Saturday, August 27, 2022
हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान: भाग- 2
Tuesday, August 23, 2022
हमारी पहचान: रामायण और महाभारत
हमारी पहचान: रामायण और महाभारत
![]() |
सीमा सन्देश 24.08.2022
पिछले लेख में मैंने ज़िक्र किया था कि हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए हमें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। माता, पिता, परिवार और समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा जाते हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका है हिन्दू समाज में रामायण और महाभारत का पठन पाठन और भगवान् राम और भगवान् कृष्ण की भक्ति। दुनिया में ऐसी बहुत कम किताबें हैं जिन्होंने आम जनता के दिलो दिमाग पर सदिओं तक इतना गहरा प्रभाव डाला हो। रामायण और महाभारत कुछ ऐसी प्राचीन गाथाएं हैं जिन का ज्ञान सब को सहजता से ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि परिवार और समाज में इन की चर्चा ही इतनी होती रहती है और यह जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। सब को इन की कहानी मालूम है। परन्तु फिर भी बार बार इस का अभ्यास होता रहता है। देश के कई भागों में नवरात्री के दिनों में राम लीला खेली जाती है। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस तो शायद सब के घर में उपलब्ध है जिस का समय समय पर अखण्ड पाठ या साधारण पाठ चलता रहता है। इस के अतिरिक्त रामायण और महाभारत के विषय को लेकर दूरदर्शन के सीरियल अत्यधिक लोकप्रिय हैं। फिल्में भी बनी हुई हैं। बच्चों के कॉमिक भी इन विषयों को लेकर बने हुए है। रामायण और महाभारत में हर तरह के लोगों के लिए कुछ न कुछ मिलता है: चाहे वह विद्वान् हो या गाँव में रहने वाला साधारण अनपढ़ गंवार। रामायण और महाभारत की कथा से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि परिवार और समाज को क्या जोड़ता है और क्या तोड़ता है। किस तरह समाज में मर्यादा कायम की जा सकती है।
रामायण और महाभारत को लिखने वाले हैं महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास। महर्षि वाल्मीकि ने सब से पहले राम कथा संस्कृत भाषा में लिखी। फिर इस कथा को समय समय पर कई कविओं और लेखकों ने लिखा। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास कृत राम चरितमानस भक्ति की पराकाष्टठा है और बहुत लोकप्रिय ग्रंथ है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की गाथा लिख कर मानव समाज को अदभुद भेट दी है। गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी का कथन है कि हज़ारों ऋषि और मुनियों की शृंखला में महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास जी अग्रणी हैं। इन्होंने ब्रह्म ज्ञान को बड़ी सरलता से रामायण, महाभारत इत्यादि के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। समस्त विश्व इनके इस अमूल्य योगदान का सदैव ऋणी रहेगा।
क्या रामायण और महाभारत सिर्फ कथा है या वास्तविक इतिहास है? यह चर्चा इतिहास के तथाकथित विद्वान् समय समय पर किया करते हैं। इस को इतिहास मानो या कथा इन की महानता पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता। सदिओं पहले रिश्ते नातों और समाज की मर्यादा का इतना अच्छा विश्लेषण अगर काल्पनिक कथा द्वारा भी किया गया है तो उन ऋषिओं को नमस्कार है जिन्हों ने इतना बढ़िया ग्रन्थ रचा और जनसाधारण को ज्ञान दिया। परन्तु हिन्दू समाज के लिए राम और कृष्ण साक्षात् भगवान् के अवतार हैं