्छा शास्त्रार्थ हुआ। 1857 के स्वतंत्रा संग्राम के बाद भारत वासियों के हौसले को बुलंद करने के लिए तिलक ने कहा था कि स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और यह प्रेरणा उन्हें मिली थी भगवान कृष्ण के उस संदेश से जो उन्हों ने गीता में अर्जुन को उस समय दिया था जब वह विषाद ग्रस्त था। इसी गीता रहस्य की चर्चा संभवत्य हुई होगी जब वह स्वामी जी से मिले थे क्योंकि स्वामी विवेकानंद का भी गीता में प्रगाढ़ विश्वास था। 

 

महात्मा गाँधी ने कहा था, “मैंने उनके (स्वामी विवेकानन्द) कामों को बहुत अच्छी तरह से देखा है, और उनके माध्यम से, अपने देश के लिए मेरे मन में जो प्यार था, वह  हजार गुना हो गया।   रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था  "यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद का अध्ययन करें। उनमें सब कुछ सकारात्मक है और कुछ भी नकारात्मक नहीं है।"  श्री अरबिंदो ने कहा: "विवेकानंद। …  पुरुषों के बीच एक शेर था।  जो निश्चित कार्य उन्होंने पीछे छोड़ा है वह उनकी रचनात्मक शक्ति और ऊर्जा की हमारी छाप के अनुरूप है।"  पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विवेकानंद के व्यक्तित्व और गरिमा की प्रशंसा की और कहा कि  उनकी पीढ़ी विवेकानंद से व्यापक रूप से प्रभावित थी। सुभाष चंद्र बोस विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। विनोबा भावे ने भारतीयों को उनकी ताकत के प्रति जागरूक बनाने में विवेकानंद के योगदान की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने उन्हें उनकी कमियों और दोषों को दिखाया और उन्हें दूर करना सिखाया। 

 

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 31 मई 2013 को मुंबई विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह दिए गए एक भाषण में भारत के राष्ट्रीय चरित्र के पुनर्निर्माण के लिए विवेकानंद के आह्वान को याद करने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी बताया: स्वामीजी ने बिना किसी हिचकिचाहट के पश्चिमी समाजों के सकारात्मक पहलुओं और उपलब्धियों की सराहना की - और हठधर्मिता से परहेज करते हुए अपनी बात रखी, वे भारत के लिए समझ और सद्भावना का एक मजबूत नया पुल बनाने में सक्षम थे। ऐसा करते हुए, उन्होंने आपसी स्वीकृति के आधार पर हमारे लोगों के बीच एक नया संवाद भी खोला। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, विवेकानंद के प्रबल प्रशंसक हैं और जीवन पर्यंत बेलूर मठ के शिष्य के रूप में स्वामी जी से प्रेरणा लेते रहे हैं। अप्रैल 2013 में, उन्होंने बेलूर मठ का दौरा किया और विवेकानंद के कमरे में ध्यान लगाया।  उन्होंने आगे कहा कि "कुछ लोग हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन को एक पेशा बनाया है। पेशे को सेवा में बदला जा सकता है, लेकिन सेवा को पेशे में नहीं बदला जा सकता है। जहां तक ​​मेरा संबंध है, स्वामी विवेकानंद मेरे लिए राजनीति में प्रवेश करने के लिए एक महान प्रेरणा थे।" 

आज भी बहुत से युवक युवतिआं स्वामी जी से प्रेरणा लेकर अनूठे कार्य कर रहे हैं। एकनाथ रानडे ने कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द स्मारक का निर्माण करवाया को विश्व प्रसिद्ध है। डॉ आर बालासुब्रमण्यम ने युवा अवस्था में स्वामी का साहित्य पढ़ने के पश्चात  स्वामी विवेकानंद युवा आंदोलन, मैसूर (एसवीवाईएम) की स्थापना की। यह संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा और सामुदायिक विकास में अपने जमीनी स्तर से लेकर नीति-स्तर की कार्रवाई के माध्यम से भारत में एक नए नागरिक समाज के निर्माण में लगा हुआ है। स्वामी विवेकानंद स्टडी सर्किल की स्थापना वरिष्ट अधिकारी श्री चंद्र शेखर तलवार ने की जिस की शाखाएं लुधियाना, बठिंडा, श्रीगंगानगर, अमृतसर और चंडीगढ़ में हैं। 

