Monday, June 20, 2022

पतंजलि योग सूत्र

 पतंजलि योग सूत्र 

Seema Sandesh, Sriganganagar 21.06.2022


अन्तराष्ट्रीय  योग दिवस की आप सब को शुभ कामनायें। योग विश्व को भारत की एक अनूठी भेंट है। 200 वर्ष भारत में राज करने के दौरान अंग्रेज़ भारत से सम्पति लूटते रहे। कहीं भारत के आध्यात्म को सीख लिया होता तो विश्व शांति की और अग्रसर हो गया होता।  परन्तु देर आये दरुस्त आये। अब योग का प्रचलन विश्व भर में हो रहा है। विडम्भना यह है कि  भारत में भी जनसाधारण में योग अब ज़यादा प्रचलित हुआ है जब पश्चिम के देशों और अमरीका में इस को मान्यता मिली। इस से पहले तो यह कुछ योग केंद्रों तक सीमित था।  वर्तमान काल में स्वामी रामदेव और श्री श्री रवि शंकर जैसे गुरुओं के प्रयासों से योग का प्रचार और प्रसार जन जन तक पहुंचा है। 


योग के वैश्वीकरण का प्रमुख कारण है कि इसे शारीरक स्वास्थ्य के लिए सही व्यायाम समझा जाता है।  योगासन करना ही योग समझ लिया जाता है।  असल में योग केवल योगासन नहीं।  योग का  भारत के बहुत से ग्रंथों में ज़िक्र है।  भगवद गीता के 18 के 18 अध्यायों  के नाम में योग शब्द है: अर्जुन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान योग, ध्यान्योग, भक्ति योग इत्यादि। गीता के अनुसार कर्म की कुशलता का नाम ही योग है।  परन्तु योग के बारे में विशेष ग्रन्थ है पतंजलि योग सूत्र जिसमें ऋषिजी  ने सुन्योजित ढंग से इस की व्याख्या की है और इस को विज्ञान का रूप दे दिया है।  


पतंजलि ऋषि के अनुसार योग एक अनुशासन हैं जिस के द्वारा  मन की वृतियों का निरोध करना ही योग है। मन बहुत चंचल है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन  को काबू करने का अनुशासन ही योग है।  और यह अनुशासन कोई पुस्तक पढ़ कर हासिल नहीं होता या कोई ज्ञान प्रवचन  सुन कर नहीं होता।  इस के लिए तप और स्वाधयाय आवश्यक है और वह भी दीर्घ काल तक, निरंतर अभ्यास करते रहना है और इस अभ्यास को सत्कार सहित और वैराग्य से  करना है। योग के पथ पर सफलता, किये गए अभ्यास  और ईश्वर कृपा पर निर्भर करती है। सफलता का अर्थ है चित्त का संयमित  हो जाना। 


महर्षि  पतंजलि ने योग के लिए आठ अंगों का मार्ग सुझाया है जिसे अष्टांग योग   कहते हैं।  यह हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। वैसे तो योग के आठ अंगों का वर्णन नियमित क्रम से दिया गया है परन्तु श्री श्री रवि शंकर के मतानुसार इनका अनुसरण  अनुक्रमिक ढंग से अनिवार्य  नहीं हैं। आपका कथन है कि जैसे कुर्सी के एक पैर को खींचने से पूरी कुर्सी आपके पास आ जाती है, वैसे ही इन आठ  अंगों में से किसी एक को मजबूती से पकड़कर अभ्यास शुरू हो जाता है और आप योग के मार्ग में मजबूती से स्थापित हो जाते हैं। 


मन को समाधि  तक लेकर जाने की साधना और उसी अवस्था में स्थितप्रज्ञ होने का नाम ही योग है।  साधना उसकी की जाती है जिस के बारे में ध्यान किया जाए।  ध्यान उस का किया जाता है जिस को धारण कर लिया जाए। और मन में कुछ  धारण करने के लिए अन्तरमुखी  होना आवश्यक है।  इस लिए प्रत्याहार (अन्तरमुखी होना), धारणा, ध्यान और सामधि  मिल कर मन को संयम करने की एक साधना है।  संयमी मनुष्य योगी है और सब  कुछ   हासिल कर सकता है।  


