गुरुदेव श्री श्री रविशंकर
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर वर्तमान समय में भारत के सुप्रसिद्ध एवं महान संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। आप का जन्म 13.05.1956 को हुआ और इस वर्ष आपका भौतिक शरीर 65 वर्ष का होने को है। 25 वर्ष की अल्पायु में (1981) आप ने Art of Living संस्था की स्थापना की। इस वर्ष 2021 इस संस्था के 40 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। आप के द्वारा प्रशिक्षित सुदर्शन क्रिया और जीवन शैली का प्रचार अति लोकप्रिय है और विश्व के 150 से ज़्यादा देशों में आप के करोड़ों अनुयायी हैं। Art of Living का मुख्य आश्रम भारत के कर्नाटक प्रदेश की राजधानी बैंगलोर में कनकपुरा रोड पर स्थित है और भारत के कई नगरों में एवं अनेक देशों में संस्था की शाखाएं हैं। 40 वर्ष की अल्पावधि में इस संस्था का इतना विस्तार अति प्रभावशाली है। आइए, गुरु जी के जीवन, उनकी संस्था और उनके द्वारा प्रशिक्षित जीवन शैली की जानकारी साँझा करते हैं।
बहुत कम लोगों ने गुरुजी को सही ढंग से समझा है। प्राय लेखक कुछ आंकड़े दे कर तस्सली कर लेते हैं। कुछ भावुक हो कर उनके बारे में चार शब्द लिख देते हैं या गुरु स्टोरी प्रकाशित कर देते हैं। गुरुजी का व्यक्तित्व और उनका प्रचार प्रसार इतना व्यापक और गहन है कि आंकड़ों में उस का पार पाना कठिन है। यह प्रयास भी मात्र एक बौना सा प्रयास है। मुख्यतः तीन विषयों पर चर्चा करेंगे:
गुरुजी का बचपन और शिक्षा
गुरुजी के गुरुदेव एवं संन्यास
गुरुजी द्वारा स्थापित संस्था एवं सेवा प्रकल्प
गुरुजी का बचपन और शिक्षा: कहते हैं जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान । वैसे भी भारत में साधु सन्यासी परिवार से संबंध त्याग देते हैं। फिर भी जिज्ञासु जानना ही चाहते हैं तो विदित हो: गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी की बहन श्रीमती भानुमति नरसिम्हा जी ने गुरुजी की जीवन कथा लिखी है जिस को Westland Publications Pvt Ltd, Chennai ने 2018 में प्रकाशित किया है। इस के अनुसार उन का जन्म 13.05.1956 को भारत के तमिलनाडु (जिला तंजावुर गांव पापनाशम) में उनके ननिहाल में हुआ और पालन पोषण बेंगलुरु के जयनगर क्षेत्र में हुआ। आप के माता पिता जाति से ब्राह्मण हैं। परिवार में पूजा पाठ की प्रथा और आस्था भरपूर रही। गुरूजी की माता श्रीमती विशालाक्षी सहज स्वभाव की नारी एवं पूजा पाठ में संलग्न रहती। इस का बालक रवि पर बहुत प्रभाव पड़ा। कहते हैं कि मात्र चार वर्ष की आयु में भगवद गीता शिशु रवि को कंठस्थ थी। ऐसा दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवारों में प्राय होता ही है। परंतु बालक रवि के बारे में कहा जाता है कि उन्हें इस का गहन ज्ञान बचपन से ही था। गुरुजी प्राय सब शास्त्रों से परिचित हैं हालांकि उनके साथ रहने वाले लोग जानते हैं कि गुरुजी ने शास्त्रों का अध्ययन नियमित तौर पर नहीं किया।
गुरु जी के पिता श्री वेंकटरमण सुसंस्कृत और कर्मनिष्ट व्यक्तित्व के मालिक थे और परिवार में साधु संतों का आवागमन लगा रहता था। उन के पड़ोस में ही पंडित सुधाकर चतुर्वेदी रहते थे जिन्हों ने महात्मा गाँधी के सानिध्य जेल में काफी दिन व्यतीत किए थे। ऐसा भी सुनने में आया है कि पंडित जी ने ही गांधी जी को गीता की ओर उन्मुख किया था। पंडित जी से बालक रवि काफी प्रेरित होते रहे। माता पिता के संस्कार, साधु संतों का सानिध्य, और शास्त्रों का अध्ययन - इन सब ने बालक रवि पर दूरगामी प्रभाव छोड़ा। पूर्व जन्म के संस्कारों का योगदान तो होता ही है।
