राष्ट्रीय युवा दिवस
स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात 12 जनवरी
Seema Sandesh Sriganganagar
भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1984 को अन्तर राष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया था। तत्पश्चात भारत सरकार ने घोषणा की कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानंद जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाए।
स्वामीजी के जीवन और दर्शन में ऐसा क्या है जिस के कारण भारत सरकार ने उन्हें युवकों के लिए प्रेरणा स्रोत समझा? युवा अवस्था जोश का नाम है। जोश के साथ होश मिल जाए तो सोने पे सुहागा हो जाता है। जोशीले और संस्कार पूर्ण और युवा नरेंद्र को (स्वामी जी का सन्यास से पहले का नाम) विवेक मिला उनके गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस से जिन की शरण में वह 1881 में गए। वह युवा अवस्था में ही सकारात्मक विचारों, संस्कारों, अध्यात्म और आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। उनका जीवन अनुकरणीय प्रेरणा स्रोत है।
स्वामी विवेकानन्द ने आपने छोटे से जीवन काल में (12 जनवरी 1863 - 4 जुलाई 1902 तक -39 वर्ष) वेदान्त के प्रभावशाली गुरु के रूप में कीर्तिमान स्थापित किया। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। वेदान्त दर्शन को अमेरिका और यूरोप के कई देशों में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुँचा। भारत के जनमानस को प्रेरित किया। उन्हों ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जो आज भी अतुलनीय सेवा का काम कर रहा है। उनका आह्वान था, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
स्मरण रहे कि यह वह कालखंड था जब भारत पर अंग्रेजों का राज था और अंग्रेज भारतवासियों को हीन भावना से देखते और बरतते थे। जहां अंग्रेजों के दफ्तर, क्लब या निवास स्थान इत्यादि होते थे वहां लिखा रहता था कि वहां कुत्ते और भारतीय नहीं जा सकते। यह भारत वासियों को नीचा दिखाने के लिए किया जाता था। जब भारत में यह हाल था तो पाश्चात्य जगत में क्या स्थिति रही होगी इस का अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसे कालखंड में 1893 में अमरीका के शहर शिकागो में एक विश्व धर्म महासभा का आयोजन हुआ। स्वामी जी ने वहां जाकर भारत की सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने का विचार किया। यात्रा के लिए पैसे की कमी ही नहीं शून्यता थी। कुछ सहयोग मिला तो अमरीका पहुंच गए। वहां कोई जान पहचान नहीं। सभा में भाग लेने के लिए ना कोई औपचारिक निमंत्रण था ना ही कोई नामांकन। ऐन केण प्रकेण एक अनजान व्यक्ति के रूप में 30 वर्ष के युवा स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म महासभा के उद्घाटन समारोह में 11.09.1893 को मात्र पांच मिनट का भाषण दिया। उस से ना केवल स्वामी जी को पहचान मिली बल्कि पाश्चात्य जगत को भारत की सनातन संस्कृति का आधिकारिक परिचय मिला। यह पश्चिम के गढ़ में भारत की सनातन संस्कृति के एकाकी सैनानी ने विजय पताका फहराई थी और उस में संदेश था प्यार का, सद्भावना का, विश्व बंधुत्व का। इस को कहते हैं युवा सोच और समझ। नोबेल पुरस्कार विजेता रोमेन रोलैंड कहते हैं कि विवेकानंद ने युद्ध स्तर से ज्यादा शक्तिशाली शब्दों से पश्चिम की अन्तरात्मा को झकझोर दिया था।
विश्व धर्म महासभा के बाद स्वामी जी की ख्याति चारों और फैल गई। उनको विभिन्न संस्थानों ने व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। स्वामी जी तीन वर्ष तक अमरीका और यूरोप में रहे और उन्हों ने बहुत महत्वपूर्ण भाषण दिए जिस से पाश्चात्य जगत को वैदिक संस्कृति का परिचय मिला।
स्वामी विवेकानंद की अमरीका और यूरोप विजय यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सही सोच और विश्वास के साथ मनुष्य कुछ भी कर सकता है। इस के बाद स्वामी जी भारत आए तो उनका का बहुत स्वागत हुआ। उन्हों ने पूरे भारत का भ्रमण किया और भारत वासियों को प्रोत्साहित किया और उनके मन में स्वाभिमान और उत्साह के बीज बोए। यह भाषण उपलब्ध हैं उनकी कोलंबो से अल्मोड़ा नामक पुस्तक में। स्वामी विवेकानन्द कहते थे "मुझे कुछ युवा नर और नारी दो जो शुद्ध और निस्वार्थ हैं और मैं दुनिया को हिला दूंगा।" ऐसा ही हुआ भी। स्वामी जी से प्रेरणा लेकर देश के कई युवकों ने आज़ादी के संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभाई।
