Wednesday, August 12, 2020

कोरोना का कहर

 कोरोना का कहर 

सतीश कालड़ा 
बैंगलोर : 29.07.2020 

गत 6-7 महीने से COVID -19 अथवा CORONA  नामक महामारी ने विश्व भर में एक अदभुद डर का माहौल पैदा कर दिया है। दिसंबर 2019 में चीन के  वूहान प्रदेश में इस से काफी लोग प्रभावित हुए।  उस के पश्चात 10 जनवरी 2020 से विश्व के बाकी देश  प्रभावित होने लगे। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड  जैसे देश इस की चपेट में आये। फिर अमरीका और ब्राज़ील भी बुरी तरह से फसे। 30 जनवरी से WHO ने इसे महामारी घोषित कर दिया।    आजकल भारत में भी इस की  दहशत है।  भारत में आज तक  (जुलाई 2020 तक) 15  लाख लोग संक्रमित पाए गए और लगभग 50000 लोग मर गए है।  24 मार्च 2020 को  देश के प्रधान मंत्री श्री नरिंदर मोदी ने सारे देश में 24 दिन का Lockdown कर दिया जिस से सब गतिविधियाँ ठप हो गयीं  बाजार बंद, यातायात बंद, रेल, बस, टैक्सी, हवाई यात्रा सब बंद. जो जहाँ था  वहीँ फँस गया।  कोई दुकान नहीं खुली, Shopping Malls बंद;  स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सब शिक्षण  संस्थान बंद।   कई बच्चे आपने घर नहीं जा  पाए।  यह सब उस वक़्त हुआ जब देश में प्रभावित लोग मात्र 500 थे। 14 अप्रैल को Lockdown 31 मई तक बड़ा दिया गया।  देश की अर्थ व्यवस्था पर काफी असर हुआ है।देश के महानगरों से असंख्य मज़दूर बेरोज़गारी से परेशान  दूर दराज़ आपने आपने गाँव की तरफ निकल पड़े। पहले तो उन्हें पुलिस ने मार पीट की क्योंकि वह Lockdown का उलंगन कर रहे थे।  परन्तु वो तो इतना बड़ा जनसैलाभ था की थामे नहीं थमा।   आखिर सरकार को कुछ सुविधा देनी पड़ी। 

धीरे धीरे परन्तु निरंतर ढंग से महामारी की चपेट में  लोग आते  रहे।  मार्च 2020 में 500-600 लोग संक्रमित थे और वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 15  लाख तक पहुँच गयी है।  अभी तक इस का कोई पक्का इलाज सामने नहीं आया।  सरकार अब समझ चुकी है कि  Lockdown को और बढ़ाया नहीं जा सकता। लोग Lockdown से मरें  ना मरें;  बेरोज़गारी से चरमरा जाएँगे ।   इस लिए कुछ सावधानियां बरतने को कहा गया है।  यानि  जितना हो सके घर में रहें। घर से बहार निकलें तो Mask पहन कर निकले। अन्य लोगों से कम  से कम एक मीटर की दूरी बना कर रखें। इत्यादि इत्यादि।  गत 4-5  महीने से रोज़, सुबह शाम मुख्य समाचार यही है कि  कोरोना से कितने लोग प्रभावित हैं, कितने ठीक हो गए, कितने मर गये । 