कहते हैं कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात। वह महापुरुष जो आज के दिन जन जन के गुरु है वह उन दिनों भी उतनी ही प्रतिभा के मालिक रहे होंगे जब वह स्कूल या कॉलेज के विद्यार्थी थे। बालक रवि के स्कूल की शिक्षा बैंगलोर में ही MES स्कूल में हुई और St जोसफ कॉलेज से आप ने स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त की। आप का एक सहपाठी मुझे मिला जिस ने मुझे बताया था कि रवि अत्यंत सौम्य प्रकृति के थे एवं खेल कूद की बजाय गीत संगीत में ज़्यादा दिलचस्पी रखते थे। गुरु जी स्वयं भी कई बार कहते हैं कि अगर वह अध्यात्म मार्ग पर ना आते तो अवश्य वीणा वादन करते। गुरूजी वीणा वादन में अति निपुण हैं। गुरूजी का कथन है कि वीणा के सात तार जीवन के सात स्तर हैं: स्थूल शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और आत्मा। जब इन सब का सामंजस्य हो जाता है तो जीवन रूपी संगीत प्रकट हो जाता है ।
कुछ लोग जानना चाहते हैं कि गुरु जी का नामकरण कैसे हुआ और इस में दो बार श्री श्री का प्रयोग क्यों है? रवि शंकर नामकरण का जिक्र तो भानु दीदी ने अपनी पुस्तक में विस्तार से किया है। गुरुजी का जन्म रविवार को हुआ इसलिए रवि शब्द का चयन किया गया। दादीश्री ने आशीर्वाद दिया की सूर्य की भांति रवि जग को रोशन करे गा। उन की जन्म तिथि का मेल जगद्गुरु शंकराचार्य जी से भी था। इसलिए पूरा नाम रखा गया रविशंकर। समय रहते रविशंकर प्रसिद्धि हासिल करने लगे। उन दिनों सितार वादक श्री रवि शंकर बहुत प्रसिद्ध थे। बस उन के नाम से थोड़ा भिन्न होने के कारण श्री श्री रविशंकर नामकरण हो गया और अब तो श्री श्री या गुरुदेव कहना ही काफी है।
गुरूजी की बहन ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनके भाई रवि स्कूल में उन बातों में दिलचस्पी नहीं लेते थे जिन में सामान्य किशोर इच्छुक होते हैं: जैसे खेल कूद फिल्मी दुनिया इत्यादि। बल्कि रवि की दिलचस्पी ज़िन्दगी की गहराईओं को जानने में हुआ करती थी।
किशोर रवि किशोरों के लड़ाई जगडे में पड़ने की बजाय उन को सुलझाने में लगे रहते। उन को उसी अवस्था में कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन के गुर आते थे। उन में से एक गुर यह था कि किसी की दुर्भावना मात्र कुछ समय के लिए रहती है: ज़्यादा से ज़्यादा ढाई दिन। अगर कुछ देर किनारा कर लिया जाए तो वह स्वयं दुर्भावना को भूल जाता है।
हालांकि किशोर रवि बाकी किशोरों से अलग प्रकृति के थे परन्तु ऐसा नहीं था कि वह उन से अलग थलग रहते थे। बल्कि वह उन की समस्याओं का हल निकाल देते थे। उनके सहपाठी और अध्यापकों का कथन है की रवि के सानिध्य से उन्हें सुकून मिलता था। वैसे कभी कभी किशोर रवि फिल्मी गीत संगीत का भी आनंद ले लेते थे और आज भी ऐसा है। उनका मनपसंद गीत है: आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने ना तू; जो भी है बस यही इक पल है। और गुरु जी ने इस को सही मायने में आत्मसात किया है। गुरु जी पल पल वर्तमान में रहते हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
