Wednesday, January 13, 2021

स्वामी विवेकानंदस्वामी जी के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है?

 स्वामी विवेकानंद के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है?

आज स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस है।  स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 कलकत्ता में हुआ। आज उन के जीवन और उन के द्वारा दी गई  शिक्षा/ ज्ञान  का  स्मरण करना  उचित रहेगा। स्मरण तो उसे किया जाता है जो भूल जाए।  स्वामी जी ने जो ज्ञान दिया वह एक बार आत्मसात हो जाए तो भूलता  ही नहीं।  सनातन ज्ञान है।  

स्वामी विवेकानंद जी को जन साधारण इस लिए याद करते हैं कि उन्होंने 11 सितम्बर 1893 वाले दिन  अमरीका के शहर शिकागो में आयोजित World Parliament of Religion में एक ऐतहासिक भाषण दिया जिस में उन्हों ने अमरीका के लोगों को बहन और भाई कह कर संबोदन किया और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनंदन किया गया।  परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि  स्वामी जी ने उस दिन   हिन्दू धर्म का सही परिचय दिया। सिस्टर निवेदिता के शब्दों में, "जब स्वामी जी ने बोलना शुरू किया तो यह हिन्दुओं के धार्मिक विचारों के बारे में व्याख्यान था परन्तु जब उन्हों ने सब कह दिया तो हिन्दु धर्म  क्या है इस का जगत को ज्ञान हुआ।"  इस से पहले शायद हिन्दू धर्म  को किसी ने इतनी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी थी। यह भी कहा जाता है की हिन्दू धर्म  में कई मत मतान्तर  थे और रहे हैं।  आजकल भी  देश में हिन्दू धर्म की परिभाषा को लेकर फिर से मत मतान्तर चल रहे है।  ऐसे में स्वामी जी के सन्देश को  जान कर सही मार्ग निर्देश मिल सकता है। 

स्वामी जी के अनुसार हिन्दू धर्म क्या है ?  

स्वामी विवेकानंद  ने जो कहा उस का सार यह है:  हिन्दूओँ   ने अपना धर्म  वेदों से प्राप्त किया है।  वेद अनंत ज्ञान की खान हैं।  वेद हमें सिखाते हैं कि सृष्टि का ना आदि  है न अंत है।  वेद हमें बताते हैं कि सृष्टि का आधार परमात्मा है और वही परमात्मा सब प्राणियों में आत्मा रूप में विध्यमान है।  एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और आत्मा का परमात्मा के साथ सम्बंद: क्या है। इन नियमों या सत्य का आविष्कार / प्रतिपादन वेदों में किया गया है और यह आविष्कार करने वाले ऋषि कहलाते हैं। वेदो की रचना ऋषिओं ने की। वेद का ना आदि है ना अंत है। वर्तमान में भी ऋषि और आविष्कार कर रहे हैं और करते  रहें गे।  इस तरह से वेद विज्ञान की  तरह सत्य की खोज है।  हिन्दू धर्म में कट्टरता और हठधर्म का स्थान नहीं है। 

वेद घोषणा करते हैं कि प्रकृति एवं प्राकृतिक नियमों के मूल में परमपिता परमेश्वर मौजूद हैं।  उसी  के आदेश से वायु चलती है, अग्नि दहकती है, बादल बरसते हैं, जनम मृत्यु का  खेल पृथ्वी पर होता है।  

 उस परमेश्वर का रूप क्या है? वह सर्व-व्यापी है, शुद्ध है , निराकार है , सर्वशक्तिमान है।  सब पर उस की पूरी दया है। वैदिक ऋषिओं ने यही गाया। "तू ही हमारा पिता है, तू ही हमारी माता है, तू ही हमारा सखा है, तू ही सभी शक्तिओं का मूल है।  हमें शांति प्रदान  कर।  तू ही इन अखिल पिंडों का भार वहन  करने वाला है।  तू मुझे  जीवन के क्षूद्र भार को वहन करने की शक्ति दे और इस से मुक्ति दे ।"   

और हम उस की पूजा कैसे करें ? प्रेम द्वारा उस की  पुजा की जा सकती है।  समस्त वस्तुओं से भी अधिक  उस की पूजा और प्रेम करना  चाहिए। वेद हमें शुद्ध प्रेम के सम्बन्ध में इस प्रकार की शिक्षा देते हैं:- इस संसार में इस तरह रहना चाहिए जैसे जल में कमल का  पत्ता।  हृदय ईश्वर की तरफ लगा  रहे और हाथ  कर्म  करने की तरफ। ईश्वर से  प्रेम के लिए ही प्रेम करना सब से उचित है।  उस से यही प्रार्थना करनी चाहिए: "हे भगवान्, मुझे ना तो सम्पति चाहिए, ना संतति, ना विद्या।  यदि   तेरी इच्छा है तो सहस्त्र बार जनम मृत्यु के चक्र में पडूंगा। परन्तु हे  प्रभु इतनी  कृपा करना कि मैं फल की आशा छोड़ तेरी भक्ति करू । केवल प्रेम के लिए ही मेरा तुझ से निस्वार्थ प्रेम हो।"