 

कहते हैं कि प्रसिद्ध  अन्ना हजारे भारतीय सेना में ड्राइवर की नौकरी में थे। किसी वह जीवन से परेशान हो गए। उन दिनों उन्हें सौभाग्यवश स्वामी विवेकानंद साहित्य पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ जिस से उनके जीवन में उत्साह उत्पन हुआ और उन्हों ने अपना जीवन समाज सुधार के कार्यों में लगा दिया। 

 

स्वामी जी का साहित्य पढ़ने योग्य है।  उनके प्रवचन पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और देश प्रेम और सकारात्मक सोच रग रग में भर जाती है।  आईये स्वामी विवेकानंद जयंती पर स्वामी जी का साहित्य को हासिल करें, पढ़े और उस से  लाभान्वित हों।  यह अद्वैतआश्रम  से ऑनलाइन भी उपलब्ध है।  https://shop.advaitaashrama.org. निम्नलिखित पुस्तकें बहुत लाभदायक हैं: विवेकानंद की जीवनी; राजयोग;  स्वामी विवेकानंद साहित्य: संचयन; मेरा भारत अमर भारत।

 

सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

12.01.2022 

 



Thursday, December 9, 2021

 क्या हमारी सनातन संस्कृति बादलों की तरह छिन्न-भिन्न होकर नष्ट तो नहीं हो जाएगी?





दुनिया में तीन धर्म सब से पुरातन हैं: भारत में हिन्दू धर्म, इसराइल में यहूदी धर्म और एशिया में पारसी धर्म। यहूदी संस्कृति से उसमें से ही उपजी ईसाई संस्कृति का तालमेल न रह सका और फिर ईसाई धर्म पूरे यूरोप में फ़ैल गया और उस के बाद हर उस जगह जहां यूरोप के देशों ने राज किया। यहूदी अब केवल इजरायल में ही सीमित हैं।  पारसी ईरान में बहुत उच्च संस्कृति थी। परंतु अब उस के अवशेष के रूप में कुछ लोग ही बचे हैं जिन्हो ने भारत में शरण ले ली थी। हिन्दू संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जिस पर गत 10,000 वर्षों से अनेकानेक प्रहार हुए परंतु हर प्रहार के उपरांत यह और भी सशक्त होकर उभरी। 


हिन्दू संस्कृति ने 10,000 साल तक तो यह प्रहार झेल लिए। यहां तक कि 1000 साल के मुगल और अंग्रेजी शासन काल में भी हिन्दू अपनी संस्कृति पर कायम रहे। परंतु 1947 में देश की आजादी के बाद हिंदू संस्कृति पर प्रहार कुछ इस गौण तरीके से हो रहे हैं कि आजकल समाज शास्त्री बहुत चिंता में हैं। चिन्ता का विषय है कि हिन्दू आपने धर्म  के बारे में जागरूक नहीं और ईसाई और मुसलमान हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने में लगे हैं। भारत ही एक ऐसा देश है जिस में हिन्दू बहुसंख्या में हैं। 1947 में देश का एक बड़ा भाग धर्म के आधार पर अलग कर दिया गया और वहां पाकिस्तान और बंगला देश में हिन्दू नाम मात्र रह गए हैं। अफगानिस्तान लाहौर और कसूर जो कभी हिंदुओं के मूल स्थान हुआ करते थे अब वहां हिंदुओ का नामो निशान नहीं। कश्मीर से भी हिंदुओं को निकाल दिया गया है। इसी तरह से  बंगाल और केरल में भी हिन्दू संस्कृति पर प्रहार जारी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में कई जिले ऐसे हैं जिन में हिंदुओं का रहना दूभर है। उत्तर पूर्व भारत के राज्य मेघाल्या, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड के अधिकांश आदिवासी ईसाई हो गए हैं। अब तो पंजाब में भी बहुत लोगों को ईसाइयों ने प्रलोभन दे दे कर ईसाई बना दिया है। दूसरी तरफ जैन, बौद्ध और सिख आपने आप को हिन्दू धर्म से अलग पहचान रखने के लिए प्रतनशील हैं। 