संयम के इस पथ पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम सहायक सिद्ध होते हैं। सर्वप्रथम निरोगी काया का होना अनिवार्य है।  निरोगी काय वाला प्राणी ही सही आसान में बैठ कर साधना कर सकता है।  इस लिए योग में आसन का महत्त्व है।  प्राण जीवन का आधार हैं।  श्वास चल रही है तो जीवन है। सांस विभिन्न भावनाओं से जुड़ी हुई है। क्रोध में श्वास धौंकनी की तरह चलता है।  चिंताग्रस्त मनुष्य का सांस डूबने लगता है।  वह ठंडी आहें भरता है। बाईं   नासिका से चलने वाला श्वास ठंडक प्रदान करता है दाईं नासिका का श्वास गर्मी प्रदान करता है। मन को श्वास से नियंत्रित किया जा सकता है।  श्वास प्रश्वास की सही क्रिया का नाम ही  प्राणायाम है और इस को किसी समर्थ गुरु से सीखना चाहिए और सिखाये गए प्राणायाम का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।  


कितने भी आसन प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि कर लो, जब तक नियत ठीक नहीं  मन की चंचलता बनी रहेगी और योग नहीं होगा।  मन अगर विषय विकारों से भरा हुआ है, काम क्रोध, लोभ मोह में फसा रहता है, चोरी चकारी, धोखा धड़ी, झूठ खसूठ और व्यभिचार घर कर गया है तो कहाँ राहत मिलेगी।  मात्र सुबह शाम का योग आसन व्यायाम कर लेने से योग नहीं हो जाता। प्रार्थना भी अच्छी से अच्छी हैं।   शब्द तो बहुत अच्छे हैं: “विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, दुःख दूर करो देवा; श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा प्रेम बढ़ाओ सन्तन  की सेवा।”  परन्तु इस को  तोते की तरह सुबह शाम रटने से क्या फायदा अगर इस के ऊपर अमल ही नहीं किया तो। कोई आचार संहिता तो होनी चाहिए।   पतंजलि महाऋषि  ने बहुत वैज्ञानिक तरीके से आचार संहिता दी है। 


पतंजलि ने व्यक्तिगत नैतिकता के लिए  पांच नियम दिए और  सामाजिक नैतिकता के लिए पांच यम।  पांच यम हैं: सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचार्य, अस्तेय और अपरिग्रह।  पांच नियम हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।  कहने को तो यह 10 शब्दों की आचार संहिता है परन्तु इनका पालन कर लिया जाए तो मानव समाज पृथ्वी पर ही स्वर्ग का अनुभव कर सकता है।  महात्मा गाँधी ने मात्र सत्य और अहिंसा का निष्ठा पूर्वक पालन किया था और वह राष्ट्रपिता बन गए।  इन का विस्तार से ज़िक्र करने के लिए अलग से लेख लिखना उचित रहेगा।  परन्तु क्या रखा है शब्दों में इन्हे परोने से।  फायदा तो इनको निष्ठापूर्वक पालन करने में ही है।  इस लिए किसी अच्छे गुरु की शरण लेकर इन को  समझना चाहिए और निष्ठा  पूर्वक इन का अभ्यास करना चाहिए।  


