प्रकृति और परमेश्वर
भाग-1
वैदिक दर्शन में प्रकृति को मिथ्या कहा गया है। शंकराचार्य के कथन अनुसार, “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या जीवोब्रमैहव नापरह,” अर्थात् -- ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म ही है। क्या सच में जीवन मिथ्या है। सामान्य प्राणी के लिए जीवन एक संघर्ष है। उसे भूख लगती है, प्यास लगती है। सर्दी गर्मी लगती है। भूख से मरता हुआ इंसान और कड़ाके की सर्दी में फुटपाथ पर सोने को मजबूर इंसान कैसे कह सकता है कि जगत मिथ्या है। उस को ज़िंदा रहने के लिए दुःख दर्द सहना पड़ता है। भौतिक दुःख के समाधान के लिए पुरषार्थ करना अनिवार्य है। इस को मिथ्या कह कर जीवन जीना संभव है क्या? विज्ञान ने प्रकृति को समझा और भौतिक दुखों का समाधान करने का प्रयास किया है।
मिथ्या वह है जिस का अस्तित्व नहीं । प्रकृति के दो संघटक हैं: पदार्थ (matter) और ऊर्जा। विज्ञान मानता है कि पदार्थ और ऊर्जा दोनों को ना ही बनाया जा सकता है ना मिटाया जा सकता है। इनकी मात्रा जितनी है उतनी ही रहती है। बस इन के रंग रूप बदल सकते हैं। जैसे कि पदार्थ कभी ठोस, कभी तरल और कभी गैस या वायु रूप में हो सकता है। कुछ पदार्थ मिल कर नया रंग रूप ले सकते हैं। यह बदलाव भौतिक भी हो सकता है और रासायनिक भी। इसी तरह से ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं: उष्णता, प्रकाश, ध्वनि, विधुत, चुंबकीय शक्ति इत्यादि। इस लिहाज से देखा जाए तो प्रकृति का अस्तित्व तो है। हाँ हम यह कह सकते हैं कि यह परिवर्तनशील है। तो जगत मिथ्या कैसे? शायद इस लिए कि प्रकृति में इस के घटको से कई रंग रूप बनते रहते हैं और बिखरते रहते हैं। हर चीज़ जो बनती है बिखर भी जाती है। इस लिए प्रकृति के घटको से बनी हुई कोई चीज़ स्थाई नहीं। शायद इस लिए परिवर्तनशील जगद को मिथ्या कहा गया है।
यह भी कहा जाता है कि प्रकृति जड़ है। जड़ मायने मृतप्राय। विज्ञान भी इस को मानता है। महान वैज्ञानिक नयुटन के अनुसार प्रकृति में जो पदार्थ जिस स्थिति में है वह तब तक उसी स्थिति में रहेगा जब तक कि किसी बल द्वारा उस को उस स्थिति से परिवर्तित ना कर दिया जाए। तो प्रकृति में इतनी हलचल कैसे। और जो हलचल है वह भी बहुत सुनियोजित है। प्रकृति तो ऐसा लगता है कि जीता जागता जीव है। ऊपर गगन विशाल जिस में अनगिणत सूर्य, चंद्र और तारागण और आकाश गंगा। हमारा सूर्य तो जैसे जीवन का आधार है जिस के इर्द गिर्द हमारी धरती परिक्रमा करती रहती है और दिन रात और सर्दी गर्मी इत्यादि ऋतुओं को बनाती है। सूर्य, चांद और पृथ्वी प्रतीक हैं प्रकृति के नियमित होने का। सूर्य हमेशा पूर्व से उदय पश्चिम में अस्त। दिन के बाद रात, रात के बाद दिन। दिन रात की इस अदला बदली से समय का काल चक्र जिस में दिन महीनो में और महीने सालों में और साल युगों की गिनती में आ रहे हैं। और इसी तरह ना जाने कितने सौर मंडल हैं प्रकृति में।
और फिर हमारी पृथ्वी को देखें तो यहाँ की रचना भी अदबुद्ध। इस की कोख में ना जाने कितने खनिज और जल। पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत भाग पानी से ढका हुआ जो जीवन का आधार है। धरती को ढक रखा है वायुमंडल ने जिस में अधिकांश मात्रा में जीवनदायनी ऑक्सीजन है। यह पृथ्वी का वातावरण ही है जिस में यहाँ के तापमान और वाष्पीकरण के कारण यहाँ जीवन है: पेड़, पौधे, जलचर, नभचर, स्थावर और जंगम प्राणी। और हम सब मानव।
तो सोचने वाली बात यह है कि प्रकृति में इतना सब कुछ सुनियोजित ढंग से कैसे हो रहा है। जल, वायु, ठोस धरातल, अग्नि और आकाश से लेकर इतने खूबसूरत जीव, जन्तु, पेड़, पौधे और मानव बन रहे हैं और मिट रहे हैं। फिर इस में मानव को ही देख लो। उस में स्थूल शरीर के साथ साथ देखने की शक्ति है, सूघने की शक्ति है, सुनने की शक्ति है, स्वाद चखने की शक्ति है, स्पर्श करने की शक्ति है, सोचने समझने महसूस करने की शक्ति है, स्मरण शक्ति है, बुद्धि है, विवेक है। और मानव समाज और राष्ट्र बना कर पृथ्वी का स्वामी बना बैठा है। जड़ मिटटी से बना यह पुतला उस में इतना ज्ञान, विज्ञान और विवेक कहाँ से और कैसे।
धर्म के अनुसार प्रकृति का आधार परमात्मा है परन्तु विज्ञान परमात्मा को नहीं मानता। इस का ज़िक्र अगली कड़ी में।
सतीश कालड़ा
22.01.2022