और भक्ति और श्रद्धा का आधार हैं। राम भक्ति से ओत प्रोत तो सब इतने हैं कि अभिवादन के लिए राम राम शब्द का प्रयोग किया जाता है। राम भक्त हनुमान सब के दिल में बस्ते हैं और भारत में सीता नारी जाति का आदर्श है। कृष्ण तो भक्ति का सार हैं। वृन्दावन में कृष्ण भक्ति की सरिता बहती है। सुरदास और मीरा ने कृष्ण भक्ति की वह धारा बहाई जिस से सारा हिन्दू समाज आत्मविभोर होता रहता है। कृष्ण द्वारा जो अर्जुन को ज्ञान दिया गया वह महाभारत का ही भाग है जिस को हम भगवद गीता के नाम से जानते हैं। इस की चर्चा अगले अंक में। इस अंक में बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि तथाकथित आधुनिक बनने के चक्र में इन महान ग्रंथो को नज़रअंदाज़ करना समझदारी नहीं। इन का ज्ञान सनातन है और इन के साथ जुड़े रहना रूढ़िवाद नहीं बल्कि विवेक है। आशा करता हूँ कि सब रामायण और महाभारत से प्रेरणा लेते रहेंगे।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
10.08.2022
Thursday, August 4, 2022
हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान
हमारी पहचान: हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान
Seema Sandesh, Sriganganagar 05.08.2022
मैं लगभग 70 वर्ष का हो गया हूँ। भारत में पंजाब प्रदेश के फ़िरोज़पुर शहर में जन्म हुआ और शिक्षा ग्रहण की। फिरोजपुर पंजाब का एक छोटा सा शहर है जो सतलुज नदी के किनारे बसा है और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित है। नौकरी और व्यवसाय के कारण पंजाब के शहर लुधियाना, बठिंडा इत्यादि के अतिरिक्त दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, राजस्थान, गुवाहाटी, बैंगलोर इत्यादि कई जगह समय समय पर रहने और बसने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यूरोप में जर्मनी, हॉलैंड, फ्रांस, लन्दन और दक्षिण पूर्व एशिया में सिंगापुर, बाली, थाईलैंड, फिलीपीन्स और ताइवान इत्यादि का दौरा भी किया। कहीं भी जाता हूँ तो लोग पहली झलक से ही पहचान जाते हैं कि मैं हिन्दू हूँ, हिन्दी मेरी भाषा है और मैं हिन्दुस्तान यानि भारत से हूँ और रहन सहन से पंजाबी हूँ। मैं इस का गर्व भी महसूस करता हूँ। यह पहचान मुझे मेरे जन्मस्थान से ही प्राप्त हुई और जैसे जैसे मैंने 70 वर्ष इस पहचान के साथ जीवन व्यतीत किया मुझे इसका गर्व बढ़ता ही गया। अब मेरे बच्चे भी हिन्दू हैं, हिन्दी बोलते हैं और गर्व महसूस करते हैं कि वह हिन्दू हैं और उनका रहन सहन पंजाबी है।
हिन्दू संस्कृति में ओतप्रोत होने के लिए मुझे कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ा। माता, पिता, परिवार और समाज की संस्कृति ही ऐसी है कि हिन्दू संस्कार सहजता से रग रग में समा गए। मेरी तरह से देश के 100 करोड़ लोग भी हिन्दू हैं और इतनी सहजता से ही हिन्दू संस्कृति से ओतप्रोत हैं। कुछ अपवाद हो सकते हैं। लेकिन प्रथा और नियम अपवाद से आहत नहीं होते बल्कि सुदृढ़ होते हैं। ऐसा मैं मानता हूँ और मेरा अनुभव भी है। यह सनातन संस्कृति और विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों सालों के आचरण से हम तक पहुंची और अब हमारे बच्चों तक।