धीरज रखिये। योग के मार्ग पर तुरंत कुछ हासिल नहीं होता।  योग के मार्ग पर धीरज रख कर सत्कार सहित अभ्यास करते चलिए। सत्य का व्रत लें, अस्तेय (चोरी ना करने)  का व्रत लें, अपरिग्रह (ज़रुरत से ज़्यादा संग्रह ना करने) का व्रत लें। शुरू शुरू में व्रत लें कि अगले 10 दिन तक झूठ नहीं बोलूंगा, चोरी और भ्रष्टाचार नहीं करूँगा, ग्राहक को ठीक सौदा  दूँगा।  फिर धीरे धीरे इस अवधि को बढ़ाते चलें।  धीरे धीरे सफलता हासिल होगी।  पतंजलि महर्षि ने सुझाया है कि शुरुआत क्रिया योग से करो।  इस का अर्थ है तीन नियम: तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।  तप का अर्थ है धीरज रख कर कठिनता का सामना करना।  स्वाध्याय मतलब जागरूक होना।  सत्संग से और आत्म चिंतन से जागरूकता आती है।  और ईश्वर प्रणिधान मतलब ईश्वर के प्रति आस्था और  भक्ति को बनाये रखो सफलता अवश्य आप के कदम चूमेगी।  आप सब का कल्याण हो। यही शुभेच्छा है।  जय गुरुदेव।


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 












Thursday, June 2, 2022

धर्म, समाज, संस्कृति और राजनीति

 धर्म, समाज, संस्कृति  और राजनीति


Seema Sandesh, Sriganganagar 02.06.2022


समाज में आजकल धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है। आइये समझने की कोशिश करते हैं कि धर्म क्या है, धर्म आधारित संस्कृति और समाज क्या है,   धर्म कैसे हठधर्म बन कर संस्कृति को विकृत करता है और धर्म  के नाम पर कैसे और क्यों राजनीति होती है। 

व्यक्ति को  धर्म की प्रारम्भिक राह और पहचान  विरासत में ही मिल जाती  है।  हिन्दू की  सन्तान  हिन्दू, मुस्लिम की मुस्लिम, ईसाई की ईसाई और सिख की सिख। परन्तु  धर्म की गहराई   गुरु शिष्य परम्परा से सुलभ होती है।  गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर ही मनुष्य सही परम्परा से धर्म मार्ग पर  अग्रसर होता है।  एक ही   परम्परा का पालन करने वाले सम्प्रदाय   बन जाते हैं।  भारत में धर्म आधारित मुख्य परम्पराऐं  हैं हिन्दू (78%), मुस्लिम (18%) और  ईसाई (2%)। अन्य समुदाय हैं बौद्ध, जैन, सिख और पारसी।  

गुरु दक्षिणा प्राप्त  कर भी मनुष्य एक परम्परा को तो पकड़ लेता है परन्तु गहराई को वह अपनी साधना के आधार पर ही पाता है। ईश्वर सत्य  की उच्चतम अवधारणा  है।   ईश्वर सृष्टि के कण कण में विराजमान है। प्रकृति में है, प्रकृति के बाहर नहीं।   दिव्यता  प्रकृति का सार है।   ईश्वरीय स्वभाव हर इंसान, हर बच्चे में मौजूद हो। इसे कैसे प्रकट करें? इसे कैसे प्रकट करें? यही धर्म का विज्ञान है। हजारों मनुष्यों में कोई एक ही परमात्मा की  प्राप्ति अर्थात सत्य की खोज के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में से भी कोई एक परमात्मा के  परायण होकर परमात्मा को   तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है (भगवद गीता अध्याय- 7     श्लोक- 3)। अधिकाँश लोग तो सिर्फ नाम से ही धर्म के अनुयायी होते हैं: अधिकाँश के ऊपर यह  मोहर है कि  वह अमुक धर्म के माता पिता के घर जन्मे और कुछ के ऊपर धर्म की यह मोहर है कि वह अमुक धर्म गुरु अर्थात परम्परा का अनुसरण कर रहे हैं और उस सम्रदाय के अनुसार रहन सहन,  पहरावे और पूजा पाठ  करते हैं। असल में अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला तो कोई विरला ही होता है।  कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई सत्य यानी परमात्मा वास्तव में जान पाता है। 