हिन्दू धर्म के तथाकथित गुरु गीता जैसे महान ग्रंथ का प्रचार करते हुए कह रहे हैं, "क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? ... जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। ...तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो?...परिवर्तन संसार का नियम है।...जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा।" यह सब खतरे को देख कर आंख बंद कर लेने जैसी बात है। गीता तो मुर्दे में जान डाल देती है। गीता का यह सार ना जाने किस नपुंसक ने निकाला है। 


हिन्दू किसी का धर्म परिवर्तन करने में विश्वास नहीं रखते। परंतु अन्य धर्म प्रलोभन दे कर या जबरदस्ती हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने में कार्यरत हैं। आधुनिकता के इस दौर में नई पीढ़ी बिना धर्म परिवर्तन के ही अपनी परंपरा से विमुख हो रही है। क्लब कल्चर, पार्टी करना, आपने आप को आधुनिक कह कर धर्म को अंधविश्वास और रूढ़ीवाद कहना आम हो गया है। इस के चलते ना तो किसी पारिवारिक परंपरा का पालन किया जाता है और ना ही किसी धर्मग्रंथ का पठन पाठ। अब शादी विवाह धार्मिक अनुष्ठान ना रह कर खाने पीने के इवेंट बन कर रह गए हैं। जन्म दिवस और तीज  त्योहार भी खाने पीने और शोर शराबे की परंपरा लेते जा रहे हैं। किसी न किसी बहाने से शराब और मीट मास का चलन आम हो गया है। हवन यज्ञ और पूजा पाठ का तो उपहास भी हो जाता है।


क्या हमारी सनातन संस्कृति बादलों की तरह छिन्न-भिन्न होकर नष्ट तो नहीं हो जाएगी? भगवान ना करे ऐसा हो। इस लिए आवश्यकता है हिंदुओं को अपनी आस्था पर कायम रहने की। यह तभी संभव है अगर हमें अपनी संस्कृति का सही ज्ञान हो और उस पर चलने में आस्था रहे।


सनातन धर्म की नींव रखी थी ऋषियों और मुनियों ने। विज्ञान भी वैदिक अनुसंधान को सही मानता हैं। बल्कि स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि विज्ञान अभी तक वैदिक काल के अनुसंधान की परछाई भी नहीं पा सका। इतनी वैभवशाली संस्कृति से विमुख होना मूर्खता से कम नहीं। मात्र योग, आयुर्वेद और एस्ट्रोलॉजी को ही देख लो। जिस को इस का थोड़ा भी अनुभव होता है वह आपने आप को धन्य मानता है। जर्मनी के दार्शनिक वैदिक दर्शन से अभिभूत रहे। 


आइए हम फिर से अपनी सनातन संस्कृति के मर्म को पहचाने और इस की गरिमा का फिर से सही प्रचार प्रसार और पालन कर ठोस आधार दें। आगे की कुछ किश्तों में मैं आपने अनुभव के आधार पर कुछ तथ्य पेश करना चाहूंगा जिस से हम अपनी सनातन संस्कृति में आस्था को कायम रख सकें। 


सतीश कालड़ा

बैंगलोर 

06.12.2021



 





 

 

  


   


Tuesday, November 16, 2021

आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के 40 वर्ष

 श्री श्री रविशंकर कृत 

आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के 40 वर्ष 


Seema Sandesh 16.11.2021


आर्ट ऑफ़ लिविंग नाम से प्रसिद्ध जीवन शैली गुरुदेव  श्री श्री रविशंकर जी द्वारा सिखाई जाने वाली एक जीवन जीने की कला है जिस का प्रशिक्षण विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों  के द्वारा दिया जाता  है। इस के प्राथमिक और मुख्य कार्यक्रम में सुदर्शन क्रिया का प्रशिक्षण दिया जाता है। कहते हैं कि गुरुजी को इसका  अनुभव वर्ष 1981 में   हुआ। तब  वह 25 वर्ष की आयु के थे। उन को इस से इतने आनंद की अनुभूति हुई कि उन्होंने इसे सब को सिखाने  का  संकल्प लिया और नवंबर 1981 आर्ट ऑफ लिविंग संस्था की स्थापना की।   


