श्री श्री रविशंकर कृत
आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के 40 वर्ष
आर्ट ऑफ़ लिविंग नाम से प्रसिद्ध जीवन शैली गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी द्वारा सिखाई जाने वाली एक जीवन जीने की कला है जिस का प्रशिक्षण विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के द्वारा दिया जाता है। इस के प्राथमिक और मुख्य कार्यक्रम में सुदर्शन क्रिया का प्रशिक्षण दिया जाता है। कहते हैं कि गुरुजी को इसका अनुभव वर्ष 1981 में हुआ। तब वह 25 वर्ष की आयु के थे। उन को इस से इतने आनंद की अनुभूति हुई कि उन्होंने इसे सब को सिखाने का संकल्प लिया और नवंबर 1981 आर्ट ऑफ लिविंग संस्था की स्थापना की।
आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स करने के पश्चात् मुझे महसूस हुआ कि यह योग सीखने की सही प्रक्रिया है। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग अनुशासन और इस से संभावित संयम तक के सफर के लिए यह सही शुरुआत थी। अष्टांग योग के आठ अंग हैं: पांच यम, पांच नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि। सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह योग के पांच यम हैं और शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान योग के पांच नियम हैं। सत्य और अहिंसा: केवल दो नियमों का व्रत ले कर और सही पालन कर महात्मा गाँधी महात्मा बन गए थे और उन्हों ने देश को आज़ाद करवाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। योग को सही ढंग से सीख कर अनुभूति हासिल करनी हो तो समर्थ गुरु की शरण लो, किताबें पढने से कुछ हासिल नहीं होता। गुरुदेव रवि शंकर जी द्वारा स्थापित आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के प्रशिक्षण इस के लिए बिलकुल सही विकल्प हैं।
गुरूजी ने योग रूप जीवन जीने के तीन सूत्र दिए हैं: साधना, सत्संग और सेवा। साधना मतलब जो सुदर्शन क्रिया और ध्यान मैडिटेशन सीखी है उस का निरंतर और श्रद्धा पूर्ण अभ्यास दीर्घ काल तक करते रहना। सप्ताह में एक बार सामूहिक अभ्यास का प्रावधान है जो देश के लगभग सभी शहरों और कस्बों में सुलभ है और विदेश में भी लगभग सब महत्वपूर्ण शहरों में उपलब्ध है। इसी तरह से आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्रद्धालु सप्ताह में कम से कम एक बार सत्संग कीर्तन भी करते हैं और जहाँ कहीं अवसर मिले सेवा करने को भी तत्पर रहते हैं।
किसी भी सीख का अनुकरण तभी होता है जब सिखाने वाला स्वयं उस पर सच्चाई से चले। मैं 2013 से आर्ट ऑफ़ लिविंग के बैंगलोर स्थित आश्रम में रह रहा हूँ। व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी का व्यक्तिगत जीवन उन के द्वारा प्रशिक्षित सूत्रों का जीवंत उदाहरण है। संस्था में हर जाती, रंग, सम्प्रदाय और देश के लोगों को बिना किसी भेद भाव के सम्मान सहित स्वीकार किया जाता है। ना केवल स्वीकार किया जाता है बल्कि सब को आश्रम आपने घर जैसा ही लगता है। गुरूजी की कोशिश होती है की वह हर किसी को व्यक्तिगत समय दे सके। अधिकाँश श्रद्धलुओं का अनुभव है कि गुरूजी को वह अपनी व्यक्तिगत दुःख तकलीफ या ख़ुशी सांझा कर सकते हैं। गुरु जी पूर्णतया वर्तमान में रहते हैं और ना तो भूतकाल का भार मन में रखते हैं और ना ही भविष्य के ख्याली पुलाव बुनते हैं। उन से जो भी मिलता है उस को वह 100% ध्यान देते हैं। साधना, सत्संग और सेवा की तो आप जीती जागती उदाहरण हैं ही। आश्रम में वेद विज्ञान महा विद्या पीठ के सौजन्य से निरंतर हवन यज्ञ होते रहते हैं। इस संस्थान में स्तानक स्तर का प्रशिक्षण पाने के लिए लगभग 200 विद्यार्थी हैं और बहुत विशिष्ट आचार्य भी हैं। आश्रम में हर सोमवार को रूद्र पूजा और शुक्रवार को देवी पूजा होती है। नवरात्री और शिवरात्रि यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं। रोज़ शाम को आश्रम में सत्संग होता है जिस में 1000 से 10000 लोग होते हैं और गुरु जी अगर आश्रम में हों तो सत्संग में अवश्य समय देते हैं और श्रद्धालुओं के प्रश्नो के उत्तर देते हैं। गुरूजी द्वारा बहुत से महत्वपूर्ण सेवा प्रकल्प किये जा रहे हैं जिन का ज़िक्र आश्रम के वेबसाइट पर उपलब्ध है।
गुरूजी ने कुछ आचार्यों को प्रशिक्षित किया। उन से इस का और विस्तार हुआ। आजकल हज़ारों अधिकृत प्रशिक्षक हैं जो आर्ट ऑफ़ लिविंग का प्रार्थमिक कोर्स करवाते हैं। यह कोर्स करने के लिए बैंगलोर आश्रम में आना आवश्यक नहीं। हर शहर और कसबे में उपलब्ध है। एडवांस कोर्स के लिए भी सैंकड़ों प्रशिक्षक हैं। संस्था के सेवा प्रलकल्प का विस्तार आयुर्वेद चिकित्सा, खेती बाड़ी और ग्राम विकास, शिक्षा, सिंचाई परियोजना, महिला सशक्तिकरण और युवा कल्याण आदि क्षेत्रों में हो चूका है। आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के ध्वज तले कई और संस्थान हैं जैसे कि: श्री श्री आयुर्वेदा हस्पताल और कॉलेज, बैंगलोर; श्री श्री यूनिवर्सिटी, भुबनेश्वर; श्री श्री विद्या मंदिर ट्रस्ट के तहत बैंगलोर, कोलकत्ता और मुमबई में बहुत उम्दा स्कूल हैं; श्री वेद विज्ञान विद्या ट्रस्ट; श्री श्री गौशाला ट्रस्ट इत्यादि।
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर वर्तमान समय में भारत के सुप्रसिद्ध एवं महान संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर आपकी सही सूझ और पकड़ है। हाल ही में राम जनम भूमि मसले को हल करने के लिए उच्चतम न्यायलय ने उनकी सलाह ली थी। विदेशों में भी गुरुदेव ने शांति स्थापना के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं जिन का ज़िक्र संस्था की वेबसाइट में उपलब्ध है।
40 वर्ष की अल्पविधि में आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं और इन उपलब्धिओं का शंखनाद भी किया है। 2016 में संस्था ने अपनी 35वी वर्षगाँठ के उपलक्ष में दिल्ली में एक विशाल उत्सव मनाया था। इस वर्ष भी 40वी वर्षगाँठ मनाई गई होती परन्तु कोरोना महामारी के कारण संभव नहीं हो पा रहा। इस के अतिरिक्त संस्था ने कई उत्सव मनाये हैं जिस में हज़ारों की संख्या में वीणा वादक, संगीतज्ञों या गायकों ने भाग लिया।
यकीनन मैं आपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा स्थापित आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था मानव मात्र के कल्याण के लिए है और श्री श्री रवि शंकर भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के महान सपूत हैं और सही मायनो में योग आधारित जीवन जीने की कला सीखने के लिए सही गुरु हैं । मेरा उन के श्री चरणों में शत शत नमन है। इस वर्ष 2021 आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के 40 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। विश्व के 150 से ज़्यादा देशों में करोड़ों अनुयायी हैं। मुख्य आश्रम भारत के कर्नाटक प्रदेश की राजधानी बैंगलोर में कनकपुरा रोड पर स्थित है और भारत के कई नगरों में एवं अनेक देशों में संस्था की शाखाएं हैं। 40 वर्ष की अल्पावधि में इस संस्था का इतना विस्तार अति प्रभावशाली है।
सतीश कालड़ा, बैंगलोर
बैंगलोर 13.11.2021