वेद अनुसार प्राणी आत्मा स्वरुप है।  आत्मा क्या है ? यहाँ मैं खड़ा हूँ और जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं क्या हूँ ? क्या मैं पदार्थों का समूह के सिवाय कुछ नहीं हूँ ?  वेद घोषणा करते हैं: मैं शरीर में रहने वाली आत्मा हूँ - शरीर नहीं।  शरीर मर जाएगा पर मैं नहीं मरूं  गा। मैं इस शरीर में विध्यमान हूँ और जब शरीर का पतन हो जाए गा  तब भी विध्यमान रहूँगी।  वेद कहते हैं आत्मा ब्रह्मस्वरूप है।  वह केवल पंचभूतों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) के बंधन में बंध गयी है।  और उस बंधन के छूटने से ही आपने पूर्णत्व  को प्राप्त होगी।  इस अवस्था का नाम है मुक्ति - यानि   अपूर्णता, जनम मृत्यु, आदि व्याधि से छुटकारा।

अब प्रश्न यह उठता है कि यह विशुद्ध, पूर्ण और विमुक्त आत्मा इस प्रकार जड़ का दासत्व क्यों करती है।  स्वयं पूर्ण होते हुए भी इस को अपूर्णतव की यह भ्रमात्मक धारणा कैसे प्राप्त होती है।  और प्राय  प्राणी आपने आप को शरीर समझता है।  वेद कहता है कि आत्मा अनादि और अमर है।  पूर्ण और अनंत है।  और मृत्यु का अर्थ है एक शरीर से दुसरे शरीर में स्थानांतरण/ केंद्रपरिवर्तन। वर्तमान अवस्था हमारे पूर्वनिष्ट कर्मों द्वारा निश्चित होती है और भविष्य वर्तमान कर्मों द्वारा।  आत्मा जनम और मृत्यु के चक्र में लगातार घूमती  हुई कभी ऊपर उठती है कभी नीचे जाती है।  तो यहां दूसरा प्रश्न उठता है।  कि क्या प्राणी अच्छे बुरे कर्मों के   परवश हुआ इधर उधर भटकता रहता है?  इस प्रकार से   अंतर्मन  कांप उठता है।  एक पौराणिक ऋषि ने आविष्कार कर यह घोषणा की: "हे अमृत के पुत्र मैंने अनादि परम पुरुष को पहचान लिया है जो समस्त अज्ञान और माया से परे है। केवल उस  कृपा से ही तुम जनम मृत्यु के चक्कर से छूट सकते हो। दूसरा कोई पथ नहीं।" 

क्या आत्मा का बंधन केवल ईश्वर की दया से ही टूट सकता है और उस की दया शुद्ध पवित्र स्वभाव वाले को प्राप्त होती है?  अतः पवित्रता ही उस के अनुग्रह की प्राप्ति का उपाय है।  हिन्दू शब्दों और सिद्धांतों के जाल में नहीं पड़ता।  यदि इस जीवन के परे कोई अवस्था है जो शाश्वत है (आत्मा या परमात्मा) तो वह उस का अनुभव/ साक्षात्कार करना चाहता है।  हिन्दू ऋषि परम पिता  परमात्मा के विषय में यही प्रमाण देता है कि मैंने आत्मा का / परमात्मा का दर्शन एवं साक्षात्कार किया है।  हिन्दू धर्म  का मूल मंत्र है, " मैं आत्मा हूँ।"- यह विश्वास और तद्रूप आत्मा में ही वास करना।  अतः हिन्दुओं की सभी साधना प्रणाली का लक्ष्य है: पूर्ण बन जाना, देवता बन जाना, ईश्वर के निकट जा कर उन के दर्शन कर लेना, और इस प्रकार ईश्वर सानिध्य को पाकर  दर्शन कर लेना, उस सर्व लोक पिता के समान पूर्ण हो जाना- यही असल में हिन्दू धर्म  है। 

स्वामी जी ने राज योग की व्याख्या करते हुए सन्देश दिया कि हर प्राणी में दिव्यता मौजूद है। लक्ष्य इस दिव्यता को प्राप्त करना है। उस का साक्षात्कार करने के चार साधन हैं : कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग और चौथा है पतंजलि ऋषि द्वारा सुझाया योग अनुशासन जिस को राजयोग के नाम से जाना जाता है। इन में से किसी भी  साधन से या उक्त साधनो के  योग से ईश्वर साक्षात्कार किया जा सकता है .  