जब तक कोई व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित नहीं होता तब तक यह सब तो संख्या ही मालूम पड़ती है। परन्तु इस की गंभीरता  का तब पता चलता है जब कोई खुद प्रभावित होता है अथवा सगे सम्बन्धिओं  में / पड़ोस में / मित्र मंडली में कोई प्रभावित होता है।  वैसे तो काफी लोग ठीक हो रहे हैं।  मरने वालों की संख्या मात्र 3% है। ज़्यादातर मरते वह हैं जो 60 वर्ष की आयु से ऊपर हैं या 10 वर्ष की आयु से काम हैं या पहले से किसी रोग से प्रभावित हैं। जैसे कि  शुगर , Blood Pressure / दिल का रोग इत्यादि। परन्तु जो मरते हैं बुरी तरह से मरते हैं।  उन्हें  सांस लेना मुश्किल हो जाता है।  फिर जो मरता है उस की लाश को कोई हाथ लगाने को तैयार  नहीं होता।  घर वाले ही पीछे हट जाते हैं।  डर यह लगता है कि संपर्क से Infection न पकड़ ले।  इस लिए अस्पताल में भी पूरी तरह से सावधानी बरती जा रही है।  डॉक्टर और नर्सें मुँह सिर  ढक कर मरीज़ के पास जाते हैं जो मरीज़ के संपर्क में आ जाए तो उस को भी अलग जगह रहने को कहा जाता है।  

हाल ही में  हमारे पड़ोस में एक बज़ुर्ग की Corona के कारण मृत्यु हो गयी। जाहिर है उन के परिवार के सब सदस्यों को Self-Isolation में रहने को कहा गया। जिस दफ्तर में उन का बेटा काम करता था उन को भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  जहाँ  पर वह बैडमिंटन खेलता था उनको भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  मामला चलते चलते हमारे परिवार तक आ पहुंचा क्योंकि मेरा बेटा  उस के साथ बैडमिंटन खेलता है जिस के दफ्तर में उस का बेटा  काम करता है जिस के पिता की कोविड के कारण मृत्यु हुई।  मैं कहीं दूर तक मृतक के परिवार के संपर्क के घेरे में संभावित नहीं था। परन्तु हमारे पूरे परिवार को सेल्फ आइसोलेशन में रहने का सन्देश मिला। मुझे रात के 11 बजे सन्देश दिया गया सेल्फ-आइसोलेशन के लिए।  सेल्फ आइसोलेशन का सन्देश क्या आया मुझे थोड़ा सा बुखार भी हो गया। और शक हुआ कि आखिर  मुझे भी कहीं COVID तो नहीं !!

मैंने सोचा अब तो बारी आ गयी क्यों कि  मैं तो हूँ भी 67 वर्ष का और पत्नी भी। रात का समय। नींद आ नहीं रही। अभी अस्पताल जा नहीं सकते।  क्या  यह सचमुच COVID  ही है।  ऐसे लगा कि जैसे मौत के साथ सामना हो रहा है।  मौत का एहसास। मन में तरह तरह के विचार आने लगे। जो जो विचार मन में आये वह सांझे कर रहाँ  हूँ।  