धर्म के दो आयाम हैं: नैतिक आयाम और वैज्ञानिक आयाम। नैतिक आयाम वह धर्म है जिसमें आप पैदा हुए हैं। इसमें आपकी कोई पसंद नहीं। आप सिर्फ एक विशेष परिवार में पैदा हुए हैं ईसाई, हिंदू, मुस्लिम, या कुछ भी। लेकिन वैज्ञानिक आयाम वह है जब आप स्वयं  उसे खोजते हो। बिना खोजे कोई विज्ञान नहीं है। तो जब आप धार्मिक होना चाहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप आध्यात्मिक हो जाते हैं। विज्ञान सार्वभौम है। इसी तरह आध्यात्मिक सत्य सार्वभौमिक हैं। कोई एक विशेष धार्मिक संप्रदाय या क्षेत्र में पैदा हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक होने के कारण  सार्वभौमिक होने के लिए विकसित होता है। यही धर्म का वैज्ञानिक आयाम है जो साधना  से आता है। केवल एक विशेष परंपरा में पैदा होने से आपको यह नहीं मिलता है।

 

आध्यात्मिक स्तर पर धर्म हर व्यक्ति की परमात्मा और प्रकृति के प्रति उस की व्यक्तिगत धारणा, आस्था और विश्वास है।   उस आस्था और विश्वास के आधार पर परमात्मा की प्राप्ति के लिए उस के प्रयास, उस की साधना, उस के भाव और भावनाएं, उस का व्यवहार, उस के रीति रिवाज़:   इन सब के  समूह को उस का व्यक्तिगत धर्म या धर्म आधारित व्यवहार कह सकते हैं।  इस लिहाज से देखा जाए तो हर व्यक्ति का आपना आपना धर्म हो सकता है और इस में कोई ऐतराज भी नहीं होना चाहिए।   प्रकृति ने हर मनुष्य को अलग रूप और रंग और स्वाभाव दिया है। कोई किसी से मिलता नहीं।   कोई आस्तिक हो सकता है तो कोई नास्तिक।  किसी के लिए परमात्मा निर्गुण निराकार है और किसी के लिए सगुण  साकार।  कोई मूर्ती पूजा करता है तो कोई पुस्तक  पड़ता है।  कोई सत्संग कीर्तन करता है तो कोई गुफा में बैठ कर साधना करता है।  कोई पूजा अर्चना करता है तो कोई इबादत करता है। 

परम्परा प्राय रूढ़िवादी होती है। परन्तु बदलते समय के साथ इस में सुधार अपेक्षित रहता है।   अनुसंधान सभी परंपरा का हिस्सा बना रहे तो यह सामयिक हो जाती हैं। जब परंपरा इन चीजों को खो देती है तो वह कट्टरता या हठधर्म  होने लगती है। कोई धर्म वैर भाव नहीं सिखाता।  परन्तु हठधर्म के कारण अलग अलग सम्प्रदाय कुएँ के मेंढक बन जाते हैं और एक दुसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लग जाते हैं।  सम्प्रदायिक  झगड़ों की नींव यहीं से रखी जाती है।  अध्यात्म और धर्म स्वयं इन सभी संघर्षों से परे है। यह शांति, प्रेम और सद्भाव के लिए है। परन्तु जब यह सामाजिक राजनीतिक ताकतों से प्रभावित होता है और इसके आगे झुक जाता है तो यह संकीर्ण और रूढ़िवादी  बन जाता है जिससे संघर्ष, असहिष्णुता हिंसा और यहां तक कि विज्ञान की भावना का भी दमन होता है। इसे ही धर्म का अनैतिक आयाम कहा जाता है। समाज में आजकल जो धर्म को लेकर काफी वाद विवाद, लड़ाई झगडे और राजनीति चल रही है वह इसी अनैतिक आयाम का प्रभाव है। आवश्यकता है आध्यात्मिक बनने की।  आइये विज्ञान के इस युग में धर्म के वैज्ञानिक आयाम का अनुसरण कर अध्यात्म को प्राप्त हों और हठधर्म का त्याग करें और धर्म को राजनीति से तो हमेशा दूर  रखें। ऐसी शुभकामना है। 

 

सतीश कालड़ा, बैंगलोर 

iamsatishkalra@gmail.com