 अन्य सभी साधन/ सिद्धांत, नीति, रस्मो रिवाज़, पुस्तक पाठ, मंदिर/ मूर्ती पूजा, तीर्थयात्रा  इत्यादि सब उस सीढी  तक पहुँचाने के चरण हैं। स्वामी जी ने किसी भी साधन या सिद्धांत की निंदा नहीं की।  उन  का मानना है कि  मानव नीचे से शिखर की तरफ जो यात्रा करता है वह सब सच की  यात्रा है। मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार कर के खुद ईश्वर बनाना है। वेद कहता है  मूर्तियाँ, मंदिर, या शास्त्र ग्रन्थ तो धर्मजीवन की बाल्यावस्था में केवल सहायक मात्र हैं।  साधक को कहीं रुकना नहीं चाहिए। मूर्ती पूजा सब एक  अवस्था है।  आगे बढ़ने की अवस्था में मानसिक साधना दूसरी अवस्था है। और सब से ऊपर वह अवस्था है जब ईश्वर का साक्षात्कार हो जाये। यदि कोई मनुष्य ब्रह्मभाव को मूर्ती के सहारे अधिक सरलता से हासिल कर सकता है, तो क्या उसे गलत कहना उचित  होगा? हिन्दू की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं बड़  रहा बल्कि सत्य से सत्य की ओर: यानी निम्न श्रेणीके सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की और अग्रसर है।

स्वामी जी ने एक और पहलु पर प्रकाश डाला।  अलग अलग स्त्री पुरष अपनी अपनी रुचि  के अनुसार आपने आपने इष्ट देवता का पूजन करते हैं। स्वामी  जी ने कहा ऐसी  विविधता में भी कोई दोष नहीं। विभिन्नता में एकता - यही तो प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भली भाँती पहचाना।  जितने भगत उतने ही रास्ते सब एक ही बिंदु पर एकत्रित होते हैं।  तातपर्य यह है कि मनुष्य को अपनी मानसिक प्रकृति के अनुसार अग्रसर होना है। उसी तरह आपने आपने स्वाभाव अनुसार मनुष्य इष्ट देवता, मंदिर, तीरथ, पूजा पद्दति  या विभिन्न रीती रिवाज के साथ जोड़ लेता है।  परन्तु उसे तो निरंतर प्रगति करते हुए उस मंज़िल तक पहुँचाना है जहाँ पर जा कर ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार हो जाए।  

स्वामी जी  ने यह  संवेदना भी प्रकट की  कि, "सांप्रदायिकता, कट्टरता और इससे पैदा हुए हठधर्म ने  लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़ा हुआ  हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी  ही बार  यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता।" और इस के साथ ही साथ स्वामी जी ने यह उद्घघोष किया कि, " मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।"   उन्हों ने कहा कि   आवश्यकता है एक ऐसे  सार्वभौमिक धर्म  की  जो  देश और काल से मर्यादित ना हो और जिस में हठधरम और कट्टरवाद न हो। अन्यत्र स्वामी जी ने  कहा कि अन्य धर्मों ने ज़ोर ज़बरदस्ती से विभिन्न लोगों  को आपने मत में धर्मांतरण पर मज़बूर किया है  परन्तु हिन्दू धरम ने कभी किसी को ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने की  कोशिश नहीं की। परन्तु संभावना है कि इस की विशालता को देख इस को लोग अपनाना पसंद करें।  स्वामी जी ने हिन्दू धर्म अनुयायों की संकीर्ण भावना की भतर्स्ना  भी की।  

यही  है शिक्षा और ज्ञान स्वामी विवेकानंद  का।  इस को संक्षेप में प्रस्तुत किया है।  सारांश करते हुए कहीं त्रुटि हो गई हो तो क्षमा प्रार्थना है।  पाठकों से निवेदन है की विस्तार जानने के लिए स्वामी जी का साहित्य पड़ें। अद्वैत आश्रम ((https://shop.advaitaashrama.org)  द्वारा प्रकाशित Complete Works of  Swami Vivekanand अंग्रेजी और हिंदी भाषा में सुलभ हैं। विभिन्न विषयों पर लघु पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।  जैसे कर्मयोग,  ज्ञानयोग, भक्तियोग, राजयोग, Lectures From Colombo to  Almora इत्यादि।  स्वामी जी को सही समझना हो तो उन के जीवन के बारे में जानना  सही रहे गा।  