  1.  याद आया कि  गीता में लिखा है कि "जो पुरुष अन्तकाल में भगवान् को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह मेरे साक्षात रूप  को प्राप्त होता है - इस में कोई संशय नहीं।" (भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 4) मतलब कि मुक्ति ही प्राप्त हो जाती है। तो भगवान् का नाम याद करना शुरू कर दिया जाए।
  2. फिर संशय आया क्या पता मैं ठीक से भगवान् का स्मरण कर रहा  हूँ या नहीं।  मन्त्रजाप करना है, या गीता का पाठ करना है  या Meditation  अथवा ध्यान में बैठना है या सत्संग कीर्तन करना है या ज्योत जलानी है  या हवन  यज्ञ करना है या केवल भगवान्  को केवल याद ही करना है।  अगर ऐसा है तो कौन से भगवान् को याद करना है।  अगर मरते समय पास में डॉक्टर सिख हो और नर्स ईसाई हो तो मैंने किस भगवान् को याद करना है।    इत्यादि इत्यादि।  या आपने ही हिन्दू देवी  देवता को ही याद करने से मुक्ति प्राप्त होगी।  
  3.  मुक्ति अगर इतने सस्ते में  उपलब्ध है तो फिर सारी  उम्र भर पाप पुण्य का क्या डर?  कर्मों का खेल है क्या?  इस लिए लगता नहीं मात्र इस से मुक्ति प्राप्त हो जाए हालांकि इस को भी कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं।  वैसे मरने के वक़्त परमात्मा उसी को याद आता है जिस ने सारी  उम्र इस याद को  बना रखा होगा।  याद आया कि  दो वर्ष पहले जब 90 वर्षीय पिताश्री मृत्यु के नज़दीक पहुंचे ICU में थे तो उन के हाथ में मैंने उनकी माला थमा दी थी।  रात को माला थमा कर आया था।  सुबह ही उनहों ने शरीर त्याग दिया था।  मुझे ऐसा लगा था की उनहोंने  गीता के अनुसार नाम स्मरण करते हुए प्राण त्यागे।  उन्हें ज़रूर मुक्ति प्राप्त हुई होगी।  परन्तु फिर भी पंडित जी ने बहुत से क्रियाकर्म करने को कहा था।  एक साल भर तक करते रहे थे। अभी भी हर साल पितृपक्ष में श्राद करने को कहा जाता है।  
  4. कुछ भी हो।  शास्त्रों में लिखा है।  गुरु जी ने भी करने को कहा है।  कर लेना चाहिए।  मन्त्र, तन्त्र का ज्ञान नहीं है, पूजा पाठ की विधि ठीक गलत हो सकती है भगवान् का स्मरण कर उनसे किये कर्मो की क्षमा मांग कर समर्पण तो किया जा सकता है।  जब पैदा हुए थे तो माँ को समर्पित थे।  मरते समय भगवान् को समर्पित हो जाते हैं। 
  5. ऐसी धारणा  चल रही थी कि  भगवद गीता के कुछ और श्लोकों का  स्मरण हो आया।  (अध्याय 18 श्लोक 65-66): "हे अर्जुन ! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भगत बन, मेरा पूजन करने वाला  हो और मुझ को प्रणाम कर। ऐसा करने से तू  मुझे प्राप्त हो गा। यह मैं  जूझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ। सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल मुझ सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की शरण में आ जा।  मैं तुझे  सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँ गा।" दिल में विश्वास आ गया कि सच्चे दिल से भगवान में समर्पण से मुक्ति प्राप्त हो गी ही।  
  6. वैसे भी  मृत शरीर को जलाने के बाद पंचभूत शरीर यहीं का यहीं पर रह जाना है जी।  मिट्टी मिट्टी में, जल वाष्पीकरण हो कर चला जाएगा और इन्हीं बादलों के साथ अठखेलियन करेगा। शरीर की ऊर्जा अग्नि के साथ और प्राण  पखेरू बन कर वायु मंडल में घुल जाएँ गे और मुट्ठी भर शरीर ने जो आकाश घेर रखा है यहीं का यहीं । परन्तु शरीर नहीं रहे गा।  मन बुद्धि चित्त और अहंकार शायद  तब तक हैं जब तक शरीर है।  बाद में इनका क्या? आत्मा जो  है तो परमात्मा का ही अंश है उसी में मिल जाएगी।  
  7. परन्तु मुझे ध्यान आया कि  कुछ काम करने बाकी हैं।  Lockdown में एक दूकान से सामान खरीदते वक़्त 40 रुपए कम थे। उस को 40 रूपये देने हैं।  एक और दूकान दार से सामान  मंगवाया था  उस के 15800 रुपये देने हैं।   यह ना दिए तो मुक्ति कहाँ से मिलेगी।   फेसबुक/ व्हाट्सप्प  में कुछ ग्रुप में  एडमिन हूँ।  उन में भी कुछ इंतज़ाम कर जाऊँ।  
  8.  फिर ध्यान आया कि  अपनी वसीयत भी तो लिख दूँ। मरणोपरांत बच्चे आपस में ना झपट लें।  परन्तु इस का ध्यान आते ही कुछ विचार आने लगे। बच्चे तो अब पढ़ लिख कर बड़े हो गए हैं।  आपने आप संभाले हुए है।  उन को मेरे चाँद पैसे टकों की क्या ज़रुरत है।  वैसे भी हम रूपए पैसे को क्यों बचा कर रखते हैं।  यह तो हमारे कर्म का फल है।  कर्मफल को संचित करने का मतलब है बन्दन।  और  यहाँ मैं तो मुक्ति प्राप्त करने का सोच रहा  हूँ।  
यही सब सोचते सोचते नींद आ गई।  सुबह उठा। शरीर देखा।   विध्यमान था। तापमान सही था। खिड़की खोली। पोह फट रही थी।  चिड़िआ चहचहा रही थी।  दूर से कोयल ने कुहू कुहू किया।  पपीहे ने पीहू पीहू किया।  पड़ोसी ने कहा आप प्रिवेंटिव क्वारंटाइन में हैं।  दूध सब्ज़ी ला देता हूँ।  मुझे सूर्य की उषणता उपलब्ध हुई, मंद मंद और सुगन्धित वायु चलने लगी, पक्षी चहचहा रहे हैं, भवरे गीत गा  रहे है, शरीर निरोगी है, परिवार साथ है, पडोसी सेवा कर रहे हैं।  मुझे  तो लगा स्वर्ग यहीं है यहीं है। मुझे खुद क्या करना है इस के बारे में सोचना चाहिए ना कि मृत्यु क्या है।  जीवन जीना है तो इस के बारे में सोचना है कि  इतनी ज़्यादा संख्या में जो मज़दूर बेघर हो गए हैं उन का दुःख दर्द कैसे काम करूँ। 