किशरवस्था का ही ज़िक्र कर रहे हैं तो इस बात का ज़िक्र भी उचित है। भानु दीदी (गुरुजी की बहनज) ने लिखा है कि एक बार स्कूल की गुणकृता नाम की किशोर लड़की ने देवी दुर्गा का नृत्य किया। उसका चेहरा अति सुंदर था और अभिव्यक्ति बहुत अर्थपूर्ण थी। उसके लम्बे बाल गुंथे हुए थे और उज्जवल बिंदी लगा रखी थी। साक्षात् देवी लग रही थी। भानु दीदी लिखती हैं कि मेरे भाई ने उस का नृत्य बहुत ध्यानमग्न हो कर देखा और कुछ समय के लिए उस को ऐसा प्रतीत हुआ के उस ने विश्व के हर उस चेहरे का अवलोकन कर लिया जो उन का इंतज़ार कर रहा है। एक बार गुरु जी से पुछा गया कि आप किशोरावस्था में कैसा महसूस करते थे? तो उन्होंने उत्तर दिया की वह महसूस करते थे कि वह सर्वव्यापी हैं।
गुरुजी के गुरुदेव और सन्यास
रवि जब स्नातक हुए तो अन्य युवकों की तरह उन्हों ने नौकरी ढूंढने की बजाय आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाना सही समझा। कहते हैं गुरु बिन ज्ञान नहीं और सत्य को जानने की जिज्ञासा बहुत थी। किशोर रवि महर्षि महेश योगी जी की शरण में हो लिए। हुआ यूं कि आप महर्षि यूरोपियन रिसर्च यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड में दाखिल हुए और वहां पर महर्षि की कृपा से उन्हें स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की गुरु दृष्टि हुई। परिवार में भी माता, पिता और बहन को संन्यास का तब ज्ञान हुआ जब दो वर्ष बाद यूरोप से वापिस घर आए।
बस फिर क्या था। महर्षि की प्रसिद्ध उन दिनों इतनी ही थी जितनी आजकल गुरुजी की अपनी है। सन्यासी रवि महर्षि के अंतरंग और अग्रणी में से एक थे। वह भारत में महर्षि के विभिन्न सेवा प्रकल्प देखने में व्यस्त हो गए।
प्राय देखने में आया है की जो इंसान सन्यास लेता है या वह या तो स्वयं परिवार का त्याग कर देता है या फिर उसका परिवार उसका त्याग कर देता है। सन्यासी स्वयं परिवार का त्याग इसलिए करता है ताकि मोह माया से ऊपर उठ सके। परिवार सन्यासी का त्याग इसलिए कर देता है क्योंकि उस के भगत इतने हो जाते हैं कि परिवार संभाल नहीं पाता। सन्यासी अपना नाम तक बदल लेते हैं और प्राय उस नगर या गांव की तरफ नहीं जाते जहां उनका जन्म हुआ या लालन पालन हुआ। अक्सर गेरुआ पहन लेते हैं जो कि अग्नि का प्रतीक है। यह इसका भी प्रतीक है कि सन्यासी ने अपने पूर्वजीवन का अग्नि दाह कर दिया और केवल ज्ञान मार्ग या भक्ति मार्ग अपना लिया।
श्री रविशंकर जी ने संन्यास लिया परंतु ना अपना नाम बदला, ना माता पिता, बहन को छोड़ा और ना ही उन्होंने रवि को छोड़ा। बल्कि माता पिता और बहन ने सन्यासी रवि को अपना गुरु मान लिया और गुरु रविशंकर के गुरु बनने से जो घर में अत्यधिक सेवा करने का अवसर मिला उस को सहर्ष निभाया। गुरु जी ने गेरुआ भी नहीं पहना। बल्कि सफेद कपड़ों को अपनाया। देखने में आया है कि सन्यासी जो भी करते हैं 100% करते हैं। सन्यासी या तो रूंड मुंड सब बाल कटवा देते हैं और या बिलकुल नहीं कटवाते। गुरुदेव रविशंकर जी सिर और दाढ़ी के बाल बिल्कुल नहीं काटते और खुले रखते हैं। शायद इसलिए कि किशोरावस्था में सन्यास लिया और भगत दाढ़ी वाले बाबा जी को स्याना समझते हैं।
सन्यासी रविशंकर का महर्षि महेश योगी के प्रति प्रगाढ़ प्रेम और श्रद्धा रही। परंतु समय आ गया था कि वह अपने पैरों पर खड़े हो कर कुछ करें। कालांतर में 1981 में उन्हों ने आर्ट ऑफ लिविंग नामक संस्था की स्थापना की। उस को आज चार दशक पूरे होने को हैं। इस का जिक्र अगली किश्त में।
सतीश कालड़ा
iamsatishkalra@gmail.com
08.05.2021