आर्ट ऑफ़ लिविंग के  कोर्स करने के पश्चात् मुझे महसूस हुआ कि यह योग सीखने की सही प्रक्रिया है। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग अनुशासन और इस से संभावित  संयम तक के सफर के लिए यह सही शुरुआत थी।  अष्टांग योग के आठ अंग हैं: पांच यम, पांच नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि। सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह योग के पांच यम हैं  और शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान योग के पांच नियम हैं।  सत्य और अहिंसा:  केवल दो नियमों का व्रत ले कर और सही पालन कर महात्मा गाँधी महात्मा बन गए थे और उन्हों ने देश को आज़ाद करवाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। योग को सही ढंग से सीख कर अनुभूति हासिल करनी   हो तो समर्थ गुरु की शरण लो, किताबें पढने से कुछ हासिल नहीं होता। गुरुदेव रवि शंकर जी द्वारा स्थापित आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के प्रशिक्षण इस के लिए बिलकुल सही विकल्प हैं। 


गुरूजी ने योग रूप जीवन जीने के तीन  सूत्र दिए हैं: साधना, सत्संग और सेवा। साधना मतलब जो सुदर्शन क्रिया और ध्यान मैडिटेशन सीखी है उस का निरंतर और श्रद्धा पूर्ण अभ्यास दीर्घ काल तक करते रहना।    सप्ताह में एक बार सामूहिक अभ्यास का प्रावधान है जो देश के लगभग सभी शहरों और कस्बों में सुलभ है और विदेश में भी लगभग सब महत्वपूर्ण शहरों में उपलब्ध है।  इसी तरह से आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्रद्धालु सप्ताह में कम से कम एक बार सत्संग कीर्तन भी करते हैं और जहाँ कहीं अवसर मिले सेवा करने को भी तत्पर रहते हैं।  


किसी भी सीख  का अनुकरण तभी होता है जब सिखाने वाला स्वयं उस पर सच्चाई से चले। मैं 2013 से आर्ट ऑफ़ लिविंग के बैंगलोर स्थित आश्रम में रह रहा हूँ।  व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी का व्यक्तिगत  जीवन उन के द्वारा प्रशिक्षित सूत्रों का जीवंत उदाहरण है। संस्था  में   हर जाती, रंग,  सम्प्रदाय और देश के लोगों को बिना किसी भेद भाव के सम्मान सहित स्वीकार किया जाता है। ना केवल स्वीकार किया जाता है बल्कि सब को आश्रम आपने घर जैसा ही लगता है।  गुरूजी की कोशिश होती है की वह हर किसी को व्यक्तिगत समय दे सके।  अधिकाँश श्रद्धलुओं का अनुभव है कि  गुरूजी को वह अपनी व्यक्तिगत दुःख तकलीफ या ख़ुशी सांझा कर सकते हैं। गुरु जी पूर्णतया वर्तमान में रहते हैं और ना तो भूतकाल का भार मन में रखते हैं और ना ही भविष्य के ख्याली पुलाव बुनते हैं। उन से जो भी मिलता है उस को वह 100% ध्यान देते हैं।  साधना, सत्संग और सेवा की तो आप जीती जागती उदाहरण हैं ही। आश्रम में वेद विज्ञान महा विद्या पीठ के सौजन्य से  निरंतर हवन  यज्ञ होते रहते हैं। इस संस्थान में स्तानक स्तर  का प्रशिक्षण पाने के लिए लगभग 200 विद्यार्थी हैं और बहुत विशिष्ट आचार्य भी हैं।  आश्रम में हर सोमवार को रूद्र पूजा और शुक्रवार को देवी पूजा होती है। नवरात्री और शिवरात्रि यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं।  रोज़ शाम को आश्रम में सत्संग होता है जिस में 1000  से 10000 लोग होते हैं  और गुरु जी अगर आश्रम में हों तो सत्संग में अवश्य समय देते हैं और श्रद्धालुओं के प्रश्नो के उत्तर देते हैं। गुरूजी द्वारा बहुत से महत्वपूर्ण सेवा प्रकल्प किये जा रहे  हैं जिन का ज़िक्र आश्रम के वेबसाइट पर उपलब्ध है।