इतने में मालूम हुआ कि पड़ोस में दो परिवार COVID  ग्रस्त हो गए।  पास वाली परिसर में 10 लोग ग्रसित हैं।  BBC का न्यूज़ बुलेटिन लगाया।  संसार में COVID का कहर जारी है।  विश्व भर ने 31 जुलाई 2020  तक   17 लाख लोग 188  देशों में प्रभावित हो चुके हैं और 6. 82 लाख लोग इस से मर चुके हैं।  अभी तक इस का इलाज नहीं मिला।  गत 300 वर्ष से विज्ञान  और तकनीक की प्रगति से मानव  ऐसा महसूस कर रहा था कि उस ने प्रकृति पर विजय पा ली है। जो सुख सुविधाएं आज के युग में सामान्य मानव को उपलब्ध हैं वह आज से 300 वर्ष पूर्व राजा  महारजा को भी उपलब्ध नहीं थी।  परन्तु एक वायरस ने सब ठप कर दिया है।  सब सुख सुविधाएँ धरी की धरी रह गई हैं।  लोग आपने आपने घरों में बंद है।  अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रहीं हैं।  यातायात बंद या न्यूनतम हैं।  परन्तु प्राकृतिक सुधार नज़र आ रहा है।  आसमान साफ़ नीले रंग का दिखाई देता है।  नदिआँ  साफ़ हो गई हैं।  वायु का प्रदूषण कम हो गया है।  लोग घर से काम कर रहें है।  मुझे याद आ रहे है चार्ल्स डिकेन्स के वह शब्द जो उस ने थे Tale of Two Cities के शुरू में ही लिखे थे।  मुझे लगता है यह अभी भी सही हैं।  

It was the best of times, it was the worst of times, it was the age of wisdom, it was the age of foolishness, it was the epoch of belief, it was the epoch of incredulity, it was the season of Light, it was the season of Darkness, it was the spring of hope, it was the winter of despair, we had everything before us, we had nothing before us, we were all going direct to Heaven, we were all going direct the other way – in short, the period was so far like the present period, that some of its noisiest authorities insisted on its being received, for good or for evil, in the superlative degree of comparison only.

यानी यह समय सब पहले के समय से बेहतर है क्योंकि प्रदूषण काम हो रहा है।  परन्तु यह समय मानव इतहास का सब से चुन्नोतिपूर्ण समय भी है। 

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