बाल गंगाधर तिलक ने तो स्वामी जी की गहराई को उनके अमरीका जाने से पहले ही पहचान लिया था। इन दो महान पुरुषों में बहुत अच्छा शास्त्रार्थ हुआ। 1857 के स्वतंत्रा संग्राम के बाद भारत वासियों के हौसले को बुलंद करने के लिए तिलक ने कहा था कि स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और यह प्रेरणा उन्हें मिली थी भगवान कृष्ण के उस संदेश से जो उन्हों ने गीता में अर्जुन को उस समय दिया था जब वह विषाद ग्रस्त था। इसी गीता रहस्य की चर्चा संभवत्य हुई होगी जब वह स्वामी जी से मिले थे क्योंकि स्वामी विवेकानंद का भी गीता में प्रगाढ़ विश्वास था।
महात्मा गाँधी ने कहा था, “मैंने उनके (स्वामी विवेकानन्द) कामों को बहुत अच्छी तरह से देखा है, और उनके माध्यम से, अपने देश के लिए मेरे मन में जो प्यार था, वह हजार गुना हो गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था "यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद का अध्ययन करें। उनमें सब कुछ सकारात्मक है और कुछ भी नकारात्मक नहीं है।" श्री अरबिंदो ने कहा: "विवेकानंद। … पुरुषों के बीच एक शेर था। जो निश्चित कार्य उन्होंने पीछे छोड़ा है वह उनकी रचनात्मक शक्ति और ऊर्जा की हमारी छाप के अनुरूप है।" पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विवेकानंद के व्यक्तित्व और गरिमा की प्रशंसा की और कहा कि उनकी पीढ़ी विवेकानंद से व्यापक रूप से प्रभावित थी। सुभाष चंद्र बोस विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। विनोबा भावे ने भारतीयों को उनकी ताकत के प्रति जागरूक बनाने में विवेकानंद के योगदान की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने उन्हें उनकी कमियों और दोषों को दिखाया और उन्हें दूर करना सिखाया।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 31 मई 2013 को मुंबई विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह दिए गए एक भाषण में भारत के राष्ट्रीय चरित्र के पुनर्निर्माण के लिए विवेकानंद के आह्वान को याद करने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी बताया: स्वामीजी ने बिना किसी हिचकिचाहट के पश्चिमी समाजों के सकारात्मक पहलुओं और उपलब्धियों की सराहना की - और हठधर्मिता से परहेज करते हुए अपनी बात रखी, वे भारत के लिए समझ और सद्भावना का एक मजबूत नया पुल बनाने में सक्षम थे। ऐसा करते हुए, उन्होंने आपसी स्वीकृति के आधार पर हमारे लोगों के बीच एक नया संवाद भी खोला। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, विवेकानंद के प्रबल प्रशंसक हैं और जीवन पर्यंत बेलूर मठ के शिष्य के रूप में स्वामी जी से प्रेरणा लेते रहे हैं। अप्रैल 2013 में, उन्होंने बेलूर मठ का दौरा किया और विवेकानंद के कमरे में ध्यान लगाया। उन्होंने आगे कहा कि "कुछ लोग हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन को एक पेशा बनाया है। पेशे को सेवा में बदला जा सकता है, लेकिन सेवा को पेशे में नहीं बदला जा सकता है। जहां तक मेरा संबंध है, स्वामी विवेकानंद मेरे लिए राजनीति में प्रवेश करने के लिए एक महान प्रेरणा थे।"
आज भी बहुत से युवक युवतिआं स्वामी जी से प्रेरणा लेकर अनूठे कार्य कर रहे हैं। एकनाथ रानडे ने कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द स्मारक का निर्माण करवाया को विश्व प्रसिद्ध है। डॉ आर बालासुब्रमण्यम ने युवा अवस्था में स्वामी का साहित्य पढ़ने के पश्चात स्वामी विवेकानंद युवा आंदोलन, मैसूर (एसवीवाईएम) की स्थापना की। यह संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा और सामुदायिक विकास में अपने जमीनी स्तर से लेकर नीति-स्तर की कार्रवाई के माध्यम से भारत में एक नए नागरिक समाज के निर्माण में लगा हुआ है। स्वामी विवेकानंद स्टडी सर्किल की स्थापना वरिष्ट अधिकारी श्री चंद्र शेखर तलवार ने की जिस की शाखाएं लुधियाना, बठिंडा, श्रीगंगानगर, अमृतसर और चंडीगढ़ में हैं।
कहते हैं कि प्रसिद्ध अन्ना हजारे भारतीय सेना में ड्राइवर की नौकरी में थे। किसी वह जीवन से परेशान हो गए। उन दिनों उन्हें सौभाग्यवश स्वामी विवेकानंद साहित्य पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ जिस से उनके जीवन में उत्साह उत्पन हुआ और उन्हों ने अपना जीवन समाज सुधार के कार्यों में लगा दिया।
स्वामी जी का साहित्य पढ़ने योग्य है। उनके प्रवचन पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और देश प्रेम और सकारात्मक सोच रग रग में भर जाती है। आईये स्वामी विवेकानंद जयंती पर स्वामी जी का साहित्य को हासिल करें, पढ़े और उस से लाभान्वित हों। यह अद्वैतआश्रम से ऑनलाइन भी उपलब्ध है। https://shop.advaitaashrama.org. निम्नलिखित पुस्तकें बहुत लाभदायक हैं: विवेकानंद की जीवनी; राजयोग; स्वामी विवेकानंद साहित्य: संचयन; मेरा भारत अमर भारत।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
12.01.2022