 गुरूजी ने कुछ आचार्यों को प्रशिक्षित किया।  उन से इस का और विस्तार हुआ।  आजकल हज़ारों अधिकृत  प्रशिक्षक हैं जो आर्ट ऑफ़ लिविंग का प्रार्थमिक कोर्स करवाते हैं।  यह कोर्स करने के लिए बैंगलोर आश्रम में आना आवश्यक नहीं।  हर शहर और कसबे में उपलब्ध है। एडवांस कोर्स के लिए भी सैंकड़ों प्रशिक्षक हैं।  संस्था के सेवा प्रलकल्प का विस्तार आयुर्वेद चिकित्सा, खेती बाड़ी और ग्राम  विकास, शिक्षा,  सिंचाई परियोजना, महिला सशक्तिकरण  और युवा कल्याण आदि  क्षेत्रों में हो  चूका है। आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के ध्वज तले कई और संस्थान हैं जैसे कि: श्री श्री आयुर्वेदा हस्पताल और कॉलेज, बैंगलोर; श्री श्री यूनिवर्सिटी, भुबनेश्वर; श्री श्री विद्या मंदिर ट्रस्ट के तहत बैंगलोर, कोलकत्ता और मुमबई में बहुत उम्दा स्कूल हैं; श्री वेद विज्ञान विद्या ट्रस्ट; श्री श्री गौशाला ट्रस्ट इत्यादि।  


गुरुदेव श्री श्री रविशंकर वर्तमान समय में भारत के सुप्रसिद्ध एवं महान संत और आध्यात्मिक गुरु  हैं। देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर आपकी  सही सूझ और  पकड़ है।  हाल ही में राम जनम भूमि मसले को हल करने के लिए उच्चतम न्यायलय ने उनकी सलाह ली थी।  विदेशों में भी गुरुदेव ने शांति स्थापना के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं जिन का ज़िक्र संस्था की वेबसाइट में उपलब्ध है।  


40 वर्ष की अल्पविधि में आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं और इन उपलब्धिओं का शंखनाद भी किया है।  2016 में संस्था ने अपनी 35वी  वर्षगाँठ के उपलक्ष में दिल्ली में एक विशाल उत्सव मनाया था।  इस वर्ष भी 40वी वर्षगाँठ मनाई गई  होती परन्तु कोरोना महामारी के कारण संभव नहीं हो पा रहा। इस के अतिरिक्त संस्था ने कई उत्सव मनाये हैं जिस में हज़ारों की संख्या में वीणा वादक, संगीतज्ञों  या गायकों ने भाग लिया।  


 यकीनन मैं आपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा स्थापित आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था मानव मात्र के कल्याण के लिए है और श्री श्री रवि शंकर भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के महान सपूत हैं और सही मायनो में योग आधारित जीवन जीने की कला सीखने के लिए सही गुरु हैं ।  मेरा उन के श्री चरणों में शत शत नमन है। इस वर्ष 2021 आर्ट ऑफ़ लिविंग  संस्था के 40  वर्ष पूरे होने जा रहे हैं।  विश्व के 150 से ज़्यादा देशों में  करोड़ों अनुयायी हैं।  मुख्य आश्रम भारत के कर्नाटक प्रदेश की राजधानी बैंगलोर में कनकपुरा रोड पर स्थित है और भारत के कई नगरों में एवं अनेक  देशों में संस्था की शाखाएं हैं। 40 वर्ष की अल्पावधि में इस संस्था का इतना विस्तार अति प्रभावशाली है।  


सतीश कालड़ा, बैंगलोर

iamsatishkalra@gmail.com

बैंगलोर 13.11.2021

 


    