देखा जाए तो सनातन संस्कृति का आधार गृहस्थाश्रम है। परिवार में कर्त्वय परायण हो कर रहना पूजा ही है। माता पिता और दादा दादी पूजनीय हैं। बहन भाई का प्यार अनूठा है। पति पत्नी एक दुसरे के अटूट साथी हैं। यह सब रिश्ते नाते तो सब जगह और सब सभ्यताओं में होते हैं परन्तु हमारी संस्कृति में इन रिश्तों की मर्यादा कुछ अनूठी है। रामायण और महाभारत हिन्दू संस्कृति के दो इतिहास ग्रन्थ हैं और दोनों में रिश्ते नातों को लेकर ही चर्चा है। रामायण में रिश्तों की मर्यादा का चित्र चित्रण है जिस से प्यार और अनुराग की पराकाष्ठा की सीख मिलती है और महाभारत से यह सीख मिलती है कि मोह और अहंकार से बिगड़े रिश्तों से कैसे परिवार तबाह हो जाता है। हम अक्सर सुनते हैं कि भारत की विशेषता यह है कि यहाँ परिवार और रिश्ते नातों को निभाया जाता है। यूरोप और अमेरिका में परिवार नाम की संस्था लुप्तप्राय होती जा रही है। अफ़सोस यह है कि आजकल हमारे समाज में भी पति पत्नी में तलाक आम बात हो गई है और माता पिता का तिरस्कार हो रहा है और बेटी और बहन को उचित आदर सत्कार नहीं मिलता। असल में यह पूंजीवाद और उपभोक्तावाद की अर्थव्यवस्था का परिणाम है जिस के कारण पति पत्नी दोनों नौकरी पेशा करते हैं। अलग अलग संस्था में दूर दराज़ नौकरी के कारण इकट्ठे नहीं रह पाते और माता पिता को भी साथ नहीं रख पाते। आजकल हमारे समाज में लड़के लड़किआं शादी विवाह के बंदन में बंदना नहीं चाहते। बिना शादी के इकट्ठे रह लेते हैं और जब चाहे साथी बदल लेते हैं। यह चिंता और चिंतन का विषय है।
सनातन संस्कृति में गृहस्थाश्रम के 16 संस्कारों का महत्त्व है। इन संस्कारों से जीवन में धार्मिक अनुष्ठान किये जाते है और परिवार में उत्सव का माहौल होता है और परिवार के सदस्यों में अनुशासन । परन्तु आजकल परिवार में धार्मिक अनुष्ठान शादी विवाह संस्कार और अंत्येष्टि संस्कार तक ही सीमित रह गया है। बाकी संस्कार तो लुप्तप्राय हैं। आजकल तो पारिवारिक उत्सव के नाम पर जन्मदिवस, शादी की सालगिरह और नौकरी से रिटायरमेंट पार्टी का उत्सव मनाया जाता है और उनमें भी धार्मिक अनुष्ठान की जगह खाना पीना और मौज मस्ती की जाती है। यज्ञोपवीत जैसे संस्कारों की तो किसी को खबर भी नहीं।
सनातन संस्कृति में समाज के गठन में जाति प्रथा का मुख्य स्थान रहा है। गत कुछ दशकों से जाति प्रथा को अभिशाप माना जा रहा है। परन्तु हकीकत यह है कि जाति प्रथा की अभी भी समाज में मान्यता है। शादी विवाह के मामले में ध्यान रखा जाता है कि एक ही गोत्र से ना हो। विज्ञान भी इस का पक्षधर है।
इस के साथ साथ परिवार में पूजा, पाठ, प्रार्थना, दिया बाती, संध्या वंदन तो रोज़ होता ही रहता है। माह में दो बार एकादशी व्रत और पूनम अमावस का भी अनुष्ठान होता है। सोमवार को शिव पूजा, मंगल को हनुमान वन्दन, बुद्ध को गणपति वन्दना और गुरूवार को गुरुपूजा का विधान है। घर में कोई ना कोई रामायण या गीता का पाठ करता है और आये दिन उस ज्ञान की चर्चा चलती है। नवरात्री में देवी पूजा और रामलीला, शिवरात्रि में शिव पूजा, श्रावण मास में रामायण पाठ, किसी प्रदेश में गणपति पूजा और किसी में बीहू और देवी पूजा। होली, दिवाली, लोहड़ी, जन्माष्टमी, गुरुपूर्णिमा जैसे कितने तीज त्यौहार हैं। यह सब अनुष्ठान जैसे गृहस्थ जीवन और समाज के अभिन्न अंग बन गए हैं। समय समय पर कुलगुरु के रूप में स्वामी जी का घर में आगमन होता है या हम उनके आश्रम या गुरुकुल में जाते हैं तो शास्त्रों का और धार्मिक अनुष्ठानो की जानकारी भी हो जाती है और अभ्यास होता है जिस में हवन यज्ञ शामिल हैं। जीवन काल में एक दो बार तो हरिद्वार, वृन्दावन, काशी, जगन्नाथ, अमरनाथ इत्यादि तीर्थ स्थान पर भी भ्रमण हो जाता है। इस तरह से हिन्दू संस्कार सहजता से जीवन के रग रग में समा जाते हैं।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
26.07.2022