स्वामी जी का जीवन


स्वामी विवेकानंद  को बचपन से ही में बहुत जिज्ञासा थी ईश्वर को जानने की।  बचपन से ही यह संस्कार थे।  प्रगाढ़ बुद्धि के मालिक थे।  ईश्वर को जानने के लिए सब प्रयास और प्रयोग करने को आतुर थे और करते भी रहते थे।  ब्रह्म समाज का भी आसरा लिया। कई सन्त महात्माओ से वार्तालाप किया;  ज्ञान पढ़ा, विज्ञान पढ़ा, दर्शन शास्त्र भी पढ़ा और योग साधना भी की।  परन्तु मार्ग सही तब मिला जब गए ठाकुर रामकृष्ण परमहंस की शरण में।  ठाकुर का अक्षर ज्ञान तो मालूम नहीं लेकिन उनकी साधना बहुत सही थी एवं निष्ठा दृढ़ थी।  उन्होंने नरेंदर (स्वामी विवेकानंद जी का बचपन का नाम) को आश्वस्त किया कि  ना केवल वह  खुद भगवान् के बारे में जानते  हें  बल्कि नरेंदर को भी दर्शन करा सकते हैं । जिज्ञासु  नरेंदर   ने उनको अपना गुरु धारण करने के बावजूद कई बार उन्हें परखा परन्तु ठाकुर की साधना और ज्ञान के आगे वह नतमस्तक हो गए और सही ज्ञान अर्जित किया ।  ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने आपने जीवन काल में हिन्दू धर्म  की विशालता को पहचाना; सब मत मतान्तरों के अनुसार जीवन व्यतीत किया और जिज्ञासू  नरेंदर  को सही राह दिखाई जिस का प्रतिभिम्ब स्वामी  जी के  शिकागो भाषण और जीवन पर्यन्त प्रत्यक्ष हुआ।

16.08.1886 को ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी ने देह त्याग दी।  उस के पश्चात स्वामी जी भारत भ्रमण  पर निकले।  उन्हों ने बड़ी संजीदगी से जाना कि  भारत में कितना अंधविश्वास है और गरीबी है परन्तु धर्म के प्रति आस्था भी है। स्वामी जी ने महसूस किया की भारत में जनसाधारण का जीवन बहुत दयनीय स्थिति  में था। स्वामी जी  कुछ करना चाहते थे।  उन्हों ने  महसूस किया कि भारत में  जनता को धर्म का सही रूप समझाना है और उनको कृषि और इंडस्ट्री को भी सुधार लाना है।     

सितम्बर 1893 में अमरीका के शहर शिकागो में आयोजित World Parliament of Religion का आयोजन हो रहा था।  स्वामी जी ने उस में जाकर हिन्दू धर्म और भारत का  पक्ष रखना उचित समझा।  स्वामी जी का सन्देश बहुत पसंद किया गया।  तत्पश्चात स्वामी जी ने साढ़े तीन वर्ष अमेरिका और यूरोप में बिताये जहाँ उन्हों ने वेदांत के ऊपर बहुत प्रवचन दिए।  पश्चिम के इस दौर में  बहुत महत्वपूर्ण विदेशी उन के शिष्य एवं मित्र बन गए।  इन में एक थे श्री गोडविन जिस ने स्वामी जी द्वारा दिए गए हरेक भाषण को लिखित रूप दिया और यही  कारण है कि आज हमें स्वामी जी  शिक्षा एवं विचार उपलब्ध हैं।  गोडविन स्वामी जी के साथ भारत में भी रहे। 

जनवरी 1897 में स्वामी जी भारत वापिस आये।  कोलोंबो से अल्मोड़ा तक की अपनी यात्रा में उन्हों ने भारत की सोइ हुई आत्मा को जागृत करने के लिए अनमोल भाषण दिए जिन का संकलन उपलब्ध है उन की पुस्तक: Lectures From Colombo to  Almora. इस प्रकार स्वामी जी का साहित्य के तीन पक्ष हैं: उनके World Parliament of Religion में दिए गए भाषण, यूरोप और अमेरिका में दिए गए भाषण और Lectures From Colombo to  Almora. 

स्वामी जी ने रामकृष्णा मठ  और रामकृष्णा मिशन की स्थापना की। कोलकत्ता में  बेलूर मठ  की और देश विदेश में रामकृष्णा मठ  और रामकृष्णा मिशन के केंद्र स्थापित किये जिन में से प्रमुख हैं: बेलूर मठ कोलकत्ता, राम कृष्ण मिशन, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर, मसूर इत्यादि।  स्वामी जी का साहित्य  अद्वैत आश्रम (https://shop.advaitaashrama.org) से  उपलब्ध है. पाठक समय निकाल कर इन केंद्रों में जा कर लाभान्वित हो सकते हैं।  

3 comments:

  1. Already published in Seema Sandesh on 12.01.2021 and Daink Purvodhay Guwahati on 13.01.2021

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  2. very good knowledge. I am , however, not clear about the use of words वेद घोषणा करते हैं I felt these do not go well in the right up.

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  3. हिन्दू को परिभाषित करना आसान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है की Hinduism embraces many diverse forms of beliefs, faiths, practices & worships and is not easy to define. Swami based his views / beliefs basically on Vedas as ultimate source of knowledge.

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