Friday, May 7, 2021

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर 


गुरुदेव श्री श्री रविशंकर वर्तमान समय में भारत के सुप्रसिद्ध एवं महान संत और आध्यात्मिक गुरु  हैं। आप का जन्म 13.05.1956 को हुआ और इस वर्ष आपका भौतिक शरीर  65 वर्ष का होने को है। 25 वर्ष की अल्पायु में (1981)  आप ने Art of Living  संस्था की स्थापना की।  इस वर्ष 2021 इस संस्था के 40  वर्ष पूरे होने जा रहे हैं।  आप के  द्वारा प्रशिक्षित सुदर्शन क्रिया  और जीवन शैली का प्रचार अति लोकप्रिय है और विश्व के 150 से ज़्यादा देशों में आप के करोड़ों अनुयायी हैं। Art of Living का मुख्य आश्रम भारत के कर्नाटक प्रदेश की राजधानी बैंगलोर में कनकपुरा रोड पर स्थित है और भारत के कई नगरों में एवं अनेक  देशों में संस्था की शाखाएं हैं। 40 वर्ष की अल्पावधि में इस संस्था का इतना विस्तार अति प्रभावशाली है।  आइए, गुरु जी के जीवन, उनकी संस्था और उनके द्वारा प्रशिक्षित जीवन शैली  की जानकारी साँझा करते  हैं। 

बहुत कम लोगों ने गुरुजी को सही ढंग से समझा है। प्राय लेखक कुछ आंकड़े दे कर तस्सली कर लेते हैं। कुछ भावुक हो कर उनके बारे में चार शब्द लिख देते हैं या गुरु स्टोरी प्रकाशित  कर देते हैं। गुरुजी का व्यक्तित्व और उनका प्रचार प्रसार इतना व्यापक और गहन है कि आंकड़ों  में उस का पार पाना कठिन है। यह प्रयास भी मात्र एक बौना सा प्रयास है। मुख्यतः तीन विषयों पर चर्चा करेंगे:

  1. गुरुजी का बचपन और शिक्षा

  2. गुरुजी के गुरुदेव एवं संन्यास 

  3. गुरुजी द्वारा स्थापित संस्था एवं सेवा प्रकल्प

गुरुजी का बचपन और शिक्षा: कहते हैं जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान । वैसे भी भारत में साधु सन्यासी परिवार से संबंध त्याग देते हैं।  फिर भी जिज्ञासु जानना ही चाहते हैं तो विदित हो:  गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी की बहन श्रीमती भानुमति नरसिम्हा जी ने गुरुजी की जीवन कथा लिखी है जिस को Westland Publications Pvt Ltd, Chennai ने  2018 में प्रकाशित किया है। इस के अनुसार उन का जन्म 13.05.1956 को भारत के तमिलनाडु (जिला तंजावुर गांव पापनाशम) में उनके ननिहाल में हुआ और पालन पोषण बेंगलुरु के जयनगर क्षेत्र में हुआ। आप के माता पिता जाति से ब्राह्मण हैं। परिवार में पूजा पाठ की प्रथा और आस्था भरपूर रही।  गुरूजी की  माता श्रीमती विशालाक्षी सहज स्वभाव की नारी एवं पूजा पाठ में संलग्न रहती। इस का बालक रवि पर बहुत प्रभाव पड़ा। कहते हैं कि मात्र चार वर्ष की आयु में भगवद गीता शिशु रवि को कंठस्थ थी।  ऐसा दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवारों में प्राय होता ही है। परंतु बालक रवि के बारे में कहा जाता है कि उन्हें इस का गहन ज्ञान बचपन से ही था। गुरुजी प्राय सब शास्त्रों से परिचित हैं हालांकि उनके साथ रहने वाले लोग जानते हैं कि गुरुजी ने शास्त्रों का अध्ययन नियमित तौर पर नहीं किया। 

गुरु जी के  पिता श्री वेंकटरमण सुसंस्कृत और कर्मनिष्ट व्यक्तित्व   के मालिक थे और परिवार में साधु संतों का आवागमन लगा रहता था।  उन के पड़ोस में ही पंडित सुधाकर चतुर्वेदी रहते थे जिन्हों ने महात्मा गाँधी के सानिध्य जेल में  काफी दिन व्यतीत किए थे। ऐसा भी सुनने में आया है कि पंडित जी ने ही गांधी जी को गीता की ओर उन्मुख किया था। पंडित जी  से बालक रवि काफी प्रेरित होते रहे।  माता पिता के संस्कार, साधु संतों का सानिध्य, और शास्त्रों का अध्ययन - इन सब ने बालक रवि पर दूरगामी प्रभाव छोड़ा।  पूर्व जन्म के संस्कारों का योगदान तो होता ही है। 

