Thursday, December 9, 2021

 क्या हमारी सनातन संस्कृति बादलों की तरह छिन्न-भिन्न होकर नष्ट तो नहीं हो जाएगी?





दुनिया में तीन धर्म सब से पुरातन हैं: भारत में हिन्दू धर्म, इसराइल में यहूदी धर्म और एशिया में पारसी धर्म। यहूदी संस्कृति से उसमें से ही उपजी ईसाई संस्कृति का तालमेल न रह सका और फिर ईसाई धर्म पूरे यूरोप में फ़ैल गया और उस के बाद हर उस जगह जहां यूरोप के देशों ने राज किया। यहूदी अब केवल इजरायल में ही सीमित हैं।  पारसी ईरान में बहुत उच्च संस्कृति थी। परंतु अब उस के अवशेष के रूप में कुछ लोग ही बचे हैं जिन्हो ने भारत में शरण ले ली थी। हिन्दू संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जिस पर गत 10,000 वर्षों से अनेकानेक प्रहार हुए परंतु हर प्रहार के उपरांत यह और भी सशक्त होकर उभरी। 


हिन्दू संस्कृति ने 10,000 साल तक तो यह प्रहार झेल लिए। यहां तक कि 1000 साल के मुगल और अंग्रेजी शासन काल में भी हिन्दू अपनी संस्कृति पर कायम रहे। परंतु 1947 में देश की आजादी के बाद हिंदू संस्कृति पर प्रहार कुछ इस गौण तरीके से हो रहे हैं कि आजकल समाज शास्त्री बहुत चिंता में हैं। चिन्ता का विषय है कि हिन्दू आपने धर्म  के बारे में जागरूक नहीं और ईसाई और मुसलमान हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने में लगे हैं। भारत ही एक ऐसा देश है जिस में हिन्दू बहुसंख्या में हैं। 1947 में देश का एक बड़ा भाग धर्म के आधार पर अलग कर दिया गया और वहां पाकिस्तान और बंगला देश में हिन्दू नाम मात्र रह गए हैं। अफगानिस्तान लाहौर और कसूर जो कभी हिंदुओं के मूल स्थान हुआ करते थे अब वहां हिंदुओ का नामो निशान नहीं। कश्मीर से भी हिंदुओं को निकाल दिया गया है। इसी तरह से  बंगाल और केरल में भी हिन्दू संस्कृति पर प्रहार जारी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में कई जिले ऐसे हैं जिन में हिंदुओं का रहना दूभर है। उत्तर पूर्व भारत के राज्य मेघाल्या, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड के अधिकांश आदिवासी ईसाई हो गए हैं। अब तो पंजाब में भी बहुत लोगों को ईसाइयों ने प्रलोभन दे दे कर ईसाई बना दिया है। दूसरी तरफ जैन, बौद्ध और सिख आपने आप को हिन्दू धर्म से अलग पहचान रखने के लिए प्रतनशील हैं। 


हिन्दू धर्म के तथाकथित गुरु गीता जैसे महान ग्रंथ का प्रचार करते हुए कह रहे हैं, "क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? ... जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। ...तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो?...परिवर्तन संसार का नियम है।...जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा।" यह सब खतरे को देख कर आंख बंद कर लेने जैसी बात है। गीता तो मुर्दे में जान डाल देती है। गीता का यह सार ना जाने किस नपुंसक ने निकाला है। 


हिन्दू किसी का धर्म परिवर्तन करने में विश्वास नहीं रखते। परंतु अन्य धर्म प्रलोभन दे कर या जबरदस्ती हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने में कार्यरत हैं। आधुनिकता के इस दौर में नई पीढ़ी बिना धर्म परिवर्तन के ही अपनी परंपरा से विमुख हो रही है। क्लब कल्चर, पार्टी करना, आपने आप को आधुनिक कह कर धर्म को अंधविश्वास और रूढ़ीवाद कहना आम हो गया है। इस के चलते ना तो किसी पारिवारिक परंपरा का पालन किया जाता है और ना ही किसी धर्मग्रंथ का पठन पाठ। अब शादी विवाह धार्मिक अनुष्ठान ना रह कर खाने पीने के इवेंट बन कर रह गए हैं। जन्म दिवस और तीज  त्योहार भी खाने पीने और शोर शराबे की परंपरा लेते जा रहे हैं। किसी न किसी बहाने से शराब और मीट मास का चलन आम हो गया है। हवन यज्ञ और पूजा पाठ का तो उपहास भी हो जाता है।


क्या हमारी सनातन संस्कृति बादलों की तरह छिन्न-भिन्न होकर नष्ट तो नहीं हो जाएगी? भगवान ना करे ऐसा हो। इस लिए आवश्यकता है हिंदुओं को अपनी आस्था पर कायम रहने की। यह तभी संभव है अगर हमें अपनी संस्कृति का सही ज्ञान हो और उस पर चलने में आस्था रहे।


सनातन धर्म की नींव रखी थी ऋषियों और मुनियों ने। विज्ञान भी वैदिक अनुसंधान को सही मानता हैं। बल्कि स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि विज्ञान अभी तक वैदिक काल के अनुसंधान की परछाई भी नहीं पा सका। इतनी वैभवशाली संस्कृति से विमुख होना मूर्खता से कम नहीं। मात्र योग, आयुर्वेद और एस्ट्रोलॉजी को ही देख लो। जिस को इस का थोड़ा भी अनुभव होता है वह आपने आप को धन्य मानता है। जर्मनी के दार्शनिक वैदिक दर्शन से अभिभूत रहे। 


आइए हम फिर से अपनी सनातन संस्कृति के मर्म को पहचाने और इस की गरिमा का फिर से सही प्रचार प्रसार और पालन कर ठोस आधार दें। आगे की कुछ किश्तों में मैं आपने अनुभव के आधार पर कुछ तथ्य पेश करना चाहूंगा जिस से हम अपनी सनातन संस्कृति में आस्था को कायम रख सकें। 


सतीश कालड़ा

बैंगलोर 

06.12.2021