कहते हैं कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात। वह महापुरुष जो आज के दिन जन जन के गुरु है वह उन दिनों भी उतनी ही प्रतिभा के मालिक रहे होंगे जब वह स्कूल या कॉलेज के विद्यार्थी थे। बालक रवि के स्कूल की शिक्षा बैंगलोर में ही MES स्कूल में हुई और St जोसफ कॉलेज से आप ने स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त की।  आप का एक सहपाठी मुझे मिला जिस ने मुझे बताया था कि रवि अत्यंत सौम्य प्रकृति के थे एवं खेल कूद की बजाय गीत संगीत में ज़्यादा दिलचस्पी रखते थे। गुरु जी स्वयं भी कई बार कहते हैं कि अगर वह अध्यात्म मार्ग पर ना आते तो अवश्य वीणा वादन करते। गुरूजी वीणा वादन में अति निपुण हैं।  गुरूजी का कथन है कि वीणा के सात तार जीवन के सात स्तर हैं: स्थूल शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और आत्मा। जब इन सब का सामंजस्य हो जाता है तो जीवन रूपी संगीत प्रकट हो जाता है । 

कुछ लोग जानना चाहते हैं कि गुरु जी का नामकरण कैसे हुआ और इस में दो बार श्री श्री का प्रयोग क्यों है?  रवि शंकर नामकरण का जिक्र तो भानु दीदी ने अपनी पुस्तक में विस्तार से किया है। गुरुजी का जन्म रविवार को हुआ इसलिए रवि शब्द का चयन किया गया। दादीश्री ने आशीर्वाद दिया की सूर्य की भांति रवि जग को रोशन करे गा। उन की जन्म तिथि का मेल जगद्गुरु शंकराचार्य जी से भी था। इसलिए पूरा नाम रखा गया रविशंकर। समय रहते रविशंकर प्रसिद्धि हासिल करने लगे। उन दिनों सितार वादक श्री रवि शंकर बहुत प्रसिद्ध थे। बस उन के नाम से थोड़ा भिन्न होने के कारण श्री श्री रविशंकर नामकरण हो गया और अब तो श्री श्री या गुरुदेव कहना ही काफी है।

गुरूजी की बहन ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनके भाई रवि स्कूल में उन बातों में दिलचस्पी नहीं लेते थे जिन में सामान्य किशोर इच्छुक होते हैं: जैसे खेल कूद फिल्मी दुनिया इत्यादि। बल्कि रवि की दिलचस्पी ज़िन्दगी की गहराईओं को जानने में हुआ करती थी।

 किशोर रवि किशोरों के लड़ाई जगडे  में पड़ने की बजाय उन को सुलझाने में लगे रहते। उन को उसी अवस्था में कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन के गुर आते थे।  उन में से एक गुर यह था कि किसी की दुर्भावना मात्र कुछ समय के लिए रहती है: ज़्यादा से ज़्यादा ढाई दिन।   अगर कुछ देर किनारा कर लिया जाए तो वह स्वयं दुर्भावना को भूल जाता है।  

हालांकि किशोर रवि बाकी किशोरों से अलग प्रकृति के थे परन्तु ऐसा नहीं था कि वह उन से अलग थलग रहते थे। बल्कि वह उन की समस्याओं का हल निकाल देते थे। उनके सहपाठी और अध्यापकों का कथन है की रवि के सानिध्य से उन्हें सुकून मिलता था। वैसे कभी कभी किशोर रवि फिल्मी गीत संगीत का भी आनंद ले लेते थे और आज भी ऐसा है। उनका मनपसंद गीत है: आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने ना तू;  जो भी है बस यही इक पल है। और गुरु जी ने इस को सही मायने में आत्मसात किया है। गुरु जी पल पल वर्तमान में रहते हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। 

किशरवस्था का ही ज़िक्र कर रहे हैं तो इस बात का ज़िक्र भी उचित है।  भानु दीदी (गुरुजी की बहनज) ने लिखा है कि एक बार स्कूल की गुणकृता नाम की किशोर लड़की  ने देवी दुर्गा का नृत्य किया।  उसका चेहरा अति सुंदर था और  अभिव्यक्ति बहुत अर्थपूर्ण थी। उसके लम्बे बाल गुंथे हुए थे और उज्जवल बिंदी लगा रखी थी।  साक्षात् देवी लग रही थी। भानु दीदी लिखती हैं कि मेरे भाई ने उस का नृत्य बहुत ध्यानमग्न हो कर देखा और कुछ समय के लिए उस को ऐसा प्रतीत हुआ के उस ने विश्व के हर उस चेहरे का अवलोकन कर लिया जो उन का इंतज़ार कर रहा है। एक बार गुरु जी से पुछा गया कि आप किशोरावस्था में कैसा महसूस करते थे?  तो उन्होंने उत्तर दिया की वह महसूस करते थे कि वह सर्वव्यापी हैं।   

गुरुजी के गुरुदेव और सन्यास

रवि जब स्नातक हुए तो अन्य युवकों की तरह उन्हों ने नौकरी ढूंढने की बजाय आध्यात्मिक  गुरु की शरण में जाना सही समझा। कहते हैं गुरु बिन ज्ञान नहीं और सत्य को जानने की जिज्ञासा बहुत थी। किशोर रवि महर्षि महेश योगी जी की शरण में हो लिए। हुआ यूं कि आप महर्षि यूरोपियन रिसर्च यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड में दाखिल हुए और वहां पर महर्षि की कृपा से उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की गुरु दृष्टि हुई। परिवार में भी माता, पिता और बहन को संन्यास का तब ज्ञान हुआ जब दो वर्ष बाद यूरोप से वापिस घर आए। 

बस फिर क्या था। महर्षि की प्रसिद्ध उन दिनों इतनी ही थी जितनी आजकल गुरुजी की अपनी है। सन्यासी रवि महर्षि के अंतरंग और  अग्रणी  में से एक थे। वह भारत में महर्षि के विभिन्न सेवा प्रकल्प देखने में व्यस्त हो गए। 

प्राय देखने में आया है की जो इंसान सन्यास लेता है या  वह या तो स्वयं परिवार का त्याग कर देता है या फिर उसका परिवार उसका त्याग कर देता है। सन्यासी स्वयं परिवार का त्याग इसलिए करता है ताकि मोह माया से ऊपर उठ सके। परिवार सन्यासी का त्याग इसलिए कर देता है क्योंकि उस के भगत इतने हो जाते हैं कि परिवार संभाल नहीं पाता। सन्यासी अपना नाम तक बदल लेते हैं और प्राय उस नगर या गांव की तरफ नहीं जाते जहां उनका जन्म हुआ या लालन पालन हुआ। अक्सर गेरुआ पहन लेते हैं जो कि अग्नि का प्रतीक है। यह इसका भी प्रतीक है कि सन्यासी ने अपने पूर्वजीवन का अग्नि दाह कर दिया और केवल ज्ञान मार्ग या भक्ति मार्ग अपना लिया। 

श्री रविशंकर जी ने संन्यास लिया परंतु ना अपना नाम बदला, ना माता पिता, बहन को छोड़ा और ना ही उन्होंने रवि को छोड़ा। बल्कि माता पिता और बहन  ने सन्यासी रवि को अपना गुरु मान लिया और गुरु रविशंकर के गुरु बनने से जो घर में अत्यधिक सेवा करने का अवसर मिला उस को सहर्ष निभाया। गुरु जी ने गेरुआ  भी नहीं पहना। बल्कि सफेद कपड़ों को अपनाया। देखने में आया है कि सन्यासी जो भी करते हैं 100% करते हैं। सन्यासी या तो रूंड मुंड सब बाल कटवा देते हैं और या बिलकुल नहीं कटवाते। गुरुदेव रविशंकर जी सिर और दाढ़ी के बाल बिल्कुल नहीं काटते और खुले रखते हैं। शायद इसलिए कि किशोरावस्था में सन्यास लिया और भगत दाढ़ी वाले बाबा जी को स्याना समझते हैं। 

सन्यासी रविशंकर का  महर्षि महेश योगी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम और श्रद्धा रही। परंतु समय आ गया था कि वह अपने पैरों पर खड़े हो कर कुछ करें। कालांतर में 1981 में उन्हों ने आर्ट ऑफ लिविंग नामक संस्था की स्थापना की। उस को आज चार दशक पूरे होने को हैं। इस का जिक्र अगली किश्त में। 

सतीश कालड़ा

iamsatishkalra@gmail.com

08.05.2021